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    भारतीय काव्यशास्त्र (सामान्य अध्ययन)






    हिंदी साहित्य में काव्य के स्वरूप को लेकर मध्यकाल में कोई मौलिक विवेचन नहीं हो सका । चैतन्य महाप्रभु के शिष्य रूप गोस्वामी ने भक्ति रस अमृत सिंधु 15 से 41 ईसवी में भक्ति को ही प्रकृत रस सिद्ध किया और अन्य राशियों का विवेचन उसकी वेदों के रूप में किया । 
    *रीतिकाल के आचार्य केशव चिंतामणि कुल पतिदेव श्रीपति सोमनाथ विकारी दास आदि ने कोई नवीन या मौलिक उद भावना नहीं की यह आचार्य संस्कृत के आचार्यों कीमतों में ही थोड़ा हेरफेर करके उसे प्रस्तुत करते रहे ।

    काव्य हेतु 
    आचार्य मम्मट ने शक्ति निपुणता और अभ्यास इन तीनों को सम्मिलित रूप से काव्य काहे तू माना है सत्य निपुणता लोग शास्त्र काव्या देवेश रात का वैद्य शिक्षा अभियान स्थिति है कुछ तो दो बुलावे काव्यप्रकाश अर्थात कभी में संस्कार रूप में विद्यमान शक्ति लोग व्यवहार स्वास्थ्य तथा काव्य के आदि के पर्याय लोचन से उत्पन्न निपुणता और काव्य मार्ग को जानने वाले गुरु की शिक्षा के अनुसार काव्य निर्माण का अभ्यास यह तीनों ही समस्त रूप से काव्य के हेतु हैं उनसे पहले भामा ने केवल प्रतिभा को दंडी और औरत ने प्रतिभा शास्त्र ज्ञान तथा अभ्यास तीनों को वामन ने लोक व्यवहार विद्या और प्रक्रिया भी परिचय को तथा राजशेखर ने समाधि और अभ्यास से उत्पन्न शक्ति को काव्य हेतु माना था आनंद वर्धन ने विपत्ति और प्रतिभा दोनों को काव्य हेतु मानते हुए भी प्रतिभा को विशेष महत्व दिया था पंडितराज जगन्नाथ में प्रतिभा को ही काव्य काहे तू माना है

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