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शनिवार, 28 सितंबर 2019

परिणय (खंडकाव्य)




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 अभिमत 

परिणय नामक यह खंडकाव्य रचना अपने नाम के अनुसार ही कथा को समेटे हुए है । रचनाकार देवचंद्र भारती 'प्रखर' जी ने अपनी इस काव्यकृति का नाम बिल्कुल सटीक रखा है । कथा का आरंभ सिद्धार्थ गौतम के परिणय से होता है । सबसे आश्चर्य और आनंद की बात तो यह है कि इस रचना का मूल पाठ परिणय नामक शब्द से आरंभ होता है; जो कि इस रचना का शीर्षक है । कथा का अंत सिद्धार्थ गौतम के द्वारा गृहत्याग करने के पश्चात् प्रव्रज्या ग्रहण करके देश से बाहर निकल जाने पर होता है ।

'प्रखर' जी एक सुलझे हुए और अनुभवी रचनाकार हैं । पिछले कई वर्षों से अपने गीतों के माध्यम से इन्होंने अंबेडकर मिशन को बढ़ाने में अपना भरपूर सहयोग दिया है । इनकी लेखनी बौद्ध-अंबेडकरी साहित्य और हिंदी दलित साहित्य के लिए पूर्णतः समर्पित है ।

मैं सभी बौद्ध-अंबेडकरवादी मित्रों से आग्रह करूँगा कि आप लोग 'प्रखर' जी की इस रचना को अवश्य पढ़ें और दूसरों को भी पढ़ने हेतु प्रेरित करें । यह रचना लोक कल्याण हेतु अत्यंत उपयोगी है ।

डॉ० बृजेश कुमार भारती 
संपादक - बोधिसत्व मिशन (मासिक पत्रिका)

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भूमिका 

हिंदू मानसिकता वाले लोग प्रायः तथागत गौतम बुद्ध को असफल गृहस्थ के रूप में घोषित करते हैं । यहाँ तक कि कुछ हिंदू लेखिकाएँ बुद्ध जैसा पति न मिलने की कामना करती हैं । ऐसा कहने वाले निश्चय ही बुद्ध की सच्ची जीवनकथा से अनभिज्ञ हैं । वे लोग हिंदू-परंपरा से जुड़ी हुई उस घिसी-पिटी कहानी को रटेे हुए हैं, जिस कहानी में यह बताया गया है कि सिद्धार्थ एक रोगी, एक बूढ़े और एक साधु को देखकर गृहत्याग किए थे और गृहत्याग करते समय वे चोरी से रात के समय अकेले निकले थे; जबकि वह कहानी सर्वथा गलत है ।

डॉ० भीमराव अंबेडकर द्वारा लिखित ग्रंथ 'बुद्ध और उनका धम्म' के अनुसार, किशोरावस्था की आयु में अपने प्रिय पुत्र सिद्धार्थ गौतम को एकाकी और उदासीन रहते देखकर राजा शुद्धोधन को अत्यधिक चिंता होने लगी; क्योंकि जब सिद्धार्थ गौतम के जन्म के समय असित ऋषि अपने भांजे नानक (नरदत्त) के साथ राजा शुद्धोधन के राजमहल में पहुंचे थे, तो उन्होंने बालक को बत्तीस महापुरुष-लक्षणों तथा अस्सी अनुव्यंजनों से युक्त देखकर यह भविष्यवाणी किया था - " यदि वह गृहस्थ रहेगा तो वह चक्रवर्ती नरेश होगा, लेकिन यदि वह गृहत्याग कर प्रव्रजित हो जाएगा, तो वह सम्यक सम्बुद्ध बनेगा ।" अतः राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ की आयु 16 वर्ष होने पर  उनका विवाह करने का निश्चय किया । उसी समय कोलिय वंश के राजा दंडपाणि भी अपनी 16 वर्षीय कन्या यशोधरा के विवाह हेतु स्वयंवर की तैयारी कर रहे थे । इच्छा नहीं होने पर भी अपने पिता के आग्रह पर सिद्धार्थ को उस स्वयंवर में जाना पड़ा । यशोधरा सिद्धार्थ को पसंद कर ली और अपने माता-पिता को भी अपनी इच्छा मानने हेतु विवश कर दी । जिसके परिणामस्वरूप यशोधरा और सिद्धार्थ का विवाह हो गया ।

राजा शुद्धोधन प्रसन्न थे कि पुत्र का विवाह हो गया और वह गृहस्थ बन गया, किंतु साथ ही असित ऋषि की भविष्यवाणी भी परछाई की तरह उनका पीछा कर रही थी । उस भविष्यवाणी को पूरा ना होने देने के लिए उन्होंने सोचा कि सिद्धार्थ गौतम को काम-भोगों के बंधन से अच्छी तरह से बांध दिया जाए । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शुद्धोधन ने अपने पुत्र के लिए तीन महल बनवाये - एक ग्रीष्म ऋतु में रहने के लिए, दूसरा वर्षा ऋतु में रहने के लिए और तीसरा शीत ऋतु में रहने के लिए । उन्होंने इन महलों को हर तरह के भोग-विलास के साधनों से सुसज्जित किया । हर महल के पास एक-एक सुंदर बाग था, जिसमें अनेक प्रकार के फूलों से लदे हुए पेड़ थे ।

अपने पुरोहित उदायी के परामर्श से उन्होंने निश्चय किया कि कुमार के लिए एक अंतःपुर की व्यवस्था करनी चाहिए, जहाँ सुंदरियों की कमी ना हो । शुद्धोधन ने उदायी को कहा कि वह उन षोडशियों को संकेत कर दे कि वे कुमार का चित्त जीतने का प्रयास करें । उदायी ने सुंदरियों को इकट्ठा करके कुमार का चित्त लुभाने का संकेत ही नहीं किया, बल्कि विधि भी बतायी ।  सुंदरियों ने कुमार को वशीभूत करने के लिए अपनी सारी शक्ति लगा देने का निश्चय किया । वे अपने काम में लग गई । उन प्रेमासक्त स्त्रियों ने राजकुमार के विरुद्ध हर तरह की युद्ध-नीति बरती । इतने आक्रमण किए जाने पर भी वह संयतेन्द्रिय न प्रसन्न हुआ, न मुस्कुराया । इस प्रकार वह बेमेल मेल महीनों वर्षों चलता रहा, किंतु इसका कुछ फल ना हुआ ।

उदायी समझ गया कि तरुणियाँ असफल रही हैं और राजकुमार ने उनमें कोई दिलचस्पी नहीं ली । नीति कुशल उदायी ने राजकुमार से स्वयं बातचीत की सोची । राजकुमार से एकांत में उदायी ने कहा - " ऊपरी मन से भी स्त्रियों से संबंध जोड़ना अच्छा है । इससे आदमी का संकोच जाता रहता है और मन का रंजन भी होता ही है । " राजकुमार सिद्धार्थ ने उत्तर दिया - " मैं संसार के विषयों की अवज्ञा नहीं करता । मैं जानता हूँ कि सारा जगत इन्हीं में आसक्त है । लेकिन क्योंकि मैं जानता हूँ कि सारा संसार अनित्य है, इसलिए मेरा मन उनमें रमण नहीं करता । " राजकुमार के सुनिश्चित दृढ़-संकल्प ने उदायी को निरुत्तर कर दिया । उसने राजा को सारा वृत्तांत जा सुनाया । जब शुद्धोधन को यह मालूम हुआ कि उनके पुत्र का चित्त किस प्रकार विषयों से सर्वथा विमुख है ? तो उन्हें सारी रात नींद नहीं आयी ।

सिद्धार्थ गौतम 20 वर्ष का हो चुके थे । चूँकि शाक्यों का अपना संघ था । बीस वर्ष की आयु होने पर हर शाक्य तरुण को शाक्य संघ में दीक्षित होना पड़ता था और संघ का सदस्य होना होता था । इसलिए सिद्धार्थ को संघ में दीक्षित कराने के लिए शुद्धोधन ने शाक्य पुरोहित को संघ की एक सभा बुलाने के लिए कहा । तदनुसार कपिलवस्तु में शाक्यों के संथागार में संघ एकत्रित हुआ । सभा में पुरोहित ने प्रस्ताव किया कि सिद्धार्थ को संघ का सदस्य बनाया जाए । शाक्य सेनापति अपने स्थान पर खड़ा हुआ और उसने संघ को संबोधित करके सिद्धार्थ को संघ का सदस्य बनाने का प्रस्ताव किया । सेनापति का प्रस्ताव तीन बार निर्विरोध पास हो गया, तो सिद्धार्थ के विधिवत शाक्य संघ का सदस्य बन जाने की घोषणा कर दी गई ।  सिद्धार्थ को शाक्य संघ का सदस्य बने आठ वर्ष बीत चुके थे । वह संघ के बड़े ही वफादार और दृढ़ सदस्य थे । जितनी दिलचस्पी उन्हें निजी मामलों में थी, उतनी दिलचस्पी उन्हें संघ के मामलों में भी थी । संघ के सदस्य की हैसियत से उनका आचरण आदर्श था । वह सबका प्रिय भोजन बन गये थे ।

उनकी सदस्यता के आठवें वर्ष में एक ऐसी घटना घटी जो सिद्धार्थ के परिवार के लिए दुर्घटना बन गई और उनके अपने लिए जीवन - मरण का प्रश्न । शाक्यों के राज्य से सटा हुआ कोलियों का राज्य था । रोहिणी नदी दोनों राज्यों की विभाजक रेखा थी । शाक्य और कोलिय दोनों ही रोहिणी नदी के पानी से अपने-अपने खेत सींचते थे । हर फसल पर उनका आपस में विवाद होता था । कि रोहिणी के जल का पहले और कितना उपयोग कौन करेगा ? यह विवाद कभी-कभी झगड़ों में परिणत हो जाते हो जाते और झगड़े लड़ाईयों में । जिस वर्ष सिद्धार्थ की आयु 28 वर्ष की हुई, उस वर्ष रोहिणी के पानी को लेकर शाक्यों के नौकरों में और कोलियों के नौकरों में बड़ा झगड़ा हो गया । दोनों पक्षों ने चोट खाई । जब शाक्यों और कोलियों को इसका पता लगा, तो उन्होंने सोचा कि इस प्रश्न का युद्ध के द्वारा हमेशा के लिए निर्णय कर दिया जाए । शाक्यों के सेनापति ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध छेड़ देने की बात पर विचार करने के लिए संघ का एक अधिवेशन बुलाया और कोलियों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर देने का प्रस्ताव किया । सिद्धार्थ ने इस प्रस्ताव का विरोध किया । सेनापति के पक्ष में बहुमत होने तथा संघ के नियम की अवहेलना करने के कारण सिद्धार्थ के समक्ष दण्डस्वरूप तीन विकल्प रखे गये । (1) सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लेना (2) फांसी पर लटकना या देश से निकल जाना (3) परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिए राजी होना । तीनों विकल्पों पर विचार करके अंत में सिद्धार्थ ने दूसरे विकल्प अर्थात देशनिकाला को स्वीकार किया । गृहत्याग करते समय अपने पिता शुद्धोधन, माता प्रजापति गौतमी और पत्नी यशोधरा से उन्होंने अनुमति प्राप्त की । गृहत्याग करते समय सिद्धार्थ से यशोधरा ने कहा था -
" तुम्हारा निर्णय ठीक है । तुम्हें मेरी अनुमति और समर्थन प्राप्त है । मैं भी तुम्हारे साथ प्रव्रजित हो जाती । यदि मैं नहीं हो रही हूँ, तो इसका मात्र यही कारण है कि मुझे राहुल का पालन-पोषण करना है । "

उपरोक्त कथा से स्पष्ट है कि सिद्धार्थ गौतम ने एक अच्छा गृहस्थ होने का कर्तव्य निभाया था । वे एक सफल गृहस्थ भी थे तथा एक सफल परिव्राजक भी ।

परिणय नामक इस खंडकाव्य की कथावस्तु , सिद्धार्थ के परिणय (विवाह) और प्रव्रज्या के मध्य की कथा है । इस रचना का प्रथम उद्देश्य, बौद्ध साहित्य में बुद्ध से संबंधित खंडकाव्य के अभाव की पूर्ति का एक तुच्छ प्रयास मात्र है ।  द्वितीय उद्देश्य, वर्तमान में सिद्धार्थ के परिणय और प्रव्रज्या की प्रासंगिकता को अभिव्यक्त करना है ।

धम्मदीक्षा दिवस 14 अक्टूबर 2019 

                                ✍️  देवचंद्र भारती 'प्रखर'

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मूलपाठ

परिणय पावन प्रेम का बंधन,
अर्पित होता है तन - मन ।
अनन्य की अभिलाषा होती,
एक हो जाते दो जीवन ।।

पति-पत्नी दो भिन्न किनारे,
जिनसे है दांपत्य - नदी ।
सुख - आनंद के कमल खिले,
जब प्रेम के जल से रहे भरी ।।

नर का मन जब उदासीन हो,
उसे लुभाती है नारी ।
सारी उदासी दूर भगाती,
प्रेम जगाती है प्यारी ।।

उदासीन सिद्धार्थ बने थे,
खोए थे अपनेपन में ।
प्रश्न हजारों आते रहते
करुण और कोमल मन में ।।

पशु पक्षी तरुवर सरवर का
दिन भर करते थे दर्शन ।
उपवन में बैठे - बैठे वह
करते रहते थे चिंतन ।।

गौतम की यह दशा देखकर
शुद्धोधन को चिंता थी ।
उन्हें असित ऋषि की वह वाणी
बार-बार थी याद आती ।।

असित कहे थे, सुनिए राजन् !
पुत्र आपका मेधावी ।
चक्रवर्ती सम्राट बनेगा
या वह बनेगा सन्यासी ।।

जग में ऐसी कौन समस्या
समाधान है ना जिसका ।
समाधान पाए शुद्धोधन
अपनी विकट समस्या का ।

स्त्री पाकर पुरुष विरागी
बन जाता है अनुरागी ।
यही सोच राजा ने गौतम
के परिणय इच्छा की ।।

अगले दिन तब राज-पुरोहित
से राजा बोले - "जाओ ।
सुंदर सुशील कन्या खोजो,
तभी महल में तुम आओ ।"

कुछ दिन बाद पुरोहित आया,
समाचार संग में लाया ।
दंडपाणि राजा की कन्या,
यशोधरा का गुण गाया ।।

यशोधरा का छायाचित्र,
दिखाया राजपुरोहित ने ।
कन्या की आकर्षक छवि को,
देख शुद्धोधन बोल पड़े -

" मेरी पुत्रवधू बनने के
योग्य यही तो कन्या है ।
गौतम का मन मोड़ सके जो
यह तो वही अनन्या है ।। "

कहा पुरोहित - " राजा सुनिए,
दंडपाणि जी जो बोले ।
उनकी बातें सोच-सोच कर
मेरा यह हृदय डोले ।।

यशोधरा का परिणय होगा,
किंतु स्वयंवर के पश्चात् ।
कन्या जिसका चयन करेगी,
परिणय होगा उसके साथ ।।

राजा शुद्धोधन तब बोले -
" यह भी है हमको स्वीकार
निश्चित ही कन्या गौतम को,
सौंपेगी हृदय का हार ।। "

दंडपाणि के राजमहल की,
शोभा बड़ी मनोहारी ।
यशोधरा के लिए स्वयंवर,
की थी उत्तम तैयारी ।।

धरती और गगन थे हर्षित
आई स्वयंवर की बेला ।
लगा हुआ था राजमहल में,
राजकुमारों का मेला ।।

सब थे राजकुमार उपस्थित,
जिनका था आह्वान हुआ ।
शाक्यवंश के कुलदीपों का,
यथा उचित सम्मान हुआ ।।

एक-एक करके सबको ही,
देखा राजकुमारी ने ।
क्षणभर ही देखा गौतम को,
हृदय खो दिया प्यारी ने ।।

पांव नहीं आगे बढ़ पाए,
उन्हें देखती रही खड़ी ।
रुकी वहाँ तो रुकी रह गई,
अचेत सी चुपचाप पड़ी ।।

आंखों से आंखें टकराईं,
आंखें दो से चार हुईं ।
हृदय की वीणा में प्रेम के,
सरगम की झंकार हुई ।।

वर्षों से जो उदासीन था,
मन में था वैराग जगा ।
उस सिद्धार्थ तरुण के मन में
यशोधरा का राग जगा ।।

नैनों की भाषा नैनों से,
पढ़कर दोनों समझ गए ।
लोग देखते रहे न जाने,
कब वे दोनों उलझ गए ।।

मन से मन का बंधन होना,
जग में सदा विशेष रहा ।
दोनों एक हो गए लेकिन,
रीति निभाना शेष रहा ।।

यशोधरा ने गौतम के -
हाथों में अपना सुमन दिया ।
अपने वर के रूप में उसने,
गौतम का ही चयन किया ।।

अपने कन्या की पसंद से,
दंडपाणि जी चकित हुए ।
मुख पर घोर उदासी छाई,
हृदय से वह व्यथित हुए ।।

साधु-संत की संगति प्यारी,
प्यारा था एकांत जिसे ।
राजा को चिंता थी कैसे -
दें कन्या का हाथ उसे ?

जिसे अकेलापन हो प्यारा,
वह क्या प्रेम निभाएगा ?
क्षणभर प्रेम करेगा फिर वह
अपने में खो जाएगा ।।

जो पति समय ना दे पत्नी को
वह गृहस्थ कैसा होगा ?
दुःख होगा तो कलह भी होगा,
मधुर नहीं रिश्ता होगा ।।

ये बातें जब यशोधरा से,
तर्क सहित राजा बोले ।
तब वह बोली, पूज्य पिताजी !
गौतम हैं बिल्कुल भोले ।

मैं तो केवल यही पूछती,
हे मेरे जीवनदाता !
साधु-संत के संग में रहना,
क्या अपराध कहा जाता ?

पुत्री की क्या इच्छा है ?
जब रानी ने यह जान लिया ।
तब उन्होंने राजकुमारी
की बातों को मान लिया ।।

रानी बोलीं राजा से - " प्रिय !
यशोधरा का है निश्चय ।
गौतम के अतिरिक्त किसी से
नहीं करेगी वह परिणय ।। "

हे प्रिय !अब तो मान जाइए
उचित नहीं हठ
कन्या की जो अभिलाषा है
अब सहर्ष करिए स्वीकार ।।

राजा बोले यशोधरा से
सौंप रहा में अनुमोदन ।
दोष नहीं देना तुम मुझको
अगर कठिन होगा जीवन ।।

यशोधरा ने कहा - पिताजी !
भूलूंगी ना यह उपकार ।
गौतम के संग दुःख भी मुझको
होगा जीवन भर स्वीकार ।।

राजा ने बोला मंत्री से
परिणय का उद्घोष करो ।
दीन जनों में वितरण हेतु
समर्पित सारा कोष करो ।।

भरी सभा में जब मंत्री ने
किया सूचना का उद्घोष ।
राजकुमारों में से कुछ ने
किया प्रकट तब अपना रोष ।।

सच्चे लोगों से भी ईर्ष्या
करने वाले हैं जग में ।
गौतम से उनको ईर्ष्या थी
वे बाधा डाले मग में ।।

पहले तो सोचा था उन्होंने
राजा होंगे ना तैयार ।
क्रोधित हुए क्योंकि राजा ने
किया था गौतम को स्वीकार ।।

एक कुंवर बोला - हे राजन् !
किया आपने है अन्याय ।
होगी परीक्षा लक्ष्य वेद की
तभी मिलेगा हमको न्याय ।।

उचित और अनुचित बातों पर
क्षणभर राजा किए विचार ।
बोले तब गंभीर भाव से
यह प्रतिबंध मुझे स्वीकार ।।

हुई घोषणा लक्ष्यवेध की
सहमत थे सब राजकुमार ।
किंतु कुंवर गौतम को ऐसा
निर्णय नहीं हुआ स्वीकार ।।

मित्र सारथी छंदक से वह
बोले अपने मन की बात ।
छंदक बोला ऐसी गलती
नहीं कीजिए मेरे नाथ !

प्यारे गौतम ! इस निर्णय को
आप अगर ना लेंगे मान ।
आपका, कुल का, यशोधरा का
सबका ही होगा अपमान ।।

अपने लिए नहीं तो अपनी
यशोधरा के लिए सही ।
जो सबकी इच्छा है आपको
करना होगा आज वही ।।

छंदक के इस प्रबल तर्क का
तीव्र वेग से पड़ा प्रभाव ।
गौतम का मन बदल गया था
बदल गया हृदय का भाव ।।

किया समर्थन गौतम ने भी
हुये परीक्षण को तैयार ।
यशोधरा के हेतु कुंवर को
शौर्य-प्रदर्शन था स्वीकार ।।

लक्ष्यबेध की कठिन परीक्षा
निर्णय हेतु हुई आरंभ ।
सब अपना कौशल दिखलाये
सबको था अपने पर दंभ ।।

लक्ष्यबेध गौतम का सबमें
सर्वश्रेष्ठ था सिद्ध हुआ ।
धीर वीर गंभीर रूप में
शाक्यकुमार प्रसिद्ध हुआ ।।

जीत हो गई जब गौतम की
यशोधरा से हुआ विवाह ।
हर्ष, प्रेम, आनंद का सबके
मन में होता रहा प्रवाह ।।

दंडपाणि राजा थे हर्षित
और प्रफुल्लित शुद्धोधन ।
श्रद्धापूर्वक मिलन कर रहे
थे वे करके आलिंगन ।।

परिणय के पश्चात आ गई
अद्भुत घड़ी विदाई की ।
यशोधरा के मन पर छाई
सुख-दुख की परछाई थी ।।

मिलन हो रहा था प्रीतम से
बिछड़ रहे थे प्रिय परिजन ।
जीवन दिया किसी ने कोई
लिए जा रहा था जीवन ।।

जिस आंगन में बचपन बीता
वह आंगन था छूट रहा ।
वर्षों से जो था सखियों से
वह बंधन था टूट रहा ।।

जग की है यह रीत अनूठी
अपने हुए पराये थे ।
अब तक रहे पराये जो वे
अपनापन दिखलाये थे ।।

हृदय की पीड़ा हृदय में
कोई दबाए तो कैसे ?
आंखों का आँसू गिरने से
कोई बचाए तो कैसे ?

मन में दुःख लेकर वियोग का
अश्रु बहाकर निकल चली ।
जाते हुए हजारों को वह
साथ रुलाकर निकल चली ।।

जीवन कभी हंसाता है तो
कभी रुलाता है जीवन ।
ऐसा भी होता कि स्वयं ही
अश्रु बहाता है जीवन ।।

अनुभव के भावों में ढलकर
अंतस्थल जब जाए सिहर ।
एक माह में हुए एकत्रित
आंसू पल में जाएँ बिखर ।।

ओस निशा की चली छोड़कर
प्रभात में संग पत्तों का ।
भानु किरण के अंग समाई
छोह छोड़कर वृक्षों का ।।

हुई विदाई यशोधरा की
जब वह पहुंच गई ससुराल ।
शुद्धोधन के राजमहल में,
हुए उपस्थित तीनों काल ।।

दिनभर दूर रहे दो प्रेमी
रात हुई तो पास हुये ।
एक दूसरे की बाहों में
धरती और आकाश हुये ।।

सागर चाह रखे सरिता की
सरिता चाहे सागर को ।
मधुकर को मधु की अभिलाषा
मधु भी चाहे मधुकर को ।।

जीवन के सूने उपवन में
बसंत आकर झूमा था ।
सजी हुई सोलह सिंगार से
वधू को वर ने चूमा था ।।

सोलह वर्षों से जिस धन को
छुपा रखा करके भंडार ।
अपने प्रियतम हेतु प्रिया थी
उसे लुटाने को तैयार ।।

व्याकुल जब देखा था झील को
लगा पिघलने था गिरिराज ।
समा गया उसमें जल बनकर
तजकर अपने मन की लाज ।।

शुद्धोधन को थी प्रसन्नता
गौतम का हो गया विवाह ।
बना गृहस्थ विवाहित होकर
मिली उसे रमणी की बाँह ।।

किंतु साथ ही असित ऋषि की
भविष्यवाणी का था ध्यान ।
पूरी ना हो भविष्यवाणी
राजा करने लगे विधान ।।

राजा ने सोचा गौतम को
काम भोग में बाँधा जाए ।
जिससे उसके मन में कभी
प्रव्रज्या की इच्छा ना आए ।।

पूरा हो उद्देश्य शीघ्र ही
शुद्धोधन थे घबराए ।
गौतम के आनंद हेतु वह
तीन महल थे बनवाए ।।

शीत ग्रीष्म वर्षा तीनों ही
ऋतुओं हेतु महल थे तीन ।
सबमें भोग - विलास के साधन
आते रहते नित्य नवीन ।।

अमात्य पुत्र उदायी ने जब
परामर्श राजा को दिया ।
अंतःपुर की हुई व्यवस्था
सुंदर - सुंदर सुंदरियां ।।

राजा कहे उदायी से -
समझा दो सुंदरियों को काम ।
राजकुंवर का चित्त जीतकर
प्राप्त करें अच्छा परिणाम ।।

सुंदरियों से कहा उदायी
कामकला में हो तुम दक्ष ।
सुंदर हो आकर्षक भी हो
रति का रूप तुम्हीं प्रत्यक्ष ।।

तुम सबमें वे गुण हैं जिससे
ऋषि - मुनि विचलित हो जाएं ।
देवलोक के सभी देवता
भी आकर्षित हो जाए ।।

सुंदरियां तब बोलीं -" हम सब
पूरी शक्ति लगाएंगी ।
जिससे चित्त कुँवर का बदले
वही युक्ति अपनाएंगी ।। "

जैसे हिमालय के जंगल में
विचरण करते हुए गजराज ।
हथिनी - समूह से घिर जाए
वैसी दशा में थे युवराज ।।

किसी कामिनी ने गौतम को
छाती से था दबा लिया ।
और किसी ने यूं ही गिरकर
छाती से था लगा लिया ।।

कोई रक्तवर्ण अधरों को
रखी कुंवर के कपोल पर ।
कोई उनके कोमल मुख पर
बिखेर दी अलकें खोलकर ।।

कोई पैरों के घुंघरू का
निनाद करती इधर-उधर ।
अपनी अर्धनग्न काया का
प्रदर्शन करती चलकर ।।

प्रेमासक्त नारियों ने हर
युद्ध नीति थी अपनायी ।
किंतु कुंवर गौतम को कोई
आकर्षित ना कर पायी ।।

संयत इंद्रिय वाले गौतम
हर्षित नहीं हुए क्षण भर ।
उनके मन पर सुंदरता का
चित्र बना केवल नश्वर ।।

यौवन है चंचल गौतम को
इसी बात का होता कष्ट ।
जब वृद्धावस्था आए तो
सुंदरता हो जाए नष्ट ।।

हार गई सब सुंदरियां थी
फल ना कोई मिल पाया ।
राजा को जब ज्ञात हुआ तो
उनका मन था मुरझाया ।।

नीति कुशल था चतुर उदायी
उसने फिर से हल सोचा ।
बातचीत करने गौतम से
वह उनके सम्मुख पहुंचा ।।

कहा उदायी - हे सिद्धार्थ !
मुझे कुछ बातें करनी हैं ।
मित्र हितैषी हूँ मैं आपका
हित की बातें कहनी हैं ।।

अहित काम से सदा बचाना
हितकर काम में करना लीन ।
विपत्ति में ना साथ छोड़ना
एक मित्र के लक्षण तीन ।।

वे बातें कहता हूँ आपसे
जिनको मैं हितकर समझा ।
नारी से संबंध ऊपरी -
मन से जोड़ना भी अच्छा ।।

इससे पहला लाभ यही है
मिट जाता मन का संकोच ।
साथ ही मन का रंजन होता
ताजी हो जाती है सोच ।।

नहीं निरादर करना उनका
और मानना उनकी बात ।
बस इतने से प्रेम में बँधकर
नारी सदैव देती साथ ।।

प्रसन्नता अबला की औषधि
अलंकार है यह उनका ।
वह इसके बिन ऐसी होती
जैसे बाग हो पुष्प बिना ।।

घृणित काम-भोगों का सेवन
किए अनेक महाराजा ।
प्रशंसनीय काम-भोगों को
आप करें तो दोष ही क्या ?

शक्ति और सौंदर्य युक्त हैं
आप युवावस्था में हैं ।
काम-भोग अधिकार आपका
आप कैसी शंका में हैं ?

वचन उदायी के ये सुनकर
राजकुमार दिए उत्तर ।
स्नेह-सिक्त यह भाषा आपकी
योग्य आपके है प्रियवर !

लेकिन सच में आप उदायी
गलत बात यह बोले हैं ।
मैं तो डोल नहीं सकता हूँ
आप भले ही डोले हैं ।।

मैं इन सांसारिक विषयों की
नहीं अवज्ञा करता हूं ।
सारा जग आसक्त इन्हीं में
मैं अनुमोदन करता हूं ।।

किंतु जानता हूं मैं यह भी
अनित्य है सारा संसार ।
अतः रमण इनमें करने को
मेरा हृदय नहीं तैयार ।।

और आप यदि यह कहते हैं
ऋषि भी इसमें लिप्त हुए ।
यह प्रमाण है व्यर्थ आपका
वे भी क्षय को प्राप्त हुए ।।

क्षय है जहाँ वहाँ पर हे प्रिय !
नहीं वास्तविक महानता ।
विषयासक्ति असंयम से ना
महान कोई हो सकता ।।

स्नेह ऊपरी मन से करना
मनमोहिनी कामिनी संग ।
मुझे नहीं यह रुचिकर लगता
चाहे दक्षता का हो रंग ।।

यदि यथार्थ में स्नेह नहीं हो
जुड़ा नहीं हो मन से मन ।
तो नारी के मन से नर का
उचित नहीं है अनुवर्तन ।।

जहाँ राग का अतिशय होता
जहाँ झूठ में हो विश्वास ।
असीम हो आसक्ति जहाँ पर
क्या है उस धोखे के पास ?

नारी राग के वश में होकर
यदि छल करे पुरुष के साथ ।
तो वह इसी योग्य होती कि
पुरुष करे ना उससे बात ।।

यह सब कुछ ऐसा ही है
इसलिए मुझे है यह विश्वास ।
मुझे कभी ना ले जाएंगे
आप विषय भोगों के पास ।।

राजकुंवर के दृढ़ निश्चय से
विजित खुदाई शांत हुआ ।
उसने राजा शुद्धोधन से
जाकर सब वृतांत कहा ।

जब राजा को पता चला कि
गौतम है विषयों से मुक्त ।
नींद रात भर ना आई थी
रहे दुःखी चिंता से युक्त ।।

शाक्यों का था संघ स्वयं का
जिसमें था यह आवश्यक ।
बीस वर्ष की आयु में दीक्षित
होते थे हर शाक्य युवक ।।

बीस वर्ष के हुए थे गौतम
अतः समय वह आया था ।
कुंवर संघ में दीक्षित हों
राजा ने सोच बनाया था ।।

संघ भवन भी था शाक्यों का
संथागार जिसे कहते ।
कपिलवस्तु में था वह उसमें
संघ सभाएं थे करते ।।

संघ में दीक्षित होवें गौतम
इसीलिए शुद्धोधन जी ।
शाक्य पुरोहित से बोले कि
सभा बुलाएँ आज अभी ।।

सभा लगाई गई संघ की
कपिलवस्तु में हुआ प्रचार ।
अधिकारियों सदस्यों से था
भरा हुआ वह संथागार ।।

खड़ा हुआ था सभा बीच में
किया पुरोहित ने प्रस्ताव ।
सभी लोग चुपचाप पड़े थे
संघ नियम का शिष्ट प्रभाव ।।

खड़ा हुआ तब शाक्य सेनापति
बोला करके संबोधित ।
संघ का सदस्य बनने हेतु
सिद्धार्थ गौतम हैं इच्छित  ।।

बीस वर्ष है आयु हो गई
यह सदस्य बनने के योग्य ।
इस प्रस्ताव का विरोध कर दे
जिसको भी यह लगे अयोग्य ।।

किंतु किसी ने भी उठ करके
विरोध ना अभिव्यक्त किया ।
सेनापति ने तीन बार तक
सभा में वही प्रश्न किया ।।

जब तीसरी बार भी कोई
विरोध ना कर पाया था ।
संघ नियम के साथ कुंवर को
संघ सदस्य बनाया था ।।

खड़े हुए फिर शाक्य पुरोहित
गौतम को भी खड़ा किए ।
संबोधित करके गौतम को
शाक्य पुरोहित प्रश्न किए ।।

संघ ने है सम्मान किया
क्या ऐसा आपको लगता है ?
उत्तर में गौतम बोले थे
हाँ मैं हूँ अनुभव करता ।।

पूछे पुरोहित आप सदस्यों
के कर्तव्य से हैं परिचित ?
गौतम बोले जिज्ञासा है
किंतु अभी हूँ अपरिचित ।।

बोले पुरोहित सर्वप्रथम मैं
आपको यही बताऊंगा ।
संघ सदस्यों के कर्तव्यों
को क्रमबद्ध गिनाऊँगा ।।

आपको अपने तन मन धन से
साथ क्यों का हित करना है ।
संघ की सभी सभाओं में
सदैव उपस्थित रहना है ।।

किसी शाक्य का दोष जानकर
शांत नहीं रहना होगा ।
निर्भय हो निष्पक्ष रुप से
खुल करके कहना होगा ।।

दोषारोपण हो तो आपको
क्रोध नहीं करना होगा ।
स्वीकार करना होगा दोष को
ना हो तो कहना होगा ।।

कहे पुरोहित सुनिए गौतम !
आप क्या ना कर पाएंगे ?
क्या करने से आप संघ के
सदस्य ना रह पाएंगे ?

चोरी हत्या किए कभी यदि
और किए व्यभिचार कभी ।
झूठी साक्षी दिए कभी यदि
पदच्युत होंगे आप तभी ।।

बोले तब सिद्धार्थ मान्यवर !
संघ नियम जो बतलाए ।
कृतज्ञ हूं इस हेतु आपका
संघ नियम मुझको भाए ।।

संघ के नियमों के अनुसार
सदैव चलता रहूंगा मैं ।
नियमों का पालन करने का
प्रयास करता रहूंगा मैं ।।

संघ का सदस्य बनकर गौतम
निष्ठा पूर्वक कार्य किए ।
आठ वर्ष का समय बिताए
सबके प्रिय वह बने रहे ।।

संघ के सच्चे दृढ सदस्य थे
और आचरण से आदर्श ।
सबसे ही व्यवहार मधुर था
सबसे होता उनको हर्ष ।।

किंतु आठवें वर्ष में आकर
घटित हुई ऐसी घटना ।
जो सिद्धार्थ के परिजन हेतु
बन गई बड़ी सी दुर्घटना ।।

शाक्यों के ही राज्य से सटा
हुआ था राज्य कोलियों का ।
उन राज्यों के बीच रोहिणी
नदी विभाजन की रेखा ।।

शाक्य और कोलिय दोनों ही
उसी रोहिणी के जल से ।
अपने-अपने खेत सींचते
किंतु कभी भी ना कल से ।।

सभी फसल पर ही उनका
आपस में विवाद होता था ।
कभी-कभी वह विवाद झगड़े
में परिणत हो जाता था ।।

पहले कौन और कितना
उपयोग करेगा इस जल का ?
इसी बात पर ही विवाद होता
था शाक्य और कोलिय का ।।

अट्ठाइसवें वर्ष के हुए
थे जब गौतम राजकुंवर ।
बहुत बड़ा झगड़ा कर बैठे
शाक्य कोलियों के नौकर ।।

मारपीट करके दोनों ही
पक्ष हो गए थे घायल ।
ईर्ष्या ग्लानि क्रोध भय से थे
भरे हुए हृदय चंचल ।।

जब इस बात का शाक्यों और
कोलियों को था पता लगा ।
सोचे युद्ध से निर्णय होगा
अहंकार मन में था जगा ।।

शाक्यों के सेनापति ने भी
किया संघ का अधिवेशन ।
युद्ध कोलियो से करने को
करना था मिलके चिंतन ।।

अधिवेशन में सेनापति ने
कहा कोलियों का है दोष ।
पहले वे ही किए आक्रमण
लोग हमारे हैं निर्दोष ।।

इससे पहले भी कोलिय सब
किए आक्रमण अनेक बार ।
हमने सहा अभी तक लेकिन
नहीं सहेंगे हम इस बार ।।

यह ऐसे ही ना चल सकता
अब इसको होगा रोकना ।
एक तरीका है अब केवल
कर दें हम युद्ध की घोषणा ।।

मेरा तो प्रस्ताव यही है
युद्ध को कोलियों संग करें ।
जिसको विरोध करना हो वह
निःसंकोच अभी कह दे ।।

गौतम खड़े हुए और बोले
इसका विरोध करता हूं ।
युद्ध से कोई हल ना होता
दृढ़ता से मैं कहता हूं ।।

युद्ध छेड़ देने से हमारा
उद्देश्य ना पूरा होगा ।
बल्कि दूसरे युद्ध का इसके
संग बीजारोपण होगा ।।

जो भी किसी की हत्या करता
उसे मारता है कोई ।
जो भी कभी किसी को लूटे
उसे लूटता है कोई ।।

मुझको ऐसा लगता है कि
शीघ्र नहीं हम युद्ध करें ।
दोषी पक्ष कौन है पहले
हम इस बात की जांच करें ।।

हे मान्यवर ! सुना है मैंने
शाक्यों ने अतिवाद किया ।
हम निर्दोष नहीं है हमारे
लोगों ने भी विवाद किया ।।

सेनापति बोला हे गौतम !
यह तो आप सही कहते ।
पहल हमारे लोगों ने की
आपकी बात स्वीकार मुझे ।।

किंतु सही है यह भी गौतम
इसके थे हम अधिकारी ।
पहले पानी लेने की इस
बार हमारी थी बारी ।।

गौतम बोले तब तो इससे
है स्पष्ट एक यह बात ।
हम निर्दोष नहीं है सर्वथा
मान लीजिए अब तो आप ।।

इसीलिए इस संघ सभा में
रखता हूं मैं यह प्रस्ताव ।
कोलिय और शाक्य अपने में
दो पुरुषों का करें चुनाव ।।

दोनों पक्षों के वे दो - दो
मिलकर हो जाएंगे चार ।
चारों मिलकर किसी पांचवें
को चुन लेंगे करके विचार ।।

वे पांचों मिलकर कर देंगे
इस झगड़े का निपटारा ।
प्रेम से बातें करने से तो
निर्णय हो जाता सारा ।।

गौतम ने परिवर्तन करके
जो प्रस्ताव सुझाया था ।
विधिवत हुआ समर्थन उसका
वह सबको ही भाया था ।।

किंतु सेनापति ने विरोध कर
कहा मुझे यह निश्चय ।
जब कोलिय दंडित होंगे तब
उनका टण्टा होगा क्षय ।।

एक ओर प्रस्ताव दूसरे
था वह उसमें परिवर्तन ।
सभी सदस्यों से मत लेना
हुआ बहुत ही आवश्यक ।।

जो सुझाव सिद्धार्थ दिए थे
पहले उस पर हुआ विचार ।
सुझाव गौतम का बहुमत से
किया गया था अस्वीकार ।।

तब सेनापति ने सबसे ही
बोला फिर अपना प्रस्ताव ।
मत मांगा वह सभी जनों से
पूछा सब लोगों का चाव ।।

गौतम फिर से खड़े हुए थे
सेनापति का किए विरोध ।
किये प्रार्थना संघ जनों से
स्वीकार हो मेरा प्रतिरोध ।।

शाक्य और कोलिय लोगों का
बहुत निकट का है संबंध ।
नहीं बुद्धिमानी होगी यदि
नाश करें हम बनकर अंध ।।

सेनापति ने फिर गौतम का
किया सर्वथा ही प्रतिरोध ।
यह कायरता का प्रतीक है
कायर हैं ना हम सब लोग ।।

सेनापति ने कहा युद्ध में
क्षत्रिय जब करते आवेश ।
अपने और पराए का वे
तनिक नहीं करते हैं भेद ।।

राज्य के लिए तो क्षत्रिय को
सब अर्पण करना होता ।
अपने सगे भाइयों से भी
क्षत्रिय को लड़ना होता ।।

यज्ञ धर्म होता ब्राह्मण का
युद्ध क्षत्रियों का है धर्म ।
वैश्यों का व्यापार धर्म है
सेवा ही शूद्रों का धर्म ।।

तब सिद्धार्थ दिए थे उत्तर
मैंने अब तक है समझा ।
धर्म यही है कि हम माने
वैर से वैर नहीं मिटता ।।

सेनापति व्याकुल हो बोला
व्यर्थ दार्शनिक है शास्त्रार्थ ।
है स्पष्ट मेरे प्रस्ताव को
मान रहे हैं ना सिद्धार्थ ।।

संघ का मत लेकर ही अब तो
यह निश्चय हो पाएगा ।
जो भी संघ की इच्छा होगी
वही किया भी जाएगा ।।

सेनापति प्रस्ताव बोलकर
मत मांगा करके आभार ।
लोगों ने बहुमत से उसका
वह प्रस्ताव किया अस्वीकार ।।

फिर अगले दिन सेनापति ने
संघ सभा बुलवाया था ।
सैनिक भर्ती का प्रस्ताव
सभा के बीच सुनाया था ।।

बीस और पच्चीस वर्ष के
बीच हैं जितने शाक्य युवक ।
सेना में भर्ती होना हो
सबके लिए ही आवश्यक ।।

सभा एकत्रित हुई संघ के
दोनों पक्ष उपस्थित थे ।
एक पक्ष था युद्ध विरोधी
शेष युद्ध के पक्ष में थे ।।

जो भी पक्षधर रहे युद्ध के
वे स्वीकृति को थे तैयार ।
किंतु युद्ध के विरुद्ध जो थे
दुविधा में कर रहे विचार ।।

बहुमत के समक्ष अल्पमत
झुकने को था ना तैयार ।
इसीलिए थे वहां उपस्थित
जो निर्णय हो वह स्वीकार ।।

युद्ध विरोधी थे जितने भी
साहस नहीं जुटा पाए ।
सोच रहे थे बैठे-बैठे
क्या और कैसे कहा जाए ।।

यह तो सभी जानते थे कि
संघ नियम थे पूर्णविराम ।
संघ सभा में विरोध करके
का होता है क्या परिणाम ।।

जब देखा सिद्धार्थ कुंवर ने
मौन समर्थक थे उनके ।
खड़े हुए वह स्वयं सभा में
बोले संबोधित करके ।।

मित्रों ! आप लोग जो चाहें
निश्चित ही कर सकते हैं ।
साथ आपके ही बहुमत है
आप लोग निर्णायक हैं ।।

सैनिक भर्ती का मैं विरोधी
क्षमा सभी से चाहूंगा ।
मैं सेना में नहीं रहूंगा
युद्ध में भाग नहीं लूंगा ।।

सेनापति ने कहा कि गौतम
याद करो तुम वे संकल्प ।
सदस्य बनते समय लिये जो
फिर तुम सोचो स्वयं विकल्प ।।

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