लज्ज़त-ए-अलम (गजल संग्रह)





1. 

दिलकशी के लिए दिलनशी चाहिए
आशिकी के लिए हमनशी चाहिए

लफ्ज़ में हो नमी हो नजर में हया
जिसमें होवे लिहाज वो हँसी चाहिए

जिससे बेचैन दिल को सुकून मिल सके
दिल की चाहत है वो ही खुशी चाहिए

जी चुके हैं बहुत होके मजबूर हम
अब जरा भी नहीं बेबसी चाहिए

जिसके दिल से ये दिल मिल सके ठीक से
अब तो 'प्रखर' को दिलबर वही चाहिए

2.

इक नजर देखकर मुस्कुरा दीजिए
हाल दिल का नहीं यूँ बुरा कीजिए

खूबसूरत हैं तो फिर ये परदा है क्यों
रुख से परदे को थोड़ा गिरा दीजिए

कत्ल कर दीजिए है इरादा अगर
यूँ मगर ना हमें अधमरा कीजिए

ऐसे कैसे जीएँगे बिना आपके
अपने दीदार का आसरा दीजिए

सूख जाएँ ना बेचैन होके 'प्रखर'
प्यार से सींचकर कुछ हरा कीजिए

3.


अजी ! आपकी याद आती बहुत है
आ करके दिल को सताती बहुत है

मेरी दिल्लगी से ना आप रूठ जाएं
ये बात दिल को डराती बहुत है

कैसे आप के रुख से नजरें हटा लूँ
ये खूबसूरती तो लुभाती बहुत है

मेरे वास्ते आपके दिल में क्या है
ये ख्वाहिश बेताबी बढ़ाती बहुत है

जो है फासला उम्र का ये ज्यादा
'प्रखर' बेबसी यह रुलाती बहुत है


4.

दिन हसीन सारे होते
अगर आप हमारे होते

हमारी नजर के सुरमा
कुदरती नजारे होते

हम भी आसमां के कोई
चमकते सितारे होते

तब तो हीरे से कीमती
हमारे इशारे होते

हम भी धारा होते 'प्रखर'
तब नहीं किनारे होते


5.


तुम्हें देखकर दिल मचलने लगा है
इरादों का पर्वत पिघलने लगा है

मेरे दिल की अंधेरी इस कोठरी में
दिया मोहब्बत का जलने लगा है

जो बार-बार ओहदे की याद दिलाता था
वो दिन अब खयालों का ढलने लगा है

मेरे जिस भरोसे के पाँव थक चुके थे
वही अब धीरे-धीरे चलने लगा है

हसीनों से नफरत मुझे हो गई थी
'प्रखर' अब मगर दिल बदलने लगा है

6.


बहुत खूबसूरत हैं आंखें तुम्हारी
बहुत प्यारी लगती हैं बातें तुम्हारी

कि अब तो मेरा दिल ना मेरा रहा
मेरे दिल में है अब तो यादें तुम्हारी

जो इक बार तुम पास से मेरी गुजरी
जलाती है वो गर्म साँसे तुम्हारी

मेरे सारे दिन हो गए अब तुम्हारे
मेरी रातें भी अब हैं रातें तुम्हारी

'प्रखर' नींद आती तभी जब मैं सोता
सीने से तस्वीर लगाके तुम्हारी

7.


तुम्हें प्यार करने को जी चाहता है
तुम्हीं पे ही मरने को जी चाहता है

अगर प्यार की कोई हद होती है तो
उस हद से गुजरने को जी चाहता है

मैं चिढ़ता था जब दूसरे आह भरते
कि अब आह भरने को जी चाहता है

कभी भी जमाने से ना मैं डरा हूँ
जमाने से डरने को जी चाहता है

ये कैसा असर प्यार का है 'प्रखर' कि
खुद ही बिखरने को जी चाहता है

8.


तुमसे जब बात ना होती तो दिल घबराता है
तुमसे बातें करने को ये दिल तड़प जाता है

जाने कैसा ये रिश्ता है तुम्हारा और मेरा
तुम्हारी बातें सुनने को दिल मचल जाता है

मेरे कानों में जब भी पड़ती है आवाज तुम्हारी
सच ही कहता हूं ये मौसम भी बदल जाता है

जिस सुबह तुमसे ना होती है प्यार से बातें
उस सुबह से लेकर सारा दिन बिगड़ जाता है

प्यार समझो इसको या समझो मेरा पागलपन
रूठती हो तो 'प्रखर' का दिल निकल जाता है

9.


तुम भरोसा मेरी बातों का क्यों नहीं करती
जो भी तुम्हारे दिल में है वो क्यों नहीं कहती

प्यार करती हो तुम मुझसे और गुस्सा भी
ऐसा ही मैं भी करता हूँ तो क्यों नहीं सहती

अपने जज्बातों की बातें छेड़ देती हो
मेरे जज्बातों में तुम बोलो क्यों नहीं बहती

बोलती हो तुम जब भी तो बोलती जाती
मेरी बातें सुनने को चुप तुम क्यों नहीं रहती

मेरे बिन ना रह सकती हो कसम खाती हो
तो 'प्रखर' कहते हैं जो वो क्यों नहीं कहती

10.


तुमसे नाराज होकर खुश तो मैं भी नहीं था
सिर्फ वो जिद्द ही थी और कुछ भी नहीं था

रात भर तुम भी जागी मैं भी ना सो सका था
खोई थी तुम जहां पे मैं भी खोया वहीं था

दूर तुम थी मगर थी पास तस्वीर तुम्हारी
इक पल के लिए भी उससे ओझल नहीं था

जब भी फुर्सत में होता दिल ये खामोश रोता
उस दिमागी वहम में दिल तो मजबूर ही था

कुछ भी हासिल हुआ ना अब है अफसोस 'प्रखर'
ना तो तुम ही गलत थी ना ही मैं भी सही था


11. 

मिलना तो एक बहाना था
तुमको बस आजमाना था

मिलने के लिए तुमको बोला
लेकिन तुमको ना आना था

तुम ना आयी शायद हमको
इस बात पे ही टकराना था

अच्छा ही हुआ हम बिछड़ गये
वरना आगे पछताना था

जब दिल में मोहब्बत ना थी 'प्रखर'
बेकार ही दिल का लगाना था


12.


चार नजरों का चलता रहा सिलसिला
कर गये हम वफा बस हुई ये गिला

प्यार करके हमें एक हसीन रूप से
सिवाय दर्द के और कुछ ना मिला

प्यार हमने किया उसने खिलवाड़ की
उसकी हरकत से बार-बार दिल ये हिला

हम तरसते रहे उसके इंतजार में
प्यार का फूल वो ना हमारा खिला

जिसमें चाहत की रंगीनियाँ थी 'प्रखर'
खण्डहर बन गया आज वो ही किला

13.


मासूम चेहरे से प्यार कर बैठे
सोचे बिना जांनिसार कर बैठे

मासूमियत का नकाब तब उठा
जब जिंदगी कर्जदार कर बैठे

उसकी क्या मर्जी थी जाने बगैर
हम प्यार का इजहार कर बैठे

रिश्ते बहुत आए थे काबिलों के
सबको ही हम इनकार कर बैठे

नादान इतने थे हम कि 'प्रखर'
गम खाने का इकरार कर बैठे


14. 

दर्द की बाँह में मुस्कराते रहे
बेवफा पे वफा हम लुटाते रहे

चार आँखें हुई जुर्म इतना हुआ
उसका जुर्माना बरसों चुकाते रहे

इक पत्थर को ही देवता मानकर
उसकी चौखट पे सिर को झुकाते रहे

दर्द समझा नहीं जो हमारा कभी
उसको हमदर्द अपना बताते रहे

वो नशा था कि सच जानकर भी 'प्रखर'
झूठ के वास्ते चोट खाते रहे

15.


जल्दी में दिल को लगाया था हमने
जल्दी ही प्यार को बढ़ाया था हमने

जल्दी ही प्यार का अंजाम मिल गया
जल्दी ही धोखा भी खाया था हमने

ठोकर लगी लड़खड़ाये थे लेकिन
गिरने से खुद को बचाया था हमने

दिल-दिमाग मजबूत था फिर भी खुद को
उल्फत में कमजोर पाया था हमने

जल्दी का काम शैतान का 'प्रखर'
कहावत की सच्चाई पाया था हमने

16.


जल्दी जल्दी में जल्दी नजारा मिल गया
जल्दी डूबे जल्दी ही किनारा मिल गया

जल्दबाजी में बहुत बुरा हुआ मगर
अच्छा हुआ जल्दी छुटकारा मिल गया

खुशी की तलाश में हम पकड़े रास्ता
क्या करें वही गम दोबारा मिल गया

हर कोई किसी के सहारे जीता है दोस्त
हमें तो कलम का सहारा मिल गया

अब मलाल है नहीं अंधेरे का 'प्रखर'
अंधेरे में ही इक सितारा मिल गया

17.


ना ही तुम्हारे आने की खुशी है
ना ही तुम्हारे जाने का गम होगा

अब मेरे दिल में प्यार वो रहा ना
अब बेचैनी का भी ना आलम होगा

वाकिफ हूँ मैं अब तुम्हारे जफा से
अब दोबारा ना मुझको वहम होगा

बातों में मैं-तुम के अल्फा़ज होंगे
गलती से भी ना होंठों पर हम होगा

'प्रखर' इन सबका जिम्मेदार कौन है ?
अब जवाब से ना फासला कम होगा


18.


पहले तो जिंदगी उलझी नहीं
इक बार उलझी तो सुलझी नहीं

प्यारी लगी मुझको इक बेवफा
प्यार का जो मतलब समझी नहीं

रूठी घटा जब वो इक बार तो
फिर मेरे वास्ते बरसी नहीं

छोड़े थे ये कदम जिस लीक को
वो लीक अब कभी जँचती नहीं

 बदले 'प्रखर' वक्त के साथ में
 वक्त की तरह बदले अब भी नहीं

19.


क्या कहूं कहा नहीं जाता
बिन कहे रहा नहीं जाता

सोचता हूं सब कुछ सह जाऊं
क्या करूं सहा नहीं जाता

बह गए सब धारा में मगर
मुझसे ही बहा नहीं जाता

दीवाने मयखाने में गए
मैं हूं कि वहाँ नहीं जाता

मैं भीगा हूं अश्कों से 'प्रखर'
उनका कहकहा नहीं जाता


20. 

जो जमाना था कभी वो जमाना ना रहा
वो हमारे प्यार का आशियाना ना रहा

जिंदगी की राह में आशिकी के मोड़ पे
जो मिला था इक दिन वो खजाना ना रहा

वक्त के आगोश में दर्द सारे सो गये
अब नये एहसास में गम पुराना ना रहा

खोये थे अतीत में जिसके बहाने से हम
बह गया अतीत अब वो बहाना ना रहा

दिल की तरकस में अभी तीर नजरों के वही
बात ये है कि 'प्रखर' वो निशाना ना रहा



21. 

क्या कहें क्या हुआ है दुबारा
आज फिर है मुकद्दर ने मारा

आज फिर डगमगायी है किश्ती
आज फिर खो गया है किनारा

आँखों में आँसू वो दे गया है
बन गया था जो आँखों का तारा

हाथ में फिर उजाले को देकर
ले गया छीनके अँधियारा

आज फिर हमने देखा है 'प्रखर'
दिल के गुलशन का उजडा़ नजारा

22. 

मेरी तन्हाई का आलम तुम क्या जानो ?
मेरे दिल में है कितना गम तुम क्या जानो ?

यूँ ही दुनिया से छुप-छुपके रोते-रोते
गुजारा हूँ कितने मौसम तुम क्या जानो ?

जिसको मैं चाहा था उसकी झलक पाने को
कितना तरसा हूँ मैं हरदम तुम क्या जानो ?

बेवफाई की सर्दी में सर्द हो करके
किस तरह चुभती है शबनम तुम क्या जानो ?

'प्रखर' राहों में जो पाया उन काँटों को
कैसे कर पाया हूँ मैं कम तुम क्या जानो ?

23. 

हमको अच्छाई का मिला यह बुरा अंजाम है
किये हैं कुछ भी नहीं बस बोलकर बदनाम है

दिन गुजर गया किसी तरह हुजूम में मगर
फिक्र बढ़ती जा रही जब से ढली ये शाम है

पूछते हैं दोस्त हमसे क्यों खोए हुए हो दोस्त
क्या बताएं दोस्तों दिल को नहीं आराम है

उनके दरवाजे पर गए जो हमारी जान है
वही पूछते हैं यहां आपका क्या काम है

अपनी बदनामी का गम उसे ही होता है 'प्रखर'
जिसका इस जहान में नेकी से जुड़ा नाम है

24. 

मेरे जज्बात समझने के काबिल बन जाओ
मैं बहता हुआ दरिया हूँ साहिल बन जाओ

तुम मुझसे मोहब्बत की बात बाद में करना
पहले तुम मेरी जान मेरा दिल बन जाओ

अब तक तो जमाने से सिर्फ गम मिला मुझको
तुम मेरे लिए खुशियों का हासिल बन जाओ

बरसों से अकेला हूँ इस दुनिया की भीड़ में
तुम चाहत भरी यादों की महफिल बन जाओ

मैं जिसके लिए 'प्रखर' बेचैन रहता हूँ
तुम वो ही मेरे चैन की मंजिल बन जाओ


25. 

हम थक गए हैं अब तो रास्ते बदल - बदलके
संभले हैं दोस्तों हम हरदम फिसल - फिसलके

हमको सफर में ठोकर दिया मुसाफिरों ने
देखे हैं अपनी हद से आगे निकल - निकलके

आयी बाहर जब तो इक गुल को हम भी चाहे
उसने हमें जलाया यूँ ही मचल - मचलके

इतनी ऊँचाई पर था अपना मुकाम यारों
छू पाये नहीं उसको हारे उछल - उछलके

कुदरत ने माँगने से कुछ ना दिया है 'प्रखर'
हम रह गये हथेली अपनी मसल - मसलके


26.


बेमजा सफर होता हमसफर बिना
राह सूनी लगती है रहगुजर बिना

कितने भी हसीन नजारें हो दोस्तों
लगते हैं बेकार दोस्त की नजर बिना

साथ में साथी हो तो कुछ और बात हो
तनहाई का मजा होता है असर बिना

अपनी फिकर तो जहान में सभी को है
फिकर भी क्या किसी अपने की फिकर बिना

पहुँचे थे इक बार पहाड़ों की भीड़ में
लौटके आये 'प्रखर' होकर कदर बिना

27.


दोस्तों कभी दगा का काम ना करना
दोस्त गम में हो तो तुम आराम ना करना

दोस्ती के दम से ही दुनिया हसीन है
दोस्ती के नाम को बदनाम ना करना

जो तुम्हारे वास्ते हर राज रखता है
उसके राज का कभी कोहराम ना करना

दोस्त को उठाके नाम कमाना मगर
दोस्त को दबाके अपना नाम ना करना

दोस्ती करना आसान होता है 'प्रखर'
ऐसी बातों का कभी पैगाम ना करना

28.


आपको क्या खबर कितने हम बेखबर
हमको कितनी फिकर आप हैं बेफिकर

यार अपना याराना भी क्या खूब है
आपकी कुछ डगर हमारी कुछ डगर

हम परेशान हैं आप अलमस्त हैं
फिर भी हम दोनों पे प्यार का है असर

रास्ते हैं अलग हैं अलग मंजिलें
दोनों इक-दूसरे पर रखे हैं नजर

बात का मेल जज्बात के मेल से
ना मिले तो भी मिलते रहेंगे 'प्रखर'

29. 

मालूम है कि सिर्फ ये मतलब का याराना है
दिल में नहीं मोहब्बत तो फुर्सत का बहाना है

इतने दिनों में आपको हम जान गये इतना
कितने में आप हैं हमें अब ये ना बताना है

सब जानके चुपचाप हम पडे़ हैं अभी तक
क्योंकि हमें ये रिश्ता आगे भी निभाना है

जो सामने है उसको ही याद रखेंगे हम
जो बीत गया उसकी हर बात भुलाना है

'प्रखर' यही है यारी का सिर्फ इक मतलब
मिल ना सके बहुत कुछ तो कुछ ही मिलाना है

30.

दिन आए या ना आए यह रात बदलती है
इक बार हर किसी की औकात बदलती है

दूल्हा भी एक रात का राजा ही होता है
बाराती वही रहते बारात बदलती है

जो बोलते हैं बातें वे इतना जान ले
बातों का फेर होवे तो बात बदलती है

कुछ समझ उमर से भी आती है दोस्तों
जज्बात बदलते तो कायनात बदलती है

अश्कों में भींगके ये हमने जाना है 'प्रखर'
बादल के साथ-साथ ये बरसात बदलती है



31.


कोई कहता सबसे प्यारा चांद है
कोई कहे सबसे प्यारा गुलाब है

मैं कहता हूँ सबसे प्यारा है वही
जिसके रुख पे प्यार का रूआब है

जिसको पाकर बेताबी बढ़ती रहे
आखिर वो किस काम का शबाब है

जिसको अपने होश से हो बेरुखी
उसको ही प्यारी लगती शराब है

'प्रखर' मैं तो उसकी ही तारीफ करूँ
प्यार करता जो भी बेहिसाब है



32. 

इस दर्द की बस्ती से हम दूर नहीं यारों
यह बात अलग है हम मजबूर नहीं यारों

ताल्लुक है हमारा भी मजदूर घराने से
बस फर्क यही है हम मजदूर नहीं यारों

जो अपनी मुसीबत के दिन भूल सके दिल से
कोई भी यहाँ उतना मशहूर नहीं यारों

हालात बदलने से जज्बात बदल जाते
ये बात हमें बिल्कुल मंजूर नहीं यारों

कीचड़ से सनी काया को देख कभी थूके
ये शख्स 'प्रखर' इतना मगरूर नहीं यारों

33.


जब बेबसी गरीबी की बात आती है
गरीबों के मसीहा की याद आती है

वक्त वो इतिहास का लौट आता है
जब कभी गुलामी की रात आती है

जहाँ दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ना मना है
सोचो वहाँ पे कैसी बारात आती है

अश्कों के पानी दिन में कई बार गिरते हैं
मजदूरों को रोज ही बरसात आती है

हिम्मत सभी में जुल्म से लड़ने की नहीं 'प्रखर'
सौ में किसी इक को औकात आती है

34.


प्यार की बातें करो तकरार की नहीं
लत रखो इकरार की इनकार की नहीं

जंग से तो फैसला होता नहीं यारों
हाथ की बातें करो हथियार की नहीं

दूर रहने से मिलन होता अधूरा है
लिपटने की धुन रटो दीदार की नहीं

राजनेता कब बँधे हैं जाति मजहब में
बात बस खुद की करो सरकार की नहीं

'प्रखर' असली जायका है घर के खाने में
बात घर की ही करो बाजार की नहीं


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