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सोमवार, 4 नवंबर 2019

लज़्ज़त-ए-अलम (ग़ज़ल संग्रह)



भूमिका

देवचंद्र भारती 'प्रखर' के इस ग़ज़ल संग्रह 'लज़्ज़त-ए-अलम' की अधिकांश ग़ज़लें कताबंद हैं, क्योंकि अधिकांश ग़ज़लों के विभिन्न शेर एक ही विषय से संबद्ध हैं । इस 'कता-संग्रह' के अधिकांश कता में प्यार, बेवफाई और रूमानियत है । गीत, दुःख और रोमानी जमीन से प्रभावित कता में भावुकता अधिक है ।

'लज़्ज़त-ए-अलम' का अर्थ होता है - 'दुःखों का आनंद' । 'प्रखर' अपने प्यार के दर्द को बयां तो करते ही हैं, साथ ही प्यार के दर्द से मुक्त होने और दर्द में मजा मिलने की हालत को भी अभिव्यक्त करते हैं । इस संग्रह के ज़्यादातर 'कता' अपने से संवाद करते हैं, न कि ज़माने से ।

'प्रखर' की अभिव्यक्ति में ईमानदारी और सादगी है । इनकी भाषा में न तो बनावटीपन है और न ही वह बोलचाल की भाषा से दूर हुई है । पंक्तियों में लय और प्रवाह है । रूमानी भावभूमि पर कही गई बात अक्सर संवादों के रूप में होती है । उदाहरण के लिए इनके दो अशआर देखिए -

मिलना तो इक बहाना था 
तुमको बस आज़माना था 

मिलने के लिए तुमको बोला 
लेकिन तुमको ना आना था 

एक ग़ज़ल के हर अशआर अलहदा भावभूमि के होते हैं । यहाँ दो अशआर एक ही भावभूमि के हैं, इसलिए इसे 'रुबाई' कहना ही ठीक होगा । 'प्रखर' की अनेक पंक्तियों को पढ़ते हुए चर्चित फिल्मी गीतों और लोकप्रिय ग़ज़लों की पंक्तियाँ या धुनें याद आती हैं । मसलन ये पंक्तियाँ सुनिए और गुनिए -

इक नज़र देखकर मुस्कुरा दीजिए 
हाल दिल का नहीं यूँ बुरा कीजिए 

       *    *    *    *    *

तुम्हें देखकर दिल मचलने लगा है 
इरादों का पर्वत पिघलने लगा है 

       *    *    *    *    *

प्यार करके हमें इक हसीन रूप से 
सिवाय दर्द के और कुछ ना मिला 

व्यवस्था की आलोचना या व्यवस्थाजन्य दमन का प्रतिरोध 'प्रखर' के यहाँ कम ही दिखाई पड़ता है । शोषण का प्रतिरोध उनकी इन पंक्तियों में बहुत सादगी और पुरअसर ढंग से उभर आया है ।

जहाँ दूल्हे को घोड़ी पे चढ़ना मना है 
सोचो वहाँ पे कैसी बारात आती है 

'प्रखर' के कई अशआर सुंदर बन गए हैं । उन अशआर में बात कहने का ढंग सुंदर है और उनमें कोई न कोई बोलती हुई बात है ।

डाॅ० अजीत प्रियदर्शी 
एसोसिएट प्रोफेसर - डी०ए०वी० कॉलेज, लखनऊ

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मेरे जज़्बात

बरसों से मुझे इस बात की शिकायत है कि ज़्यादातर लोग मेरे जज़्बात को समझ नहीं पाते हैं । इसलिए जब मुझे ग़ज़ल लिखने का मौका मिला तो मैंने एक ग़ज़ल में अपने इस जज़्बात को अभिव्यक्त कर दिया । 

मेरे जज़्बात समझने के काबिल बन जाओ
मैं बहता हुआ दरिया हूँ साहिल बन जाओ 


अपने इस ग़ज़ल संग्रह 'लज़्ज़त-ए-अलम' में मैंने प्यार, बेवफाई, दोस्ती और ज़माने के प्रति अपने अनुभवों को ग़ज़ल के रूप में संग्रहीत किया है । मुझे उम्मीद है कि इस पुस्तक को पढ़कर पाठक अपने मन की धारणा को अवश्य परिवर्तित कर लेंगे । प्यार करना, प्यार में दर्द पाना और उस दर्द के ग़म में डूबकर अपने आपको शराब में डुबो लेना अथवा अन्य बुरी आदतों का शिकार हो जाना; ऐसा तो बहुत लोग करते हैं । लेकिन प्यार में धोखा खाकर जब कोई व्यक्ति साहित्यकार अथवा अन्य कोई कलाकार बन जाए और अपनी कला के माध्यम से समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी हो सके, तो इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है ?

इक बार जब पढ़ोगे तुम 'लज़्ज़त-ए-अलम'
मुझको    यकीन   है  पढ़ते     रहोगे    हरदम

ग़म है सजा मगर है ग़म में भी इक मजा
एहसास ये हकीकत  है  ना  कोई  वहम 

तथागत गौतम बुद्ध ने कहा है - दुःख सत्य है ।  जब दुःख सत्य है और संसार में दुःख होना अनिवार्य है, तो दुःख से भागने का असफल प्रयास करना कुंठित मानसिकता का परिचायक है । अतः बुद्धिमान व्यक्ति दुःख से भागने की बजाय दुःख से लड़ने के लिए अपने आपको तैयार करता है । दुःख से वही लड़ सकता है, जिसमें उतनी क्षमता हो । व्यक्ति में संघर्ष के प्रति क्षमता तभी आती है, जब वह धैर्यवान हो । व्यक्ति धैर्यवान तभी हो सकता है, जब वह विनम्र विनम्र हो और विनम्रता तभी आ सकती है, जब वह शील गुणों से युक्त हो । व्यक्ति शीलवान तभी हो सकता है, जब उसे शील की शिक्षा और उपयुक्त परिवेश प्राप्त हो ।

प्यार और दोस्ती के ऊपर भी परिवेश का प्रभाव पड़ता है । व्यक्ति जैसे परिवेश में रहता है उसी के अनुसार वह प्यार और दोस्ती का अर्थ ग्रहण करता है । आज के परिवेश में लोग भले ही समय बिताने के लिए प्यार और दोस्ती करते हों, किंतु इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि हर व्यक्ति अकेलेपन में प्रेम की आवश्यकता और तड़प को अवश्य अनुभव करता है । हाँ, यह बात अलग है कि कुछ लोगों को बुरी आदत होती है, कि वे मौसम की तरह बदल जाते हैं । आज की परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों; आज भी सच्चे प्रेमी और सच्चे दोस्त, कम ही सही, किंतु अवश्य मिल जाते हैं ।

बहुत कुछ परिस्थितियों में परिवर्तन करना मनुष्य के लिए संभव होता है; जैसे - निर्धनता, भूखमरी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार आदि समस्याओं को राष्ट्र की सरकार बहुत अधिक सीमा तक नियंत्रित कर सकती है । कुछ इन्हीं आशाओं के साथ मैंने इस संग्रह के अंत में इन्हीं भावनाओं से ओत-प्रोत कुछ ग़ज़लें सम्मिलित की हैं ।

मेरी इस पुस्तक की भूमिका लिखने के लिए एसोसिएट प्रोफेसर डॉ० अजीत प्रियदर्शी जी का मैं हृदय से आभारी हूँ तथा इस पुस्तक को मुद्रित और प्रकाशित करने हेतु रवीना प्रकाशन  के प्रकाशक महोदय जी का भी मैं आभार प्रकट करता हूँ ।

*15 नवंबर 2019  बिरसा मुण्डा जयंती 

                                        ✍️  देवचंद्र भारती 'प्रखर'

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1. 

दिलकशी के लिए दिलनशीं चाहिए
आशिकी़ के लिए हमनशीं चाहिए

लफ़्ज़ में हो नमी हो नज़र में हया
जिसमें होवे लिहाज़ वो हँसी चाहिए

जिससे बेचैन दिल को सुकून मिल सके
दिल की चाहत है वो ही खुशी चाहिए

जी चुके हैं बहुत होके मजबूर हम
अब ज़रा भी नहीं बेबसी चाहिए

जिसके दिल से ये दिल मिल सके ठीक से
अब तो 'प्रखर' को दिलबर वही चाहिए

2.

इक नज़र देखकर मुस्कुरा दीजिए
हाल दिल का नहीं यूँ बुरा कीजिए

खूबसूरत हैं तो फिर ये परदा है क्यों
रुख़ से परदे को थोड़ा गिरा दीजिए

क़त्ल कर दीजिए है इरादा अगर
यूँ मगर ना हमें अधमरा कीजिए

ऐसे कैसे जीएँगे बिना आपके
अपने दीदार का आसरा दीजिए

सूख जाएँ ना बेचैन होके 'प्रखर'
प्यार से सींचकर कुछ हरा कीजिए

3.


अजी ! आपकी याद आती बहुत है
आ करके दिल को सताती बहुत है

मेरी दिल्लगी से ना आप रूठ जाएँ
ये बात दिल को डराती बहुत है

कैसे आपके रुख़ से नज़रें हटा लूँ
ये खूबसूरती लुभाती बहुत है

मेरे वास्ते आपके दिल में क्या है
ये ख़्वाहिश बेताबी बढ़ाती बहुत है

जो है फासला उमर का ये जियादा
'प्रखर' बेबसी ये रुलाती बहुत है


4.

दिन हसीन सारे होते
अगर आप हमारे होते

हमारी नज़र के सुरमा
कुदरती नजारे होते

हम भी आसमां के कोई
चमकते सितारे होते

तब तो हीरे से कीमती
हमारे इशारे होते

हम भी धारा होते 'प्रखर'
तब नहीं किनारे होते


5.


तुम्हें देखकर दिल मचलने लगा है
इरादों का पर्वत पिघलने लगा है

मेरे दिल की अंधेरी इस कोठरी में
दीया मोहब्बत का जलने लगा है

जो बार-बार ओहदे की याद दिलाता था
वो दिन अब ख़यालों का ढलने लगा है

मेरे जिस भरोसे के पाँव थक चुके थे
वही अब धीरे-धीरे चलने लगा है

हसीनों से नफ़रत मुझे हो गई थी
'प्रखर' अब मगर दिल बदलने लगा है

6.


बहुत खूबसूरत हैं आँखें तुम्हारी
बहुत प्यारी लगती हैं बातें तुम्हारी

कि अब तो मेरा दिल ना मेरा रहा
मेरे दिल में है अब तो यादें तुम्हारी

जो इक बार तुम पास से मेरे गुज़री
जलाती हैं वो गरम साँसे तुम्हारी

मेरे सारे दिन हो गये अब तुम्हारे
मेरी रातें भी अब हैं रातें तुम्हारी

'प्रखर' नींद आती तभी जब मैं सोता
सीने से तस्वीर लगाके तुम्हारी

7.


तुम्हें प्यार करने को जी चाहता है
तुम्हीं पे ही मरने को जी चाहता है

अगर प्यार की कोई हद होती है तो
उस हद से गुज़रने को जी चाहता है

मैं चिढ़ता था जब दूसरे आह भरते
कि अब आह भरने को जी चाहता है

कभी भी जमाने से ना मैं डरा हूँ
ज़माने से डरने को जी चाहता है

ये कैसा असर प्यार का है 'प्रखर' कि
खुद ही बिखरने को जी चाहता है

8.

कभी मेरी गली में भी आया करो
आ सको ना तो मुझको बुलाया करो

दूर से ही अदाएँ दिखाती हो तुम
पास से भी कभी गुज़र जाया करो

तुमको खामोश देखूँ तो डर जाता हूँ
मैं दिखूँ तो जरा मुस्कुराया करो

तिरछी नज़रों से तुम देखती हो मुझे
है गुजारिश की नजरें मिलाया करो

चाहती हो मुझे जानते हैं 'प्रखर'
पूछने पे ना बातें बनाया करो

9.


तुमसे जब बात ना होती तो दिल घबराता है
तुमसे बातें करने को ये दिल तड़प जाता है

जाने कैसा ये रिश्ता है तुम्हारा और मेरा
तुम्हारी बातें सुनने को दिल मचल जाता है

मेरे कानों में जब भी पड़ती है आवाज तुम्हारी
सच ही कहता हूँ ये मौसम भी बदल जाता है

जिस सुबह तुमसे ना होती है प्यार से बातें
उस सुबह से लेकर सारा दिन बिगड़ जाता है

प्यार समझो इसको या समझो मेरा पागलपन
रूठती हो तो 'प्रखर' का दिल निकल जाता है


10.

तुम अमीर हो और मैं ग़रीब हूँ
खुशनसीब तुम हो मैं बदनसीब हूँ

तुम्हारी हबीब खुशियाँ हैं जहान की
ग़म मेरा हबीब मैं ग़म का हबीब हूँ

ख्वाहिशें तुम्हारी छूतीं आसमान को
तमन्ना से मैं ज़मीन के करीब हूँ

तुम्हारे हालात मुझसे हैं बहुत जुदा
इसी से तुम्हें लगता मैं अजीब हूँ

'प्रखर' यह रिश्ता हमारा कामयाब हो
यही माँगता कुदरत से मैं अदीब हूँ


11.

साथ तुम्हारा पाकर जिंदगी है मजे में
मैं भी रहने लगा हूँ अब बड़े कायदे में

पहले नुकसान होता रोता रहता गमों में
अब खुशी मिल रही है मैं हूँ अब फायदे में

जब थी तनहाई मेरा साथ मय ने निभाया
मैंने छोड़ा है जाना मय के उस मयकदे में

तब तो पीकर नशे में रहता मदहोश दिनभर
अब भी हालत वही है प्यार के इस नशे में

पास रहती हो जब तो बात कुछ और होती
'प्रखर' वो ही बेताबी होती है फासले में

12.

तुम्हीं मेरी शायरी हो तुम्हीं हो ग़ज़ल
हर तरफ नज़र आती तुम्हीं आजकल

तुम्हारा हसीन चेहरा है गुलाब सा
तुम्हारी ये आँखें हैं झील का कमल

तड़प जाती जान मेरी जब कभी भी तुम
मेरी इन आँखों से हो जाती ओझल

पहले तो दीवाना ही था मैं तुम्हारा
मगर लगता है अब हो गया हूँ पागल

हस्ती 'प्रखर' की क्या है तुम्हारे बिना
तुम्हारी ही आहट सुनता हूँ मैं हर पल


13.

तुम्हारे बिना तो मैं था अधूरा
तुम मिल गई तो हो गया हूँ पूरा

अब हो गया हूँ सोने के जैसा
इससे पहले तो मैं था धतूरा

तुम बन गई हो मेरी दवाएँ
वरना ये आलम था कनखजूरा

सफेदी चढ़ी थी बालों पे मेरे
अब हो गया है कुछ रंग भूरा

तुम्हीं देखती हो प्यार से 'प्रखर' को
हर हसीना ने मुझको है घूरा


14.

खुश्बू गुलाब की सभी के लिए
कैसे मैं तुमको गुलाब कहूँ

मुँह से लगाते सभी शराब को
कैसे मैं तुमको शराब कहूँ

छूते हैं हरदम सभी किताब को
कैसे मैं तुमको किताब कहूँ

तुम तो जवाब हो मेरे सवाल का
कैसे तुम्हें लाजवाब कहूँ

तुम तो हो मेरी हकीक़त 'प्रखर'
कैसे तुम्हें इक ख्वाब कहूँ


15.


तुम भरोसा मेरी बातों का क्यों नहीं करती
जो भी तुम्हारे दिल में है वो क्यों नहीं कहती

प्यार करती हो तुम मुझसे और गुस्सा भी
ऐसा ही मैं भी करता हूँ तो क्यों नहीं सहती

अपने जज्बातों की बातें छेड़ देती हो
मेरे जज्बातों में तुम बोलो क्यों नहीं बहती

बोलती हो तुम जब भी तो बोलती जाती
मेरी बातें सुनने को चुप तुम क्यों नहीं रहती

मेरे बिन ना रह सकती हो कसम खाती हो
तो 'प्रखर' कहते हैं जो वो क्यों नहीं कहती


16.

तू मान या ना मान मेरी जान है तू
तू मेरा धरम है और ईमान है तू

तू जब से मिली है मुझे बिंदास रहता हूँ
तू मेरी आन और मेरी शान है तू

जब नाम तुझसे जुड़ गया तो नाम हो गया
पहचान तुझसे है मेरी पहचान है तू

मैं जानता हूँ कि तुझे दुनिया की ख़बर है
अफ़सोस है मुझसे अभी अनजान है तू

'प्रखर' की पूरी बात को समझ नहीं पाती
मैं समझता हूँ कि बड़ी नादान है तू


17.


तुमसे नाराज़ होकर खुश तो मैं भी नहीं था
सिर्फ वो जिद्द ही थी और कुछ भी नहीं था

रात भर तुम भी जागी मैं भी ना सो सका था
खोई थी तुम जहाँ पे मैं भी खोया वहीं था

दूर तुम थी मगर थी पास तस्वीर तुम्हारी
इक पल के लिए भी उससे ओझल नहीं था

जब भी फुर्सत में होता दिल ये खामोश रोता
उस दिमागी वहम में दिल तो मजबूर ही था

कुछ भी हासिल हुआ ना अब है अफ़सोस 'प्रखर'
ना तो तुम ही गलत थी ना ही मैं भी सही था


18.

मेरे और तुम्हारे बीच में
कोई तीसरा नहीं आए

आओ आज हम दोनों मिलके
साथ में कसम यही खाएँ

दूर हों हम चाहे पास हों
प्यार का एहसास ना जाए

जिस्म चाहे दो होवें मगर
जान इक ही हम बन जाएँ

आओ हम जज़्बात इक कर लें
'प्रखर' बातें भी इक हो जाएँ


19.

काश अभी तुम मेरे पास होती
तब तो सारी बातें खास होती

बाँहों में होतीं तुम्हारी बाँहें
साँसों में तुम्हारी साँस होती

मिलने की इस बेताबी में जानम
कुछ तो कम इस दिल की प्यास होती

मखमल से भी कोमल मुझे लगती
धरती पे जैसी भी घास होती

दावा है तुमको मना ही लेता
'प्रखर' तुम अगर उदास होती


20. 

मिलना तो एक बहाना था
तुमको बस आज़माना था

मिलने के लिए तुमको बोला
लेकिन तुमको ना आना था

तुम ना आयी शायद हमको
इस बात पे ही टकराना था

अच्छा ही हुआ हम बिछड़ गये
वरना आगे पछताना था

जब दिल में मोहब्बत ना थी 'प्रखर'
बेकार ही दिल का लगाना था


21. 

तुम्हारी यादें ही मेरी ग़ज़ल बन गईं
तुम्हारी बातें ही मेरी ग़ज़ल बन गईं

कभी था प्यार जिनमें और कभी नफ़रत
तुम्हारी आँखें ही मेरी ग़ज़ल बन गईं

तुमसे मिलकर जो साँसो से साँसे टकराईं
सुलगती साँसे ही मेरी ग़ज़ल बन गई

छोड़के मुझको तुम चल दी अकेले जब तो
वो तनहा रातें ही मेरी ग़ज़ल बन गईं

जो कभी तुमने दी 'प्रखर' खुशी से मुझको
ग़म की सौगातें ही मेरी ग़ज़ल बन गईं


22.


चार नज़रों का चलता रहा सिलसिला
कर गये हम वफा बस हुई ये गिला

प्यार करके हमें एक हसीन रूप से
सिवाय दर्द के और कुछ ना मिला

प्यार हमने किया उसने खिलवाड़ की
उसकी हरकत से बार-बार दिल ये हिला

हम तरसते रहे उसके इंतजार में
प्यार का फूल वो ना हमारा खिला

जिसमें चाहत की रंगीनियाँ थी 'प्रखर'
खण्डहर बन गया आज वो ही किला

23.


मासूम चेहरे से प्यार कर बैठे
सोचे बिना जांनिसार कर बैठे

मासूमियत का नकाब तब उठा
जब जिंदगी कर्ज़दार कर बैठे

उसकी क्या मर्जी थी जाने बगैर
हम प्यार का इज़हार कर बैठे

रिश्ते बहुत आए थे काबिलों के
सबको ही हम इनकार कर बैठे

नादान इतने थे हम कि 'प्रखर'
ग़म खाने का इक़रार कर बैठे


24. 

दर्द की बाँह में मुस्कुराते रहे
बेवफा पे वफा हम लुटाते रहे

चार आँखें हुई जुर्म इतना हुआ
उसका जुर्माना बरसों चुकाते रहे

इक पत्थर को ही देवता मानकर
उसकी चौखट पे सिर को झुकाते रहे

दर्द समझा नहीं जो हमारा कभी
उसको हमदर्द अपना बताते रहे

वो नशा था कि सच जानकर भी 'प्रखर'
झूठ के वास्ते चोट खाते रहे


25.


जल्दी में दिल को लगाया था हमने
जल्दी ही प्यार को बढ़ाया था हमने

जल्दी ही प्यार का अंजाम मिल गया
जल्दी ही धोखा भी खाया था हमने

ठोकर लगी लड़खड़ाये थे लेकिन
गिरने से खुद को बचाया था हमने

दिल-दिमाग मजबूत था फिर भी खुद को
उल्फत में कमजोर पाया था हमने

जल्दी का काम शैतान का 'प्रखर'
कुछ ऐसा ही कर दिखाया था हमने



26.


जल्दी जल्दी में जल्दी नजारा मिल गया
जल्दी डूबे जल्दी ही किनारा मिल गया

जल्दबाजी में बहुत बुरा हुआ मगर
अच्छा हुआ जल्दी छुटकारा मिल गया

खुशी की तलाश में हम पकड़े रास्ता
क्या करें वही ग़म दोबारा मिल गया

हर कोई किसी के सहारे जीता है दोस्त
हमें तो कलम का सहारा मिल गया

अब मलाल है नहीं अंधेरे का 'प्रखर'
अंधेरे में ही इक सितारा मिल गया


27.


ना ही तुम्हारे आने की खुशी है
ना ही तुम्हारे जाने का ग़म होगा

अब मेरे दिल में प्यार वो रहा ना
अब बेचैनी का भी ना आलम होगा

वाकिफ़ हूँ मैं अब तुम्हारे जफा से
अब दोबारा ना मुझको वहम होगा

बातों में मैं-तुम के अल्फाज होंगे
गलती से भी ना होंठों पर हम होगा

'प्रखर' इन सबका जिम्मेदार कौन है ?
अब जवाब से ना फासला कम होगा


28.


पहले तो जिंदगी उलझी नहीं
इक बार उलझी तो सुलझी नहीं

प्यारी लगी मुझको इक बेवफा
प्यार का जो मतलब समझी नहीं

रूठी घटा जब वो इक बार तो
फिर मेरे वास्ते बरसी नहीं

छोड़े थे ये कदम जिस लीक को
वो लीक अब कभी जँचती नहीं

 बदले 'प्रखर' वक्त के साथ में
 वक्त की तरह बदले अब भी नहीं


29.


क्या कहूँ कहा नहीं जाता
बिन कहे रहा नहीं जाता

सोचता हूँ सब कुछ सह जाऊँ
क्या करूँ सहा नहीं जाता

बह गये सब धारा में मगर
मुझसे ही बहा नहीं जाता

दीवाने मयखाने में गए
मैं हूँ कि वहाँ नहीं जाता

मैं भीगा हूँ अश्कों से 'प्रखर'
उनका कहकहा नहीं जाता


30. 

जो ज़माना था कभी वो ज़माना ना रहा
वो हमारे प्यार का आशियाना ना रहा

जिंदगी की राह में आशिकी के मोड़ पे
जो मिला था इक दिन वो ख़जाना ना रहा

वक्त के आगोश में दर्द सारे सो गये
अब नये एहसास में ग़म पुराना ना रहा

खोये थे अतीत में जिसके बहाने से हम
बह गया अतीत अब वो बहाना ना रहा

दिल की तरकस में अभी तीर नजरों के वही
बात ये है कि 'प्रखर' वो निशाना ना रहा



31. 

क्या कहें क्या हुआ है दुबारा
आज फिर है मुकद्दर ने मारा

आज फिर डगमगायी है किश्ती
आज फिर खो गया है किनारा

आँखों में आँसू वो दे गया है
बन गया था जो आँखों का तारा

हाथ में फिर उजाले को देकर
ले गया छीनके अँधियारा

आज फिर हमने देखा है 'प्रखर'
दिल के गुलशन का उजडा़ नजारा

32. 

मेरी तन्हाई का आलम तुम क्या जानो ?
मेरे दिल में है कितना गम तुम क्या जानो ?

यूँ ही दुनिया से छुप-छुपके रोते-रोते
गुजारा हूँ कितने मौसम तुम क्या जानो ?

जिसको मैं चाहा था उसकी झलक पाने को
कितना तरसा हूँ मैं हरदम तुम क्या जानो ?

बेवफाई की सर्दी में सर्द हो करके
किस तरह चुभती है शबनम तुम क्या जानो ?

'प्रखर' राहों में जो पाया उन काँटों को
कैसे कर पाया हूँ मैं कम तुम क्या जानो ?


33. 

हमको अच्छाई का मिला यह बुरा अंजाम है
किये हैं कुछ भी नहीं बस बोलकर बदनाम है

दिन गुजर गया किसी तरह हुजूम में मगर
फिक्र बढ़ती जा रही जब से ढली ये शाम है

पूछते हैं दोस्त हमसे क्यों खोये हुए हो दोस्त
क्या बताएँ दोस्तों दिल को नहीं आराम है

उनके दरवाजे पे गये जो हमारी जान हैं
वही पूछते हैं यहाँ आपका क्या काम है

अपनी बदनामी का ग़म उसे ही होता है 'प्रखर'
जिसका इस जहान में नेकी से जुड़ा नाम है


34. 

मेरे जज़्बात समझने के काबिल बन जाओ
मैं बहता हुआ दरिया हूँ साहिल बन जाओ

तुम मुझसे मोहब्बत की बात बाद में करना
पहले तुम मेरी जान मेरा दिल बन जाओ

अब तक तो ज़माने से सिर्फ ग़म मिला मुझको
तुम मेरे लिए खुशियों का हासिल बन जाओ

बरसों से अकेला हूँ इस दुनिया की भीड़ में
तुम चाहत भरी यादों की महफिल बन जाओ

मैं जिसके लिए 'प्रखर' बेचैन रहता हूँ
तुम वो ही मेरे चैन की मंजिल बन जाओ


35. 

हम थक गये हैं अब तो रास्ते बदल - बदलके
संभले हैं दोस्तों हम हरदम फिसल - फिसलके

हमको सफर में ठोकर दिया मुसाफिरों ने
देखे हैं अपनी हद से आगे निकल - निकलके

आयी बहार जब तो इक गुल को हम भी चाहे
उसने हमें जलाया यूँ ही मचल - मचलके

इतनी ऊँचाई पर था अपना मुकाम यारों
छू पाये नहीं उसको हारे उछल - उछलके

कुदरत ने माँगने से कुछ ना दिया है 'प्रखर'
हम रह गये हथेली अपनी मसल - मसलके


36.


बेमजा सफर होता हमसफर बिना
राह सूनी लगती है रहगुजर बिना

कितने भी हसीन नजारें हो दोस्तों
लगते हैं बेकार दोस्त की नज़र बिना

साथ में साथी हो तो कुछ और बात हो
तनहाई का मजा होता है असर बिना

अपनी फिकर तो जहान में सभी को है
फिकर भी क्या किसी अपने की फिकर बिना

पहुँचे थे इक बार पहाड़ों की भीड़ में
लौटके आये 'प्रखर' होकर कदर बिना


37.


दोस्तों कभी दगा का काम ना करना
दोस्त ग़म में हो तो तुम आराम ना करना

दोस्ती के दम से ही दुनिया हसीन है
दोस्ती के नाम को बदनाम ना करना

जो तुम्हारे वास्ते हर राज रखता है
उसके राज का कभी कोहराम ना करना

दोस्त को उठाके नाम कमाना मगर
दोस्त को दबाके अपना नाम ना करना

दोस्ती करना आसान होता है 'प्रखर'
ऐसी बातों का कभी पैगाम ना करना


38.


आपको क्या खबर कितने हम बेखबर
हमको कितनी फिकर आप हैं बेफिकर

यार अपना याराना भी क्या खूब है
आपकी कुछ डगर हमारी कुछ डगर

हम परेशान हैं आप अलमस्त हैं
फिर भी हम दोनों पे प्यार का है असर

रास्ते हैं अलग हैं अलग मंजिलें
दोनों इक-दूसरे पर रखे हैं नज़र

बात का मेल जज़्बात के मेल से
ना मिले तो भी मिलते रहेंगे 'प्रखर'


39. 

मालूम है कि सिर्फ ये मतलब का याराना है
दिल में नहीं मोहब्बत तो फुर्सत का बहाना है

इतने दिनों में आपको हम जान गये इतना
कितने में आप हैं हमें अब ये ना बताना है

सब जानके चुपचाप हम पडे़ हैं अभी तक
क्योंकि हमें ये रिश्ता आगे भी निभाना है

जो सामने है उसको ही याद रखेंगे हम
जो बीत गया उसकी हर बात भुलाना है

'प्रखर' यही है यारी का सिर्फ इक मतलब
मिल ना सके बहुत कुछ तो कुछ ही मिलाना है


40

ऐ जिंदगी ! तू हँसाती है क्यों ?
हँसाती है तो फिर रुलाती है क्यों ?

तेरा करम है हँसाना-रुलाना
तो फिर तू आँसू बहाती है क्यों ?

जुदा करना हो जब तुझे दोस्तों को
तो दोस्तों को मिलाती है क्यों ?

तू बेवफा है सभी जानते हैं
तो हमसे दिल तू लगाती है क्यों ?

जब मौत के ही हवाले तू करती
तो फिर 'प्रखर' को सताती है क्यों ?

41.

दिन आए या ना आए ये रात बदलती है
इक बार हर किसी की औकात बदलती है

दूल्हा भी इक रात का राजा ही होता है
बाराती वही रहते बारात बदलती है

जो बोलते हैं बातें वे इतना जान लें
बातों का फेर होवे तो बात बदलती है

कुछ समझ उमर से भी आती है दोस्तों
जज़्बात बदलते तो कायनात बदलती है

अश्कों में भींगके ये हमने जाना है 'प्रखर'
बादल के साथ-साथ ये बरसात बदलती है



42.


कोई कहता सबसे प्यारा चाँद है
कोई कहे सबसे प्यारा गुलाब है

मैं कहता हूँ सबसे प्यारा है वही
जिसके रुख़ पे प्यार का रूआब है

जिसको पाकर बेताबी बढ़ती रहे
आखिर वो किस काम का शबाब है

जिसको अपने होश से हो बेरुखी
उसको ही प्यारी लगती शराब है

'प्रखर' मैं तो उसकी ही तारीफ करूँ
प्यार करता जो भी बेहिसाब है



43. 

इस दर्द की बस्ती से हम दूर नहीं यारों
ये बात अलग है हम मजबूर नहीं यारों

ताल्लुक है हमारा भी मजदूर घराने से
बस फ़र्क यही है हम मजदूर नहीं यारों

जो अपनी मुसीबत के दिन भूल सके दिल से
कोई भी यहाँ उतना मशहूर नहीं यारों

हालात बदलने से जज़्बात बदल जाते
ये बात हमें बिल्कुल मंजूर नहीं यारों

कीचड़ से सनी काया को देख कभी थूके
ये शख्स 'प्रखर' इतना मगरूर नहीं यारों


44.


प्यार की बातें करो तकरार की नहीं
लत रखो इक़रार की इनकार की नहीं

जंग से तो फैसला होता नहीं यारों
हाथ की बातें करो हथियार की नहीं

दूर रहने से मिलन होता अधूरा है
लिपटने की धुन रटो दीदार की नहीं

राजनेता कब बँधे हैं जात-मजहब में
बात बस खुद की करो सरकार की नहीं

'प्रखर' असली जायका है घर के खाने में
बात घर की ही करो बाजार की नहीं


45.

तुम सलामत रहो ये दुआ है मेरी
तुम रहो चैन से ये रजा है मेरी

इस ज़माने से तुमको मिले हर खुशी
देने वाले से ये इल्तिजा है मेरी

तुमको उल्फत की दौलत हमेशा मिले
हर कदम पे तुम्हारे वफा है मेरी

खुद के दम पे ही चलना हर इक रास्ता
बात सौगात की ये जुदा है मेरी

कायदे जिंदगी के जरूरी 'प्रखर'
कायदे सीखना ये अदा है मेरी


46.

दूर नज़रों से तुम जा रहे हो मगर
दूर दिल से कभी तुम जाना नहीं

अपनी दुनिया में मशगूल रहना मगर
है गुजारिश कि हमको भुलाना नहीं

हम किसी वक्त तुमको बुलाएँ अगर
तुम ना आने का करना बहाना नहीं

हफ्ते में ना सही इक महीने में ही
याद कर लेना यादें मिटाना नहीं

जाने वालों से 'प्रखर' यही माँगते
कभी हमको समझना बेगाना नहीं

47.


इक बार जब पढ़ोगे तुम लज्ज़त-ए-अलम
मुझको यकीन है पढ़ते रहोगे हरदम

ग़म है सजा मगर है ग़म में भी इक मजा
एहसास ये हकीकत है ना कोई वहम

इन्सान गम के दलदल में धँसता है तभी
जब वो पीटता है अपने खयाली कदम

ये प्यार और दोस्ती तो दिल से होते हैं
इनमें दिमाग चलाना होता है बहुत कम

जब जिंदगी ने तोड़ दिया सारी हिम्मतें
'प्रखर' ने ले लिया तभी से हाथ में कलम

48.


आज जिंदगी में वो मुकाम आया है
पुराना तजुर्बा मेरा काम आया है

जो मेरे अतीत का इक हिस्सा था कभी
आज इन लवों पे उसका नाम आया है

इस वक्त को है मेरा शुक्रिया अदा
बरसों बाद दिल को आराम आया है

दोस्तों तुम्हारी इनायत है ये सभी
पहली बार ये सही अंजाम आया है

मैंने हर इक चीज की कीमत चुकाई है
मगर 'प्रखर' आज कुछ बेदाम आया है


49.

किसी जमाने में यारों मेरा भी जमाना था
आज खंडहर हूँ मगर कभी आशियाना था

कभी नई रंगत और नई मजबूती थी
पुराना हूँ अब मगर तब नहीं पुराना था

काबिल-ए-तारीफ थी वो मेरी खूबसूरती
मैं तो कई हसीनों की नज़र का निशाना था

आज मेरा सुर भले ही कोई नहीं सुन रहा
उस वक्त चारों ओर मेरा ही तराना था

लोग मेरे इशारे पे दौड़े चले आते थे
'प्रखर' किसी के भी पास ना कोई बहाना था


50.

बूढ़े ही दीदार से तसल्ली करते हैं
हम तो हैं जवान हमें प्यार चाहिए

यारी की उमर है अभी यारी करेंगे
हमको तो जुनून भरा यार चाहिए

इस दिल को सुकून मिले जिसके पहलू में
वैसा ही हमें इक दिलदार चाहिए

हम जब भी सौदा लेते हैं लेते हैं नकद
हमको तो कुछ भी नहीं उधार चाहिए

'प्रखर' थोड़ी खुशबू से तो जी ना भरेगा
हमको तो खुशबू का भंडार चाहिए


51.

आप यूँ ही सदा मुस्कुराते रहें
शोख नज़रों से मस्ती लुटाते रहें

करके दीदार हमको सुकून मिल सके
इस तरह सामने आप आते रहें

आप ही हैं हमारे लिए आईना
ख़ुद को हम आपसे ही सजाते रहें

आप जब पास होते मजा आता है
यूँ ही ये मेहरबानी दिखाते रहें

आप कहिए अगर तो 'प्रखर' आपको
अपनी ग़ज़लें हमेशा सुनाते रहें


52.

आपको अपनी तरफ हम मोड़ जाएँगे
अपने दिल से आपका दिल जोड़ जाएँगे

भूलकर भी आप हमको नहीं भूलेंगे
हम ऐसी पहचान अपनी छोड़ जाएँगे

अगर अपने बीच में थोड़ा भी है वहम
है यकीन उस वहम को तोड़ जाएँगे

कभी भी हालात हमें बेबसी ना दे
वक़्त की बाँहों को हम मरोड़ जाएँगे

जफ़ा अपने बीच में ना आ सके 'प्रखर'
नींबू की तरह उसे निचोड़ जाएँगे


53.

जो मिल सके ना उसका अरमान क्या करें
इक बेवफा पे जिंदगी कुर्बान क्या करें

जिस हसीना के कई दीवाने हैं दोस्तों
उस हसीना का हम भला बखान क्या करें

जो हमारी मोहब्बत की कदर नहीं करें
उसके लिए निसार हम ईमान क्या करें

काबिल नहीं जो हमारे ओहदे के सामने
हम खयालों में उसका निशान क्या करें

उस बेवफा की खूबसूरती है गज़ब की
इस दिल में 'प्रखर' उठता तूफान क्या करें


54.

हर कली बहार में मचलती नहीं
हर शाम मस्तियों में ढलती नहीं

प्यार हसीनों की है तमन्ना मगर
हर हसीना प्यार से पिघलती नहीं

मोहब्बत की आग होती सभी में मगर
हर समा मोहब्बत में जलती नहीं

चाहतों का बदल जाना सच है मगर
हर किसी की चाहतें बदलती नहीं

'प्रखर' जवानी में खून खौलता मगर
हर जवान की नसें उबलती नहीं


55.


जीने वाले गमों में भी जी लेते हैं
सीने वाले तो दिल को भी सी लेते हैं

मुँह से पीना तो आम बात है दोस्तों
पीने वाले आँखों से भी पी लेते हैं

इस जमाने में जितनी मिले मुश्किलें
चलने वाले फिकर तो नहीं लेते हैं

वैसी होती पसंद जैसी सोच होती है
जिनको जो हो पसंद वे वही लेते हैं

हमने देखा है दुनिया को नजदीक से
वक्त के साथ 'प्रखर' सभी लेते हैं


56.

जिंदगी मोहब्बत की कहानी नहीं
हर खुशी प्यार की निशानी नहीं

जरूरत बुढ़ापे की भी है दोस्तों
जरूरी है केवल जवानी नहीं

ठहरना पड़ेगा जिम्मेदारियों के संग
हमेशा रहेगी ये रवानी नहीं

सिर झुकाना सीख लो अभी से साथियों
वरना काम आएगी कमानी नहीं

समझते ज़बान हैं आँखों की 'प्रखर'
समझते हैं केवल ज़बानी नहीं


57.

काजल को आँसुओं में बह जाते देखा है
फूल जैसे चेहरे को मुरझाते देखा है

ये शोखियाँ अदाओं की हरदम नहीं रहे
इन्हें उमर के साथ ही ढल जाते देखा है

तुम्हारे इस सिर को तान रखी है जो कमर
उसे बुढ़ापे में हमने झुक जाते देखा है

जिस माटी के जिस्म पर तुम नाज करते हो
हमने उसको मरघट पर जल जाते देखा है

'प्रखर' जिनकी खातिर लोग जुर्म करते हैं
उन्हें उनकी लाश को सुलगाते देखा है


58.

क्या से क्या बन गये नौकरी के लिए
कुछ नया बन गये नौकरी के लिए

पहले तो हम सुलगती हुई आग थे
अब धुआँ बन गये नौकरी के लिए

राह की ठोकरें हम लगे झेलने
खुद सजा बन गये नौकरी के लिए

इक तमन्ना जगी और मकसद बनी
हम खुदा बन गये नौकरी के लिए

जिंदगी के कई कायदे हैं 'प्रखर'
कायदा बन गये नौकरी के लिए


59.

दौलत कमा लिए हम शोहरत कमा लिए हम
अब याद आ रहा है परिवार वो हमारा

हम नौकरी की खातिर जिस प्यार से जुदा थे
हमको बुला रहा है अब प्यार वो हमारा

हम जिससे अपने दिल की हर बात सुनाते थे
सपने में आ रहा है अब यार वो हमारा

जिस नीम के तले हम दरबार लगाते थे
आहट सुना रहा है दरबार वो हमारा

'प्रखर' पुरानी यादें फिर से नयी हुई हैं
आँखों पे छा रहा है बाजार वो हमारा


60.

कल अचानक मैं पत्थर से टकरा गया
गिर गया चोट खाके मैं चकरा गया

चाल थी तेज इतनी कि रुक ना सका
गाड़ी को रोकते वक्त घबरा गया

सोचते-सोचते रास्ता चलने का
दर्द से भरा अंजाम मैं पा गया

मैं मुकद्दर पर अफ़सोस कैसे करूँ
अपनी गलती की ही मैं सजा पा गया

दर्द से अब भी बेचैन हूँ मैं 'प्रखर'
दिल में अब थोड़ा सा खौफ़ है आ गया


61.

खाना पानी हवा जिंदगी के लिए
और क्या चाहिए आदमी के लिए

इतनी छोटी जरूरत तो पूरा करो
देश के लोगों की बंदगी के लिए

बोलते हो यहाँ और वहाँ जाके तुम
ये बताओ भला किस खुशी के लिए

घी के दीयों की कोई जरूरत नहीं
दिल के अंधेरे में रोशनी के लिए

कह रहे हैं 'प्रखर' ना दिखावा करो
कर सको तो करो कुछ सही के लिए


62.

जब बेबसी गरीबी की बात आती है
गरीबों के मसीहा की याद आती है

वक्त वो इतिहास का लौट आता है
जब कभी गुलामी की रात आती है

जहाँ दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ना मना है
सोचो वहाँ पे कैसी बारात आती है

अश्कों के पानी दिन में कई बार गिरते हैं
मजदूरों की रोज ही बरसात आती है

हिम्मत सभी में जुल्म से लड़ने की नहीं 'प्रखर'
सौ में किसी इक को औकात आती है


63.

बीत गया इक साल माघ महीना आया है
हाल हुआ खुशहाल माघ महीना आया है

शाम सुबह है सोच गुरु रैदास जयंती की
बदल गई है चाल माघ महीना आया है

फिर से हम इस बार खास करेंगे कुछ यारों
दिल में यही ख़याल माघ महीना आया है

आलिम और अदीब इल्म कराएँगे हमको
कम होंगे जंजाल माघ महीना आया है

'प्रखर' होगा मौज मजा आएगा जीने का
मिलेगी ताल से ताल माघ महीना आया है


64.

इस बुद्ध की जमीन पे काबिज हैं सितमगर
ये बहुजनों पे हरदम हैं ढाहते कहर

ये जुल्म करते हैं हमेशा ही ग़रीब पे
इनको पसंद है नहीं इंसाफ की डगर

ये सिर्फ़ जात धरम की ही बात करते हैं
इंसानियत की बात हो तो फेरते नज़र

हड़ताल अपने हक के लिए हम बहुत किये
इनपे असर नहीं पड़ा ये तो हैं बेअसर

इन जालिमों के साथ हम करें तो क्या करें
मुश्किल में हैं पड़े नहीं कुछ सूझता 'प्रखर'


65.

जुल्म करने वालों सुधर जाओ तुम
हम जुल्म सहना छोड़ दिये हैं

तुम रौब झाड़ना अब छोड़ दो
हम दबके रहना छोड़ दिये हैं

हमसे ना गुलामी की हसरत रखो
चापलूसी करना छोड़ दिये हैं

रूह की कहानियाँ ना हमसे कहो
भूतों से डरना छोड़ दिये हैं

वहम से 'प्रखर' हम अब निकल गये
ढोंग में उलझना छोड़ दिये हैं


66.

सुनो जालिमो ! हम अगर ठान लेंगे
तो मिट्टी में तुमको मिला देंगे हम

उठाओ ना सिर ऐसे आगे हमारे
तुम्हारी जड़ों को हिला देंगे हम

जहर जो बेकदरी का तुमने पिलाया
तुम्हें भी जहर वो पिला देंगे हम

तुम्हारी पीढ़ी जीते जी मर जाएगी
जब अपनी पीढ़ी को जिला देंगे हम

'प्रखर' तुमने देखा ना ताकत हमारी
ना मानोगे तो ग़म खिला देंगे हम

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