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शनिवार, 21 सितंबर 2019

हिंदी शिक्षण B.Ed. द्वितीय वर्ष (3rd Semester)



अध्याय 1. हिंदी साहित्य का इतिहास 

आदिकाल 

अपभ्रंश रचनाएं 
विजयपाल रासो : नल्ल सिंह
हम्मीर रासो : शारंगधर
कीर्ति लता : विद्यापति
कीर्ति पताका : विद्यापति

हिंदी रचनाएं 
खुमान रासो : नरपति नाल्ह
पृथ्वीराज रासो : चंदबरदाई
जयचंद प्रकाश : भट्ट केदार
जयमयंक जसचंद्रिका : मधुकर
परमाल रासो : जगनिक
खुसरो की पहेलियां : अमीर खुसरो
विद्यापति पदावली : विद्यापति

भक्तिकाल 

निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा के कवि  
कबीरदास, रैदास, दादू दयाल, सुंदर दास, रज्जब, शेख फरीद, मलूक दास, नानक
निर्गुण प्रेमाश्रयी शाखा के कवि  
मलिक मोहम्मद जायसी, कुतुबन, मंझन, उस्मान, मुल्ला दाउद ।
सगुण रामाश्रयी शाखा के कवि 
तुलसीदास, अग्रदास, नाभादास, प्राणचंद चौहान और हृदय राम ।
सगुण कृष्णाश्रयी शाखा के कवि
सूरदास, कुंभन दास, नंददास, रसखान और मीराबाई ।

रीतिकाल 

रीतिबद्ध : चिंतामणि, केशवदास, भूषण, मतिराम और पद्माकर
रीतिमुक्त : घनानंद, आलम, बोधा, ठाकुर
रीतिसिद्ध : बिहारी

आधुनिक काल 

भारतेंदु काल 
भारतेंदु हरिश्चंद्र श्रीधर पाठक प्रेम धन जगमोहन सिंह

द्विवेदी काल 
महावीर प्रसाद द्विवेदी श्यामसुंदर दास गुलाब राय जयशंकर प्रसाद सरदारपुर सिंह चंद्रधर शर्मा गुलेरी मिश्र बंधु बालमुकुंद गुप्त

छायावाद 
आचार्य रामचंद्र शुक्ल, राय कृष्णदास, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, गुलाब राय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, नंददुलारे वाजपेयी, हरि कृष्ण प्रेमी, सुमित्रानंदन पंत, माखनलाल चतुर्वेदी, पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', महादेवी वर्मा ।

छायावादोत्तर  
हजारी प्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, अमृतलाल नागर, वृंदावनलाल वर्मा, सेठ गोविंद दास, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', इलाचंद्र जोशी, जैनेंद्र कुमार, रांगेय राघव, यशपाल, फणीश्वर नाथ रेणु, लक्ष्मीनारायण मिश्र, रामवृक्ष बेनीपुरी ।

नवलेखन
अज्ञेय, धर्मवीर भारती, भारत भूषण अग्रवाल, गिरिजाकुमार माथुर, भवानी प्रसाद मिश्र, उपेंद्र नाथ 'अश्क', डॉ नगेंद्र, विद्यानिवास मिश्र, भगवती चरण वर्मा, विष्णु प्रभाकर, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, शिवानी, ऊषा देवी ।

अध्याय 2. संविधान और हिंदी 

भारतीय संविधान में स्वीकृत भाषाओं की सूची

भारत 114 प्रमुख भाषाओं वाला बहुभाषी देश है । भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में हिंदी सहित 14 प्रादेशिक भाषाओं को स्वीकृत किया गया था । परंतु संशोधन के उपरांत अब भारतीय संविधान में 22 भाषाएँ स्वीकृत हैं । यह संशोधन 2007 में हुआ था । यह 71 वां संशोधन था ।

1.असमिया 2.बंगला 3.बोडो 4.डोंगरी 5.गुजराती 6.हिंदी 7.कन्नड़ 8.कश्मीरी 9.कोकड़ी 10.मैथिली 11.मलयालम 12.मणिपुरी 13.मराठी 14.नेपाली 15.उड़िया 16.पंजाबी 17.संस्कृत 18.संथाली 19.सिंधी 20.तमिल 21.तेलुगू 22.उर्दू

संविधान के अनुच्छेद 346 में देवनागरी लिपि में हिंदी को केंद्र सरकार की कार्यालयीय भाषा का दर्जा दिया गया है ।

अध्याय 3. भाषा, मातृभाषा एवं देवनागरी लिपि

भाषा का अर्थ एवं परिभाषा

भाषा के विकास में तीन शक्तियां आधार है -
बुद्धि, विचार और चिंतन शक्ति ।

व्युत्पत्ति की दृष्टि से देखें तो भाषा शब्द संस्कृत की भाष् धातु से बना है जिसका अर्थ व्यक्त अर्थात् प्रकट की गई या उच्चरित की गई वाणी है । इंग्लिश में भाषा के लिए लैंग्वेज शब्द का प्रयोग किया जाता है जिसका संबंध लैटिन के शब्द लिंगवा (चिह्न) से एवं फ्रांसीसी शब्द लॉन्ग (लैंग्वेज) से है । इस प्रकार लैंग्वेज शब्द भी मानवीय बोली का ही वाचक है ।

"मनुष्य अपने भावों और विचारों को व्यक्त करने के लिए जिस माध्यम का प्रयोग करता है, उसे भाषा कहते हैं ।"

भाषा की प्रकृति व विशेषताएँ
1. भाषा भाव और विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम है ।
2. भाषा का विकास और जन और प्रयोग तीनों ही समाज में होते हैं ।
3. भाषा का हस्तांतरण होता है भाषा परंपरा से प्राप्त होने के साथ-साथ अर्जित भी करनी पड़ती है सीखने से भाषा का आयोजन होता है ।
4. भाषा सामाजीकरण का एक आयाम है । व्यक्ति जिस समाज में रहता है, उसकी भाषा सीखता है
5. भाषा मौखिक तथा लिखित प्रतीकों, शब्दों, संकेतों व चिन्हों, को सम्मानित करती है ।
6. भाषा अनुकरण से सीखी जाती है ।
7. भाषा एक सतत परिवर्तनशील प्रक्रिया है ।
8. भाषा मनुष्य की वह कला है जिसमें बोलने, लिखने, पढ़ने, सुनने का कौशल सम्मिलित होता है ।
9. भाषा में परिवर्तन की गति बहुत धीमी होती है और अलक्षित होती है ।

मातृभाषा का अर्थ
अंग्रेजी भाषा शास्त्री बेलार्ड के अनुसार -
"माता से सुनकर सीखी हुई घर की बोली को माता की भाषा और समाज की संवहित भाषा को मातृभाषा की संज्ञा दी गई है ।"

मातृभाषा का महत्व                  
Question.............. 2018

भावों और विचारों की अभिव्यक्ति का साधन - जीव वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिकों के अनुसार नवजात शिशु अपने मस्तिष्क में ध्वनि इकाइयों को इकट्ठा करता है तथा उनके सहारे व नए-नए शब्दों को सीखता है और जोड़ता है यह इकाइयां मातृभाषा की होती हैं ।

विचारों की जननी - मातृभाषा से बालक विचारों को ग्रहण करता है और आदान प्रदान करता है ।

भावात्मक विकास का उत्तम साधन - बच्चे अपनी मातृभाषा से बड़ा जुड़ाव महसूस करते हैं । इसीलिए जिन बच्चों की मातृभाषा एक होती है, वे एक-दूसरे से मित्रता करना पसंद करते हैं ।

सृजनात्मकता का विकास - मातृभाषा संस्कृति का हस्तांतरण करने में प्रमुख भूमिका निभाती है । अन्य भाषा की अपेक्षा बालक मातृभाषा पर जल्दी अधिकार प्राप्त कर लेता है ।

बौद्धिक एवं संज्ञानात्मक विकास - मातृभाषा हमारे मन व चिंतन तथा अनुभूति का साधन है । एनी बेसेंट के अनुसार, "मातृभाषा द्वारा शिक्षा ना देने की स्थिति ने निश्चित रूप से भारत देश को विश्व के सभी देशों में अति अज्ञानी बना दिया है । इसी कारण देश में उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों की संख्या न्यून तथा अशिक्षितों की संख्या सबसे अधिक है ।

सांस्कृतिक जीवन और मातृभाषा - मातृभाषा में ही देश संस्कृति नहीं होती है अतः मात्र भाषा शिक्षण में भारतीयों में चार पुरुषार्थ आदि के भाव जागृत होते हैं यही भारतीय संस्कृति है ।

जीवन तथा मातृभूमि के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण - जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी । मातृभाषा और उसका साहित्य अपनी धरती और परिवेश के प्रति आत्मीयता के भाव उत्पन्न करता है । मातृभाषा के साहित्य में सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन का परिचय मिलता है ।

देवनागरी लिपि की विशेषताएँ
1. देवनागरी लिपि सभी भारतीय लिपियों में संबंध स्थापन की लिपि रही है ।
2. उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश बिहार हिमाचल प्रदेश आदि हिंदी प्रदेशों की लिपि है ।
3. संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग होता है ।
4. देवनागरी लिपि अखिल भारत में व्याप्त है देवनागरी लिपि में भारतीय भाषाओं में प्रसिद्ध सभी ध्वनियों को अंकित करने की क्षमता है ।
5. देवनागरी लिपि में एक वर्ण का एक ही उच्चारण होता है । वर्णों का विन्यास ध्वनि विज्ञान के सिद्धांतों के अनुकूल है ।
6. स्वर अलग व्यंजन अलग स्वरों में भी मूल स्वर पहले संयुक्त स्वर बाद में भाषाओं की दृष्टि से देवनागरी वर्णमाला पूर्ण है । इसमें ह्रस्व और दीर्घ का भेद स्पष्ट है ।


भाषा नीति 

स्वतंत्रता से पूर्व भाषा नीति 
प्राचीन काल में हमारी भाषा नीति स्पष्ट थी । बोलियां अनेक थी किंतु शिक्षा एवं सरकारी कामकाज के माध्यम के रूप में संस्कृत स्वीकृति संस्कृत । विद्वानों से छतों व जनता के उच्च वर्ग की भाषा रात दीवानी थी । पानियों पतंजलि जैसे भाषा वैज्ञानिकों के हाथों में आकर यह इतनी परिमार्जित हो गई थी कि उच्चतम हो सोचो से सोच विचारों को अभिव्यक्त करने में यह सर्वथा असमर्थ थी ।

बौद्ध काल में अशोक जैसे महान सम्राट के शासनकाल में भारत की राजभाषा का पद पाली व प्राकृत को मिला । पाली व प्राकृत की भी खूब उन्नति हुई । इसमें ग्रंथ रचे गए, घोषणाएं की गई, सिलाओ एवं स्तंभों पर लेख लिखे गए एवं भारत के प्रमुख विद्यालय में बिहार में विश्वविद्यालयों तथा आश्रमों में पाली और प्राकृत का पठन-पाठन होने लगा ।

मुगलों के शासन काल में कोशिश करता है । कामकाज की भाषा फारसी हुई । अदालतों कचोरी एवं दरबारों में फारसी का बोलबाला प्रारंभ हुआ, जिसके अवशेष अभी भी कचहरी में देवनागरी लिपि में लिखी देखे झूठे फारसी के शब्दों के रूप में देखे जा सकते हैं । साधारण जनता ने बाजारों में एक अन्य भाषा उर्दू या हिंदी का विकास कर लिया था, किंतु राजभाषा का पदभार सी को प्राप्त था । अतः शिक्षालय उन्हें भी फ़ारसी का पठन-पाठन प्रारंभ हुआ । मकतब हुआ मदरसे खोलें । फारसी का विद्वान चारों ओर सम्मानित होने लगा ।

एक समय आया, जब समूचा भारत ब्रिटिश राष्ट्रध्वज के नीचे आ गया । अंग्रेज पहले व्यापार पर ही अपना ध्यान केंद्रित किए थे किंतु जब बाद में उन्हें राज्य करने का लगा तो भाषा का प्रश्न भी उनके सामने आया । व्यापारी जहां जाता है वहां की भाषा से परिचय प्राप्त करता है । अंग्रेजों ने भी पहले ऐसा ही किया किंतु बाद में उन्हें ऐसा करने की आवश्यकता प्रतीत नहीं हुई । राजकाज की भाषा अंग्रेजी थी । उधर अंग्रेजी के सौभाग्य से मैकाले की शिक्षा नीति स्वीकृत हो गई ।

ब्रिटिश शासन काल के प्रयासों के पश्चात हमारी भाषा नीति स्पष्ट थी अंग्रेजी राजभाषा थी विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी था ।

स्वतंत्र भारत की भाषा नीति  
स्वतंत्र भारत में सरकार की भाषा संबंधी नीति की दिशा राज राजा जी ने पहले ही निश्चित कर दी थी । द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जी के हाथों में मद्रास प्रदेश की बागडोर आई, तो उन्होंने उसी दिशा में तमिलनाडु का मार्गदर्शन किया मद्रास की दोनों व्यवस्थापिका सभाओं में हिंदी विरोध का दृढ़ता पूर्वक सामना करते हुए राजा जी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा होने का प्रस्ताव पास कराया और कहा - " सरकार की नीति इस संबंध में यही है कि हिंदी का जो भारत के अधिकांश भागों में बोली जाती है - कामचलाऊ ज्ञान हो जाए, ताकि इस (मद्रास) प्रदेश के विद्यार्थी इस योग्य हो जाएँ कि दक्षिण तथा उत्तर में सुविधा पूर्वक विचार विनिमय कर सकें ।" उन्होंने शिक्षा के उद्देश्य का संदर्भ देते हुए आगे कहा -" निष्कर्ष यह है कि हिंदी का गंभीर ज्ञान प्राप्त करना भारत की सभी लोगों के लिए शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए ।"

ख्याति प्राप्त बंगाली विद्वान बंकिम चंद्र चटर्जी के कथन है -" हिंदी भाषा की सहायता से भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों में जो लोग स्थापित कर सकेंगे वहीं प्राकृत बंधु का हल आने योग्य हैं । चेष्टा कीजिए, यत्न कीजिए, कितने ही समय बाद क्यों न हो, मनोरथ पूर्ण होगा । हिंदी भाषा के द्वारा भारत के अधिकांश स्थानों का मंगल साधन कीजिए, केवल बंगला और अंग्रेजी की चर्चा से काम ना चलेगा ।
आचार्य विनोबा भावे ने तो यहां तक कह डाला कि मैं दुनिया की सब भाषाओं की जिद करता हूं परंतु मेरे देश में हिंदी की इज्जत ना हो यह मैं नहीं सकता ।
प्रसिद्ध भाषा शास्त्री डॉ सुनीत कुमार चटर्जी के उद्गार भी भाषा नीति के परिचायक थे । उनका कहना था -" राष्ट्रीयता के प्रतीक स्वरूप एक भाषा के माने बिना काम नहीं चल सकता और यह भाषा देश की या राष्ट्र की कोई भाषा होनी चाहिए । हिंदी की प्रतिष्ठा सर्वत्र दीख पड़ती है । हमारा सब अंतरप्रांतीय कामकाज राष्ट्रभाषा हिंदी में ही हो सकता है ।"

सन् 1967 में उत्तर प्रदेश में संविदा सरकार ने हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट परीक्षा के लिए भाषा नीति संबंधी 3-4 परस्पर विरोधी आदेश निकाले थे । सन् 1956 से सन् 1967 तक हम त्रिभाषा सूत्र का जप करते रहे । वर्ष 1967-68 में केंद्रीय सरकार पुनः द्विभाषा सूत्र की ओर झुकी और अब पुनः त्रिभाषा सूत्र की चर्चा गरम है ।

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित नरेश मेहता ने हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के पैंतालिसवें वार्षिक अधिवेशन के अवसर पर पटना में दिए गए अध्यक्षीय भाषण में कहा -
गणतंत्र की स्थापना के साथ हिंदी को राष्ट्रभाषा मान लिया गया हम सब जानते हैं कि इस गौरव के पीछे स्वामी दयानंद सरस्वती महात्मा गांधी तथा टंडन जी का योगदान सबसे प्रमुख है वह समय था जब तत्काल राष्ट्रभाषा को प्रतिस्थापित किया जा सकता था लेकिन जब इसको लागू करने के लिए 15 वर्ष का समय मांगा गया, वही सबसे बड़ी भूल थी । यह अवधि राज्य और प्रशासन में बैठे अभारतीय मानसिकता वाले महापुरुषों के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हुई । इस देश पर योजनाबद्ध तरीके से अंग्रेजी का वर्चस्व और विस्तार इसी अवधि में बड़ा । राष्ट्रभाषा संज्ञा को कितना भ्रामक बनाया जा सकता है, हम इसी अवधि में देखते हैं । अकेली हिंदी ही क्यों राष्ट्रभाषा है ? क्या अन्य भारतीय भाषाएं अराष्ट्रीय हैं ? इस प्रकार राष्ट्रभाषा के प्रश्न को हिंदी बनाम अन्य भारतीय भाषाओं के बीच विद्वेष और विरोध रूप में पनपाया गया ताकि ये भारतीय भाषाएं आपस में लड़ती रहें और अंग्रेजी की स्थिति सुदृढ़ होती रहे । राजभाषा संपर्क भाषा जैसे नए-नए विचार खड़े किए गए । सभी भारतीय भाषाएं इस षड्यंत्र की शिकार होती गई । इस बंदरबांट का सारा लाभ राजभाषा अंग्रेजी को मिलता रहा ।

14 सितंबर सन् 1996 को हिंदी दिवस मनाने की औपचारिकताएं निभाने के अवसर पर राष्ट्रीय सहारा हिंदी दैनिक के एक और हिंदी उत्सव शीर्षक से 16 सितंबर सन् 1996 को प्रकाशित संपादकीय में विद्वान संपादक ने निम्नलिखित टिप्पणी की है -
भारत उत्सव धर्मी देश है । इसीलिए जयंती आवत जन्म शताब्दी मनाने वाले देश में राष्ट्रभाषा को भी दिवस के रूप में निपटाने की परंपरा विकसित हो जाना कोई हजरतगंज बात नहीं है । देश में ढेरों मंत्रालय उनके कार्यालय सार्वजनिक प्रतिष्ठान शिक्षण संस्थाएं इन सब की भी राष्ट्रभाषा के प्रति कुछ जिम्मेदारी बनती है । इसलिए हिंदी पखवाड़े और हिंदी मास के रूप में दीर्घकालीन हिंदी उत्सव की परंपरा भी अपनी जड़े जमा चुकी है । पूछा जा सकता है कि हिंदी दिवस पखवाड़ा की आवश्यकता है ? जबाब हाजिर है - हिंदी दिवस मनाया जाए तो देश की यह भूल जाने का खतरा है कि उसकी राष्ट्रभाषा हिंदी है हमने अपने महापुरुषों को जयंतियों के सहारे ही आज तक जिंदा रखा है ।

नई दिल्ली में 31 अगस्त 1997 को संपन्न हिंदी प्रकाशक संघ के 38वें वार्षिक अधिवेशन में हिंदी दैनिक जागरण के संपादक नरेंद्र मोहन ने कहा - "सरकारी सहायता के बूते पर हिंदी प्रकाशन व्यवसाय तो चलाया जा सकता है लेकिन उन लांंछनों का जवाब नहीं दिया जा सकता, जो आज हिंदी पर लग रहे हैं । उन्होंने कहा कि जिस भाषा को देश के 70 करोड़ लोग समझते हैं तथा 25 करोड़ अच्छी तरह पढ़ लेते हों, उसे आजादी के 50 वर्ष बाद भी राजभाषा का दर्जा न मिल पाना अफसोस की बात है ।"

भाषा के विविध रूप
भाषा की अनुरूपता को संक्षेप में निम्न बिंदुओं के अंतर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है -

मूल भाषा - ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर विश्व की प्रत्येक भाषा का आधार कोई न कोई मूल भाषा मानी गई है । यह मूल भाषा काल्पनिक है । जैसे - इंडो-यूरोपियन या भारोपीय मूल भाषा ।

आदर्श भाषा - यह भाषा का आदर्श रूप है साहित्यिक रचनाएं इसी में होती हैं शासन व शिक्षित वर्ग में ऐसी भाषा का प्रयोग होता है । यह भाषा व्याकरण की दृष्टि से परिष्कृत होती है । संस्कृत, हिंदी भारत की आदर्श भाषाएं हैं ।

विभाषा - जो भाषाएँ प्रांतीय स्तर पर शासन द्वारा स्वीकृत हो जाती हैं, वे विभाषा की श्रेणी में आती हैं । जैसे - पहाड़ी, बंगाली, मराठी आदि ।

कूट भाषा - कूट भाषा में कुछ विशिष्ट शब्दों का विशेष अर्थ होता है । जो उन संकेतों का अर्थ जानता है, वही उसका अर्थ समझ सकता है । इस प्रकार की भाषा का प्रयोग राजनीतिज्ञ, विद्रोहियों, क्रांतिकारियों आदि द्वारा किया जाता है ।

बोली - जो भाषाएं प्रांतीय स्तर पर स्वीकृत ना होकर मंडलीय स्तर पर स्वीकृत रहती हैं, उन्हें बोली की श्रेणी में रखा जाता है । जैसे हिंदी की बोलियां ब्रज अवधी कुमाऊनी बुंदेली भोजपुरी आदि ।

अपभाषा - अशिष्ट, असभ्य और और अपरिष्कृत भाषा को अपभाषा कहते हैं । इसमें व्याकरण के नियमों की उपेक्षा, अपरिष्कृत वाक्य रचना, अशिष्ट शब्द प्रयोग व अशिष्ट मुहावरों का प्रयोग पाया जाता है । जैसे - अरे, अबे आदि संबोधन ।

विशिष्ट भाषा - विभिन्न व्यवसायों के आधार पर भाषा के विविध रूप समाज में दिखाई देते हैं किसान मजदूर लोहार दर्जी अध्यापक वकील धर्म गुरु चिकित्सक आदि अपने व्यवसाय के अनुसार अलग-अलग शब्दों का प्रयोग करते हैं ।

कृत्रिम भाषा - भाषा परंपरागत नहीं होती यह भाषा सुबोध था और सुगमता को ध्यान में रखकर निर्मित की जाती है जैसे ऑक्सीडेंटल नोबेल आदि ।

अध्याय 8. हिंदी के विविध सृजनात्मक आयाम 

कार्यालयी हिंदी 
संविधान के अनुच्छेद 343 (1) में देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी को संघ की भाषा घोषित किया गया है जिसमें यह व्यवस्था दी गई है कि भारत संघ के सरकारी कामकाज के लिए हिंदी प्रयोग में लाई जाए । इसी अनुछेद के भाग (2) में यह व्यवस्था दी गई है कि संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए भारतीय अंकों के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को प्रयोग में लाया जाए । आजादी के तत्काल बाद सरकारी कर्मचारियों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती थी कि वह हिंदी में सरकारी कामकाज करने लगे । आतः यह व्यवस्था दी गई कि अगले 15 वर्षों तक अंग्रेजी का प्रयोग लिया जाए ।

1963 में राजभाषा अधिनियम बनाया गया और बाद में 1976 में राजभाषा नियम बनाए गए । हिंदी को शीघ्र और प्रभावी रूप से कार्यालय भाषा बनाए जाने के लिए सरकार ने विद स्तर पर विभिन्न प्रकार के प्रयास किए । सरकारी कामकाज में हिंदी का प्रयोग विभिन्न रूपों में होता है । सरकारी कामकाज के पत्रों का सबसे पहले ड्राफ्ट बनाया जाता है, जिसे मसौदा या आलेख कहते हैं । ड्राफ्ट तैयार करने को प्रारूपण कहा जाता है ।

कार्यालय पत्राचार में प्रयुक्त होने वाले संबंधित प्रशासकीय शब्द निम्नलिखित हैं -

(1) शीर्षक (2) पत्र संख्या (3) प्रेषक (4) प्रेषित (5) विषय (6) संबोधन (7) निर्देश (8) पत्र का मुख्य भाग (9) अधोलेख

सरकारी कार्यालयों में विभिन्न प्रयोजनों के लिए हिंदी में पत्र लिखे जाते हैं । प्रयोजन के अनुसार पत्रों के प्रकार होते हैं - 

(1) सरकारी पत्र (2) कार्यालय ज्ञापन (3) ज्ञापन (4) परिपत्र (5) मंजूरी (6) कार्यालय आदेश (7) अर्धसरकारी पत्र (8) पृष्ठांकन (9) संकल्प (10) अनुस्मारक (11) अधिसूचना (12) आर्सेनिक पत्र (13) प्रेस विज्ञप्ति (14) सूचना (15)  द्रुति पत्र (16) प्राप्ति पत्र (17) आदेश (18) घोषणा

वाणिज्य और व्यापार क्षेत्र में हिंदी
 व्यापार की सफलता बहुत कुछ सार्थक एवं प्रभावशाली पत्र व्यवहार पर निर्भर करती है पत्र की भाषा शैली पत्र प्रेषक के मंतव्य तथा भावनाओं को पाने वाले संप्रेषित करती है । व्यावसायिक क्षेत्र में मौखिक शब्दों की तुलना में लिखित शब्द अधिक महत्वपूर्ण होते हैं । वाणिज्य और व्यापारिक क्षेत्र में पत्र लिखने की कला और सूझ-बूझ का अभ्यास अपेक्षित है ।
वाणिज्यिक और व्यापारिक क्षेत्र के पत्रों के निम्नलिखित अंग होते हैं -

(1) प्रेषक का नाम व पता (2) दिनांक (3) पाने वाले का नाम व पता (4) विषय संकेत (5) संबोधन (6) पत्र की मुख्य सामग्री (7) समापन सूचक शब्द (8) हस्ताक्षर और नाम (9) संलग्नक (10) पुनश्च

वैज्ञानिक और तकनीकी के क्षेत्र में
विज्ञान की भाषा तथ्यपरक संदर्भों की भाषा होती है । इसमें कार्य कारण संदर्भ होता है । पारिभाषिक शब्दावली की स्पष्टता और सटीकता पर विशेष ध्यान दिया जाता है । विज्ञान और तकनीकी की भाषा की विशेषताओं को निम्नवत वर्णित किया जा सकता है -
(1) शैली के स्थान पर विषय पर अधिक बल दिया जाता है ।
(2) भाषा विषय पर एक होने के कारण वर्णनात्मक होती है ।
(3) विज्ञान और तकनीकी की भाषा ना तो देख साल से बाधित होती है और ना ही व्यक्ति सापेक्ष होती है ।
(4) किसी वैज्ञानिक और तकनीकी साहित्य की भाषा के निश्चित स्वरूप होने के कारण अनुवाद कार्य में बाधा नहीं आती ।
(5) विज्ञान लेखन की भाषा और शैली सरल होती है जिसका उद्देश्य पांडित्य प्रदर्शन न होकर सिर्फ सीधे तौर पर विज्ञान की बात को समझाना होता है ।
(6) विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में हिंदी भाषा की निम्न चार विशेषताएं हैं -
(i) सुस्पष्टता, सुनिश्चितता और सुबोधता ।
(ii) वस्तुनिष्ठता ।
(iii) अलंकारिकता का अभाव ।
(iv) वैज्ञानिक शैली ।

विधि के क्षेत्र में हिंदी 
विधि अथवा कानून की भाषा की निम्नलिखित विशेषताएं हैं -
(1) पारदर्शिता (2) स्पष्टता (3) लिखित कथा साहित्य या अन्य साहित्य से भिन्नता (4) निश्चित अर्थवत्ता आदि

विधिक क्षेत्र में निम्नलिखित कार्य हिंदी में किए जा रहे हैं -
(1) सांविधिक नियमों का भारत के राजपत्र में प्रकाशन
(2) भारत में होने वाले अंतरराष्ट्रीय करार हिंदी में हो रहे हैं ।
(3) संसद के दोनों सदनों में कार्यवाही या हिंदी से अंग्रेजी दोनों भाषाओं में हो रही है ।
(4) राष्ट्रपति के प्राधिकार से जारी नियमों विनियमों के के प्राधिकृत पाठ माने जाते हैं ।
(5) उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश बिहार राजस्थान के उच्च न्यायालय में हिंदी का प्रयोग हो रहा है ।
(6) हिंदी भाषी प्रदेशों में सभी स्थानीय न्यायालय जिला न्यायालय इत्यादि में हिंदी का प्रयोग बड़ी मात्रा में हो रहा है ।उक्त राज्यों में बिक्री या आदेश भी हिंदी में जारी होते हैं ।
(7) प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार है कि वह अपनी भाषा में न्याय की मांग कर सकता है ।
(8) राजभाषा नीति के अनुसार कोई भी व्यक्ति अपना आवेदन अभ्यावेदन हिंदी में दे सकता है ।
(9) कई उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश हिंदी में निर्णय भी देने लगे हैं ।

सामाजिक विज्ञान में
सामाजिक विज्ञान के संदर्भ में हिंदी के कुछ प्रमुख लक्षणों को निम्नवत् व्याख्यायित किया जा सकता है -

(1) हाल के वर्षों में हिंदी भाषा का अध्ययन भाषा सुरक्षा, भाषा परिवर्तन, भाषा मानकीकरण, भाषा नियोजन आदि दृष्टियों से किया जाने लगा, तो स्पष्ट होता है कि हिंदी सामाजिक विज्ञान के प्रकारों को पूरा करने में सक्षम है ।
(2) सामाजिक विज्ञान में प्रायः हिंदी का मानक रूप ही प्रयोग में लाया जाता है ।
(3) सामाजिक विज्ञान के अंतर्गत इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र, नागरिक शास्त्र और अर्थशास्त्र सन्निहित होते हैं । अतः हिंदी की अनेक प्रयोग क्यों का प्रयोग देखा जा सकता है । तत्सम शब्दावली प्रधान हिंदी, मिश्रित हिंदी तथा बोलचाल वाली हिंदी तीनों का ही प्रयोग किया जाता है ।
(4) सामाजिक विज्ञान में आत्मपरक और आनंदमूलक भाषा का प्रयोग नहीं किया जाता, क्योंकि इस क्षेत्र में विचार, बुद्धि, तर्क और ज्ञान की अपनी प्रकृति होती है ।
(5) सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में स्थूल तथ्यात्मक हिंदी भाषा का उपयोगितावादी रूप ही अधिक प्रचलित है ।
(6) शब्दावली, रूप तथा शैली आत्मसात करने में सरल होती है ।

संचार माध्यमों की भाषा

संचार के बदलते माध्यमों के अनुसार भाषा में भी परिवर्तन आता गया है ।
समाचार पत्र-पत्रिकाओं की भाषा :- समाचार पत्र-पत्रिकाओं की भाषा आम लोगों की भाषा होती है । समाचार पत्र पत्रिकाओं का उद्देश्य होता है कि अपनी बात को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाया जाए, इसीलिए समाचार पत्रों की भाषा में सरल सटीक और सार्थक होनी चाहिए । आज समाचार पत्रों की भाषा में काफी बदलाव आ गया है । भाषा मिश्रित हो गई है ।
रेडियो की भाषा :- रेडियो पूर्णता बोले जाने वाले शब्दों का माध्यम है इसलिए रेडियो की विशेषता उसकी भाषा के संदर्भ में भाषित होती है रेडियो ने वाड़ी का बहुत विकास किया है । लेनिन रेडियो को बिना कागज बिना अधूरी का समाचार पत्र मांगते थे साक्षर निरीक्षण निर्धन नेत्रहीन आदि सभी के लिए रेडियो का महत्व होता है । रेडियो पूरी तरह से ध्वनियों पर आधारित है । रेडियो की शब्दावली निम्न तीन प्रकार की सामग्री से निर्मित होती है -
वाक या वाडी
ध्वनि प्रभाव
मोहन या चुप्पी
रेडियो की भाषा की विशेषताओं का उल्लेख नंबर किया जा सकता है भाषा श्रोता के समझ में आए इसलिए कठिन भाषा का प्रयोग करने के बजाय जनसाधारण में बोली जाने वाली आम भाषा का प्रयोग वांछित होता है । रेडियो पर बोलने के लिए छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग करना चाहिए ताकि श्रोता उसे आसानी से समझ सके । छोटी-छोटी वाक्य बनाना ही पर्याप्त नहीं है, इन वाक्यों को क्रमबद्ध तरीके से व्यवस्थित किया जाना चाहिए जिससे प्रसारित सामग्री सुबोध तरीके से सोता हूं तक पहुंच जाए । हमेशा एक ही तरह की भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए, जैसा विषय हो उसी के अनुरूप भाषा होनी चाहिए । संज्ञा शब्दों का प्रयोग समय समय पर किया जाना चाहिए किसी समाचार में संबंधित व्यक्ति का पूरा नाम एक बार लिया जाए, उसके बाद उपनाम का ही प्रयोग करना चाहिए रेडियो की भाषा में लगातार बदलाव आता जा रहा है पहले एवं वह का बहुतायत से प्रयोग किया जाता था अब और शब्द का प्रयोग किया जाता है । रेडियो के कार्यक्रमों की सीमा निर्धारित होती है उसी समय सीमा के अनुसार शब्दों की सीमा निर्धारित की जाती है । आज के तकनीकी युग में रेडियो की भाषा भी तकनीकी युक्त होती जा रही है रेडियो कार्यक्रमों में खड़ी बोली के साथ-साथ लोकप्रिय अवधी भोजपुरी ब्रजभाषा इत्यादि लोकप्रिय आंचलिक भाषाओं के शब्दों का बहुतायत से प्रयोग किया जा रहा है ।

टेलीविजन की भाषा :- टेलीविजन दूरदर्शन की भाषा को निम्न व्याख्या ईद किया जा सकता है हिंदी की पूरी की पूरी स्क्रिप्ट अंग्रेजी से भरी होती है टीवी की भाषा आम और खास दोनों के लिए होती है आम आदमी अशिक्षित भी हो सकता है और विद्वान भी टीवी की भाषा को आधुनिक भाषा का खिचड़ी रूप कहना अतिशयोक्ति नहीं है और यही सर ओमान भाषा होती जा रही है सरल शब्दों के प्रयोग के पीछे एक तर्क यह भी है कि कठिन शब्द उच्चारण की दृष्टि से परेशानी पैदा करते हैं सरल शब्द एंकर की दृष्टि से भी उपयोगी होते हैं इसीलिए टीवी में उसी भाषा के प्रयोग को सार्थक माना जाता है जो बहुसंख्यक दर्शकों को प्रिय लगती है टीवी की भाषा में लोकोक्तियां और मुहावरों का प्रयोग किया जाता है क्योंकि इससे भाषा सशक्त और जीवन तोड़ती है जैसे विराट कोहली ने कहर ढाया भारत बहुभाषी देश है यहां अरबी फारसी उर्दू बोलने वाले और समझने वाले काफी लोग हैं इसीलिए टीवी के कार्यक्रमों में इन भाषाओं का सहज रूप से प्रयोग किया जाता है इन भाषाओं के अनगिनत शब्द हिंदी में घुल मिल गए हैं । उदाहरण - अरबी भाषा के शब्द - अचानक, अदालत, इंसान, कसम आदि । फारसी भाषा के शब्द - कागज, चेहरा, जादू, पहलवान आदि । उर्दू भाषा के शब्द - दोस्त, हिम्मत, आवारा, बदनाम, खुला शादी ।

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अध्याय 9. भाषायिक विकास की विभिन्न अवस्थाएँ, विशेषताएं एवं प्रकृति 

प्राचीन भारतीय आर्य भाषाएँ
वैदिक संस्कृत
लौकिक संस्कृत (संस्कृत)

मध्यकालीन भारतीय आर्य भाषाएँ
प्राचीन प्राकृत या पाली
मध्यकालीन प्राकृत
सौरसेनी
महाराष्ट्र गधी
अर्धमगधी
पैशाची

परकालीन प्राकृत अपभ्रंश

आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ
1. पश्चिमी हिंदी
पश्चिमी हिंदी की बोलियाँ
2. राजस्थानी
3. गुजराती
4. मराठी
5. बिहारी
6. बंगाली
7. उड़िया
8. पूर्वी हिंदी
9. सिंधी
10. पंजाबी
11. पहाड़ी

अध्याय 10. शिक्षण उद्देश्यों का वर्गीकरण

हिंदी शिक्षण के सामान्य उद्देश्य
मातृ भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के उद्देश्य निम्नलिखित हैं -

1. शुद्ध, सरल, स्पष्ट एवं प्रभावशाली भाषा में छात्र अपने विचारों, भावों एवं अनुभूतियों को अभिव्यक्त कर सकें ।
2. छात्रों को इस योग्य बनाना कि वे उचित भाव-भंगिमाओं के साथ वाचन करके काव्य-कला एवं अभिनय-कला का आनंद प्राप्त कर सकें ।
3. ज्ञान प्राप्त करने और मनोरंजन के लिए पढ़ना-लिखना सिखाना, गद्य-पद्य में निहित आनंद और चमत्कार से परिचय प्राप्त कराना, मातृभाषा शिक्षण के महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं ।
4. क्रमबद्ध विचार प्रणाली और भावाभिव्यंजन में दक्ष बनाना ।
5. बालकों के शब्दों, वाक्यांशों तथा लोकोक्तियों आदि के कोष में वृद्धि करना ।
6. उनको शुद्धता एवं गति का निरंतर विकास करते हुए वाचन का अभ्यास कराना ।
7. ज्ञान क्षेत्र तथा विवेक का निरंतर विकास करके चरित्र निर्माण करना ।
8. विभिन्न शैलियों का परिचय कराकर अपनी उपयुक्त शैली के विकास में सहायता करना ।
9. उन्हें सत्साहित्य के सृजन की प्रेरणा देना ।
10. बालकों को मानव स्वभाव एवं चरित्र के अध्ययन का अवसर प्रदान करना ।

उद्देश्यों का विश्लेषण 
ज्ञानात्मक उद्देश्य -
1. ध्वनि, शब्द एवं वाक्य-रचना का ज्ञान देना ।
2. उच्च माध्यमिक स्तर पर निबंध, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि साहित्यिक विधाओं का ज्ञान देना ।
3. सांस्कृतिक, पौराणिक, व्यवहारिक एवं जीवनगत अनुभूतियों गाथाओं तथ्यों घटनाओं आदि का ज्ञान देना तथा लेखक की जीवनगत, रचनागत विशेषताओं एवं समीक्षा सिद्धांतों का उच्च माध्यमिक स्तर पर ज्ञान देना ।
4. रचना कार्य के मौखिक एवं लिखित रूपों का ज्ञान देना जिनमें वार्तालाप सस्वर वाचन, अंत्याक्षरी, भाषण, वाद-विवाद संवाद, साक्षात्कार, निबंध, कहानी, आत्मकथा, पत्र आदि सम्मिलित हैं ।
5. उच्चतर माध्यमिक स्तर पर छात्रों को हिंदी साहित्य के इतिहास की रूपरेखा से भी परिचित कराना चाहिए ।

कौशलात्मक उद्देश्य -       
Question.............. 2018

इन उद्देश्यों का संबंध भाषा के कौशलों से है । कौशलात्मक उद्देश्यों के अंतर्गत निम्नलिखित बातें आती हैं -

1.  सुनकर अर्थ ग्रहण करना ।
2. शुद्ध एवं स्पष्ट वाचन करना ।
3. गद्य-पद्य पढ़कर अर्थ ग्रहण करना
4. बोलकर भावाभिव्यक्ति करना ।
5. लिखकर भाव अभिव्यक्ति करना ।

सुनकर अर्थ ग्रहण करने से अभिप्राय यह है कि छात्र में निम्नलिखित योग्यताएं आ जाएं -

1. धैर्य पूर्वक सुनना ।
2. सुनने की शिष्टाचार का पालन करना ।
3. मनोयोग पूर्वक सुनना ।
4. ग्रहण सिलता मना ही स्थिति स्थिति बनाए रखना ।
5. शब्दों मुहावरों व्यक्तियों का प्रसंग अनुकूल अर्थ हुआ भाव समझ सकना ।
6. स्वरा घात बलाघात व स्वर के उतार-चढ़ाव के अनुसार अर्थ ग्रहण कर सकना ।
7. स्रोत सामग्री के विषय को जान सकना ।
8. महत्वपूर्ण विचारों भावों एवं तथ्यों का चयन कर सकना ।
9. सारांश ग्रहण कर सकना ।
10. भावों विचारों व तथ्यों का मूल्यांकन कर सकना ।

वार्तालाप वाद विवाद प्रवचन भाषण आदेश निर्देश कविता आकाशवाणी प्रसारण जैसी सामग्रियों को सुनकर उपयुक्त योग्यताओं का विकास किया जा सकता है ।



रसात्मक उद्देश्य -
1. साहित्य का रसास्वादन ।
2. साहित्य की सामान्य समालोचना ।

सृजनात्मक उद्देश्य -
1. विषय तथा उसके अंतर्गत भावों एवं विचारों के लिए उपयुक्त साहित्य की विधा का चयन करना ।
2. स्वानुभूत भावों तथा विचारों को अभिव्यक्त करना ।
3. स्वानुभूत भावों तथा विचारों को प्रभावपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करना ।
4. गृहीत व स्वानुभूत विचारों को कल्पना की सहायता से नया रूप देना ।
5. गृहीत व स्वानुभूत भावों तथा विचारों को अपने ढंग से व्यक्त करना ।
6. विषय तथा प्रसंग के अनुकूल भाषा एवं शैली का उपयोग करना ।

अभिवृत्यात्मक उद्देश्य -
1. भाषा और साहित्य में रुचि ।
2. सद्वृत्तियों का विकास

भाषा और साहित्य में रुचि लेने के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए छात्र में निम्नलिखित योग्यताओं का विकास आवश्यक है -

1. पाठ्यक्रम के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें पढ़ना ।
2. अच्छी-अच्छी कविताएं कंठस्थ करना ।
3. कक्षा और विद्यालय की पत्रिका में योगदान देना ।
4. कक्षा व विद्यालय में होने वाले साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लेना ।
5. विद्यालय से बाहर होने वाले साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लेना ।
6. साहित्यकारों के चित्र एकत्रित करना ।
7. साहित्यिक महत्व की पत्रिकाएं एकत्रित करना ।
8. साहित्यिक महत्व के अनेक चित्र एकत्रित करना ।
9. अपना एक पुस्तकालय बनाना ।
10. साहित्यिक संस्थाओं का सदस्य बनना ।

अध्याय 11. हिंदी का पाठ्यक्रम

प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा शिक्षण के उद्देश्य


1. छात्र के उच्चारण को शुद्ध बनाना उसके विचारों का धीरे-धीरे विकसित करना ।
2. उसके शब्दकोश को क्रमशः विकसित करना ।
3. विचारों में स्पष्टता एवं तर्कसंगत ताला ना वाचन में गति का विकास करना ।
4. वाचन को शुद्ध एवं प्रभावोत्पादक बनाना लिपि का सही ज्ञान एवं अभ्यास प्रदान करना ।
5. सुलेख अनुलेख एवं श्रुतलेख का अभ्यास कराना ।
6. अभिव्यक्ति की शक्ति को विकसित करना ।
7. कविता का स्वर एवं उचित लाए के साथ पाठ करने की क्षमता उत्पन्न करना ।

माध्यमिक स्तर पर मातृभाषा शिक्षण के उद्देश्य

1. छात्रों में सौंदर्य अनुभूति का विकास करते हुए रस पाठों में अधिक रूचि लेने के लिए तैयार करना ।
2. उनमें संवाद तथा अभिनय की योग्यता को विकसित करना ।
3. उन्हें व्याकरण काउच ज्ञान प्रदान करना ।
4. निबंध पत्र संवाद सारांश आदि में लेखन की योग्यता प्रदान करना ।
5. लेखन के गुण विचारों को समझने की योग्यता प्रदान करना ।
6. उनमें स्वाध्याय की आदत का विकास करना ।
7. उन्हें द्रुत रूप से स्वर तथा मौन पठन करने की प्रेरणा प्रदान करना ।

उच्चतर माध्यमिक स्तर पर मातृभाषा शिक्षण के उद्देश्य 

1. मौखिक और लिखित भाषा के माध्यम से बोध ग्रहण की क्षमताओं का विकास करना ।
2. मौखिक और लिखित अभिव्यक्ति की कुशलता ओं का विकास करना ।
3. मातृभाषा का विश्लेषण करने में तथा उसके शुद्ध और प्रभावशाली प्रयोग में समर्थ बनाना ।
4. मौखिक और लिखित अभिव्यक्ति का विभिन्न विधाओं और शैलियों का ज्ञान कराना और उनकी प्रयोग की योग्यता का विकास करना ।
5. मातृभाषा के प्राचीन तथा नवीन साहित्य में प्रवेश कराना तथा प्रमुख कवियों लेखकों व काव्य धाराओं का संक्षिप्त परिचय कराना ।
6. हिंदी भाषा और उसके साहित्य के इतिहास का संक्षिप्त परिचय देना ।
7. काव्य के विभिन्न तत्वों का सामान्य परिचय कराना ।
8. छात्रों की सौंदर्य अनुभूति और सृजनशीलता का विकास करना ।
9. चिंतन की योग्यता का विकास करना । छात्रों को अपने व्यक्तिगत जीवन मानसिक बौद्धिक व सामाजिक समस्याओं को समझने और उनका हल खोजने में समर्थ बनाना ।
10. छात्रों को भावी व्यावसायिक जीवन के लिए तैयार करना ताकि भी अध्यापन कृषि वाणिज्य तथा दफ्तरी कार्य आदि सफलतापूर्वक कर सकें ।
11. विश्वविद्यालय स्तर पर मातृभाषा और उसके माध्यम से अन्य विषयों की शिक्षा प्राप्त करने के लिए तैयार करना ।
12. भारतीय संस्कृति का परिचय कराना और छात्रों में सांस्कृतिक चेतना जगाना ।
13. छात्रों के चरित्र का निर्माण करना ।
14. पाठ्य पुस्तकों के अतिरिक्त साहित्य पढ़कर स्वयं ज्ञान और मनोरंजन करने में समर्थ बनाना ।

पाठ्यक्रम का क्षेत्र एवं पाठ्य-वस्तु

 कक्षा 1
1. कहानी छात्रों को छोटी-छोटी कहानी सुनाना और उन्हें भी सुनाने के लिए प्रेरित करना ।
2. मौखिक भाव प्रकाशन छात्रों के घर के विषय में मौखिक वार्तालाप उनकी खिलौनों के विषय में बातचीत ।
3. पढ़ना वर्णमाला के सभी अक्षरों का ज्ञान स्वर व्यंजन का ज्ञान अक्षर को मिलाकर पढ़ना साधारण वाक्यों को पढ़ना सरल वाक्यों का अर्थ समझना
4. कविता पाठ बाल गीतों को याद करना और जोर-जोर से लाई के साथ पढ़ने का अभ्यास कविता पाठ में संकोच का त्याग
5. लिखना देवनागरी लिपि की सभी बड़ों को शुद्ध लिखना संयुक्ताक्षर लिखना छोटे वाक्य को देख देख कर लिखना ।

कक्षा 2 
1. अंकित भाव प्रकाशन - घर और विद्यालय के संबंध में बातचीत पशु एवं पक्षियों के विषय में साधारण वार्तालाप ।
2. कहानी - छोटी कहानी का सुनना और कहना ।
3. पढ़ना भक्तों को बिना रुके शब्दों का उच्चारण को शुद्ध करना और कविता पाठ पाठ्यपुस्तक की कुछ कविताओं को याद करना है उसका लाइव लिखना शुद्ध शुद्ध लिखने के लिए प्रत्येक का प्रारंभ ।

कक्षा 3
1. मौखिक भाव प्रकाशन - अपने अंध कपड़े अपनी कक्षा कृषि बागवानी और नित्य घटने वाली जीवन की घटनाओं से संबंधित विचारों को सरल भाषा में कह सकना ।
2. कहानियां कहना और दूसरे से सुनी कहानी को द्वारा लेना ।
3. पद्य - स्वीकृत पुस्तकों से उचित पदों को लाइव पूर्वक पढ़ना कुछ कविताएं कंठस्थ भी कर लेना पढ़ना पाठ्यपुस्तक को सही सही है स्पष्ट उच्चारण करते हुए पढ़ना शब्दों के अर्थ बताना पड़ेगा उस पर पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देना ।
4. लिखना - श्रुतलेख लिखना सरल वाक्यों को क्रम से लिखना सरल विषय संबंधित कुछ वाक्य लिखा सिखाई जा सकते हैं ।
5. उचित वार्तालाप तथा छोटे-छोटे विषयों पर अभिनय करना उद्देश्य विधेय छटना वाक्य की बनावट पर सदैव ध्यान दिया जा सकता है संज्ञा का ज्ञान हो जाए ।

कक्षा 4 
1. मौखिक भाव प्रकाशन - कक्षा 3 की भाँति । मुहावरों का प्रयोग हो ।
2. पढ़ना - भाव को स्पष्ट करने और समझने का ध्यान भी रखते हुए पाठ्यपुस्तक पढ़ना ।
3. लिखना - सुलेख श्रुतलेख पत्रों एवं कहानियों को लिखना खेती के बारे में विशेष ध्यान सहित वर्णन का ज्ञान होना ।
4. कविता पाठ - कक्षा 3 के भाँति ।
5. अभिनय साधारण वाद-विवाद में भाग लेना ।
6. व्याकरण - कक्षा 3 की भाँति । संज्ञा सर्वनाम क्रिया विशेषण का सामान्य ज्ञान होना ।
7. टिप्पणी - मौन वाचन की सहायता से छात्रों की शक्ति को बढ़ाने का अभ्यास करना ।

कक्षा 5 
1. मौखिक भाव प्रकाशन - कक्षा 3 और 4 के कार्यों का कुछ विस्तार के साथ सरल मुहावरे दार भाषा में अपने विचारों को स्पष्ट करने की योग्यता पैदा करना ।
2. पढ़ना - स्पष्ट उच्चारण शुद्धता पूर्वक शब्द समूह वाक्यों वाक्यांश ऊपर ध्यान रखती हुई पाठ्यपुस्तक से पढ़ना । भाव के अनुसार अभिनय एवं आरोह अवरोह पर ध्यान रखना ।
3. लिखना - सुलेख तथा श्रुतलेख लिखना । साधारण व व्यवसाय एवं कृषि संबंधी पत्र लिखना । गद्य-पद्य एवं वर्णनात्मक विषयों पर मौलिक विचार प्रकट करना ।
4. पद्य पाठ - सस्वर तथा अभिनय के साथ कविता पाठ करना ।
5. अभिनय - संभाषण उपयुक्त खेलों का उचित अभिनय ।
6. वार्तालाप - वाद-विवाद में भाग लेने योग्य छात्रों को बनाना ।
7. व्याकरण - संज्ञा सर्वनाम और विशेषण का कार्य सर्वनाम के वचन तथा लिंग । सरल वाक्यों का करता तथा कर्म ज्ञात करना एवं पूर्वाभ्यास ।

अध्याय 12 . त्रिभाषा सूत्र
प्राथमिक शिक्षा में त्रिभाषा सूत्र
उच्च शिक्षा में त्रिभाषा सूत्र
माध्यमिक शिक्षा में त्रिभाषा सूत्र

त्रिभाषा सूत्र का प्रवर्तन 
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात माध्यमिक शिक्षा में सुधार हेतु सन 1948 में डॉ ताराचंद की अध्यक्षता में एक समिति की नियुक्ति हुई । ताराचंद समिति ने माध्यमिक स्तर पर मातृभाषा के अतिरिक्त कुछ समय तक अंग्रेजी को अनिवार्य करने की संस्तुति की और अंग्रेजी की हट जाने पर संगी भाषा को अनिवार्य करने की बात कही । ताराचंद समिति ने माध्यमिक स्तर पर 2 भाषाओं के अध्ययन की सिफारिश की थी । एक मात्र भाषा दूसरी अंग्रेजी या संघीय भाषा ।

अक्टूबर 1952 में डॉक्टर लक्ष्मणस्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा आयोग की नियुक्ति हुई, जिसने जून 1953 में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया । आयोग ने भाषा के संबंध में निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले थे -

1. मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा को सामान्यतः संपूर्ण माध्यमिक शिक्षा का माध्यम होना चाहिए ।
2. पूर्व माध्यमिक स्तर पर प्रत्येक बालक को कम से कम 2 भाषाएं पढ़ाई जाए ।
3. उच्चतर माध्यमिक स्तर पर कम से कम 2 भाषाएं पढ़ाई जाए जिनमें से एक मात्र भाषा या क्षेत्रीय भाषा हो ।

त्रिभाषा सूत्र का विश्लेषण

1. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा तो होना ही है साथ में मातृभाषा का अनिवार्य अध्ययन भी अभीष्ट है ।
2. भारत बहु भाषा भाषी देश है अतः यहां की संपर्क भाषा मातृभाषा के अतिरिक्त हो सकती है ।
3. भारत की राष्ट्रभाषा राजभाषा या कम से कम संपर्क भाषा हिंदी ही हो सकती है ।
4.  अंग्रेजी विश्व भाषा है समृद्धि एवं उसके बिना भारत का काम नहीं चल सकता आता है इसका दिन पूरे देश में अनिवार्य होना चाहिए ।
5. इस दृष्टि से जिन लोगों की मातृभाषा हिंदी नहीं है उन्हें माध्यमिक स्तर पर कम से कम 3 भाषाएं पढ़ने होंगे ।
6. किंतु जिनकी मातृभाषा हिंदी है वह दो ही भाषाएं पड़ेंगे । ऐसा क्यों हो ? अतः हिंदी भाषी प्रदेश में एक अन्य भाषा को अनिवार्य कर दिया जाए, जिससे अहिन्दी भाषी प्रदेशों की दृष्टि से न्याय हो सके ।
7. यह अन्य भाषा संस्कृत ना हो ।
8. आधुनिक भारतीय भाषाओं में भी वरीयता तमिल भाषा को दी जाए ।

इन मूल धारणाओं में प्रथम तीन धारणाएँ केवल संवैधानिक एवं वैध ही नहीं हैं, किंतु शिक्षा शास्त्र की दृष्टि से भी उचित है । यह कहा जा सकता है कि राजभाषा को पूरे देश पर मत होती है कुछ राज्यों की इच्छा के अनुसार कुछ और समय देते जाइए और इस काल्पनिक आशा को पुनर्जीवित करती चाहिए कि वह स्वेच्छा से राजभाषा स्वीकार कर लेंगे । राष्ट्रभाषा हिंदी को अनिवार्य ना करिए किंतु अंग्रेजी अनिवार्य नहीं हो सकती । उपर्युक्त चौथी धारणा न केवल जनतंत्र का मजाक है वरुण दुराग्रह की चरम सीमा भी है अंग्रेजी को विश्व भाषा कैसे कहा जा सकता है संसार के छठे भाग में फैला हुआ विशाल देश रूस अंग्रेजी भाषी नहीं है लगभग 82 करोड की जनसंख्या वाला विशाल देश चीन अंग्रेजी भाषी नहीं है दक्षिण अमेरिका और अमेरिका में किस प्रदेश की भाषा है जर्मनी इटली फ्रांस स्पेन हालैंड iran-iraq वर्मा आदि देशों में सामान्य जनता की भाषा अंग्रेजी नहीं है तो फिर अंग्रेजी भाषा कैसे हुई कुछ लोग इसकी समृद्धा पर लट्टू है किंतु जब अंग्रेजी ब्रिटेन की राजभाषा बनी थी तो वह उस सीमा तक भी समृद्ध नहीं थी जिस सीमा तक हिंदी स्वतंत्रता के पूर्व ही हो चुकी थी अंग्रेजी राजभाषा पहले बनी उसमें राजकाज पहले होने लगा बाद में हुई किंतु अंग्रेजी भक्त भारत में उल्टा लगाते हैं ।

अध्याय 13 . हिंदी भाषा शिक्षण की समस्याएं और समाधान

सहित कौशलों का शिक्षण भाषाई कौशलों का विकास
भाषाई कौशलों का महत्व भाषा के कौशल भाषा कौशल भाषाई कौशल अपेक्षाएं

अध्याय 14 . हिंदी भाषा के शिक्षण सिद्धांत एवं शिक्षण सूत्र

हिंदी भाषा का शिक्षण सिद्धांत 
1. स्वाभाविकता का सिद्धांत - भाषा अर्जित संपत्ति तो है किंतु इसको सीखने की शक्ति प्रकृति दत्त है भाषा मनुष्य की स्वाभाविक सकती है ।
2. प्रयत्न का सिद्धांत - भाषा एक जटिल एवं स्वच्छ विषय है अतः इसे केवल स्वभाविक शक्ति द्वारा ही नहीं सीखा जा सकता इसके अध्ययन में प्रयत्न की आवश्यकता पड़ती है ।
3. लेखन कार्य से पूर्व मौखिक कार्य का सिद्धांत - सर्वप्रथम बालक बोलना सीखता है अतः भाषा शिक्षण में पहले मौके कार्य कराना चाहिए मौखिक कार्य सिखाने के बाद लिखना सिखाना चाहिए ।
4. बोलने और लिखने में सामंजस्य का सिद्धांत - बोलने और लिखने को नितांत प्रक्रियाएं नहीं समझना चाहिए और ना ही इन्हें पृथक क्रियाओं की भांति सिखाना चाहिए प्रारंभिक कक्षाओं में सुलेख के अभ्यास द्वारा इस नियम को व्यवस्थित कर सकते हैं ।
5. स्वतंत्रता का सिद्धांत - भाषा पर अधिकार करने के लिए बालक को स्वतंत्रता मिलनी चाहिए स्वतंत्र वातावरण में वह सीखने को उत्सुक होता है जिज्ञासा की तीव्रता स्वतंत्र वातावरण में होती है स्वतंत्र वातावरण में बालक खुलकर अपने अनुभव को प्रकट करता है ।
6. रुचि का सिद्धांत - पाठ को नीरज एवं भोजन बना देने से छात्र और जाते हैं अदा शिक्षक को इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि जिस बात में छात्रों की रुचि होती है उसकी ओर आकृष्ट होते हैं और जिसकी और रुचि होती है उससे भी दूर भागते हैं ।
7. वैयक्तिक भिन्नता का सिद्धांत - शिक्षा शास्त्र में आज यह मांगते बन गया है कि एक बालक अपनी योग्यता रुचि प्रति अभिवृत्ति शारीरिक क्षमता संवेगात्मक का आदमी दूसरे बालक से भिन्न होता है अतः इस सिद्धांत का पालन करते हुए प्रत्येक बालक की भाषा ही का निदान करना चाहिए ।
8. बालकेंद्रिता सिद्धांत - या ध्यान रहे कि शिक्षा का केंद्र बालक है अतः बालक को इस योग्य बनाना है कि भाषाई कौशलों पर अधिकार कर सके ।
9. प्रारंभिक अवस्था का महत्व - और बाल्यावस्था भाषा सीखने की दृष्टि से बड़ी महत्वपूर्ण है जो बालक बड़े होते हैं उनकी भाषा सीखने की शक्ति मंद होती जाती है आरंभिक अवस्था में शक्ति बहुत सक्रिय रहती है ।
10. क्रियाशीलता का सिद्धांत - कक्षा में यदि बालकों को निष्क्रिय बना दिया जाए भाषा सीखने को तत्पर नहीं होते भाषा वित्त ही सीख पाते हैं जब फ्री हो ।
11. चयन का सिद्धांत - भाषा शिक्षा के अनेक उद्देश्य है वह देशों के आधार पर व्यवहार में परिवर्तन भी अनेक प्रकार के हैं इनमें से सभी उद्देश्य एवं व्यवहार परिवर्तनों को एक साथ लेकर शिक्षा नहीं दी जा सकती ।
12. विभाजन का सिद्धांत - उद्देश्य निश्चित करना ही पर्याप्त नहीं है जब किसी देश या व्यवहार परिवर्तन का चुनाव कर लिया गया तो यह भी आवश्यक है की विषय सामग्री को उद्देश्य के आधार पर विभाजित कर लिया जाए ।
13. अनुकरण का सिद्धांत - भाषा शिक्षण में अनुकरण का विशेष महत्व है शिशु अत्यधिक अनुकरण फील होता है अनुकरण की व्यवस्था में ही नहीं किशोरावस्था में भी होती है आगे चलकर कम हो जाती है ।
14. अभ्यास का सिद्धांत - महाकवि वृंद का एक दोहा है - "रसरी आवत जात ते, सिल पर होत निशान । करत करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान ।।" थार्नडाइक ने अभ्यास के नियम को सीखने का एक नियम शिकार किया है । भाषा एक कौशल है और इसका विकास एक अभ्यास पर ही निर्भर है ।
15. स्वयं संशोधन का सिद्धांत - भाषा सीखने में बालक स्वयं संशोधन करता चलता है शिशु यदि रोटी को लोधी करता है और लोग रहते हैं तो वह खुद रोटी कहना सीखता है अपनी दोनों शब्दों में वाक्यों की त्रुटियों को बालक संशोधित कर लेता है ।
16. बहुमुखी प्रयास का सिद्धांत - भाषा शिक्षण के लिए अकेले यदि भाषा शिक्षक ही प्रयत्न करता है तो वह सफल नहीं हो पाता 1 घंटे में वह बालकों के समक्ष भाषा का शुद्ध प्रयोग सिखाएं और इतिहास भूगोल विज्ञान अर्थशास्त्र नागरिक शास्त्र आदि के शेष 7 घंटों में बालक भाषा का शब्द प्रयोग सीखे तो भाषा पर अधिकार संभव नहीं होगा ।

हिंदी भाषा शिक्षण सूत्र 
मूर्त से अमूर्त की ओर - इसे स्थूल से सूक्ष्म की ओर भी कहा जाता है घोड़ा देखकर घोड़े का प्रत्यय बनाया जाएगा मॉडल चार्ट आदि के सहारे किसी वस्तु का वर्णन करना सरल होता है ।
ज्ञात से अज्ञात की ओर - जो बात छात्र जानता है उसे आधार बनाकर अज्ञात वस्तुओं की जानकारी देना ।
सरल से कठिन की ओर - सरल शब्दों वाक्यांशों मुहावरों गीतों आदि को पहले पढ़ाना चाहिए तत्पश्चात कठिन विषयों को लिया जाए ।
पूर्ण से अंश की ओर - इस शिक्षण सूत्र के आधार पर कहा जा सकता है कि पहले वाक्य शब्द और तब वर्ल्ड की शिक्षा दी जाए पहले संपूर्ण कविता का वाचन हो तत्पश्चात उसके खंडवा ।
प्रकृति का अनुसरण - बालकों की प्रकृति के अनुसार शिक्षा दी जाए और प्राकृतिक वातावरण में शिक्षा हो ।
विश्लेषण से संश्लेषण की ओर - एक बार शब्द वाक्य भव्य अर्थ का विश्लेषण करके उसे छोड़ दिया जाए बाद में उनका संश्लेषण करके स्पष्ट सामान्य विचार बनाने की ओर छात्रों को किया जाए ।
मनोवैज्ञानिक से तार्किक की ओर - बढ़ाया जाए छात्रों की योग्यता के अनुकूल हो तत्पश्चात विषय सामग्री के तार्किक ज्ञान दिया जाए ।
विशेष से सामान्य की ओर - बालकों के वातावरण की बातों से चलकर अंतरराष्ट्रीय तत्व तक जाया जाए पहले विशेष पदार्थों को प्रस्तुत किया जाए तत्पश्चात सामान निष्कर्ष पर पहुंचा जाए ।
अनिश्चित से निश्चित की ओर - देखी हुई वस्तु के विषय में बालक अपनी सुविधा और आवश्यकता के अनुसार कुछ अनिश्चित विचार रखता है इन्हीं अनिश्चित विचारों के आधार पर निश्चित एवं स्पष्ट विचार बनाए जाने चाहिए ।

हेराल्ड पामर का वर्णित सिद्धांत 
प्रसिद्ध भाषा शास्त्री हेराल्ड पामर ने भाषा अध्ययन नामक पुस्तक में कतिपय समान सिद्धांतों की चर्चा की है वह निम्नलिखित है -

1. पहले शिक्षक छात्र की पूर्व आयोजित भाषा शब्द से प्रसिद्ध हो जाए और सुनने समझने सोचने व बोलने की शक्ति के प्रशिक्षक द्वारा बालों को भाषा सीखने की ओर उन्मुख किया जाए ।
2. पूर्व अर्जित आदतों का उपयोग करते हुए नई एवं सही आदतों का निर्माण किया जाए ।
3. बुरी आदतों से बचने के लिए शुद्ध एवं निर्दोष भाषा कार्य कराया जाए ।
4. भाषा कार्यों को क्रमबद्ध बनाया जाए जिससे छात्रों की उत्तरोत्तर प्रगति होती जाए ।
5. भाषा के विविध अंगों और क्रियाओं में संतुलन का ध्यान रखते हुए अनुपात ठीक रखना ।
6. कंठस्थ करना ।
7. अमूर्त भाषा सामग्री को मूर्त पदार्थों के सहारे प्रस्तुत करना ।
8. बालक की रुचि को बनाए रखना और प्रस्तुतीकरण को रोचक बनाना ।
9. बहुमुखी प्रयास द्वारा भाषा शिक्षण का प्रयत्न करना ।

पामर द्वारा वर्णित सिद्धांत भाषा शिक्षण के मान्य सिद्धांत हो चुके हैं ।

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पाठ्यक्रम का अर्थ
पाठ्यक्रम शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के पूरे रे शब्द से हुई कोरे रे का अर्थ है दौड़ का मैदान । पाठ्यक्रम बालक के लिए उस दौड़ के मैदान के समकक्ष है, जहाँ बालक शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु दौड़ में भाग लेता है ।

पाठ्यक्रम की परिभाषाएँ
टी०पी० नन के अनुसार, "पाठ्यक्रम को क्रियाओं के उन विभिन्न रूपों में देखा जाना चाहिए, जो मानव आत्मा के भव्य प्रदर्शन है और जिनका विशाल संसार के सबसे अधिक और सबसे स्थाई महत्व ।

कनिंघम के अनुसार, "कलाकार (शिक्षक) के हाथ में यह (पाठ्यक्रम) एक साधन है, जिससे वह पदार्थ को अपने आदर्श के अनुसार अपने स्टूडियो (विद्यालय) में चित्रित कर सके ।

मुनरो के अनुसार, "पाठ्यक्रम में वे सब क्रियाएँ सम्मिलित हैं, जिनका हम शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करने हेतु विद्यालय में उपयोग करते हैं ।

पाठ्यक्रम के उद्देश्य
एक अच्छे पाठ्यक्रम के निम्नलिखित उद्देश्य हैं -

(1) सांस्कृतिक धरोहर (2) ज्ञान और कुशलता (3) चरित्र (4) स्वास्थ्य (5) नागरिकता (6) भावनात्मक विकास (7) स्पष्ट चिंतन शक्ति का विकास (8) सामाजिक भावना का विकास (9) सौंदर्य अनुभूति एवं अभिव्यक्ति

पाठ्यक्रम के आधार

दार्शनिक आधार
पाठ्यक्रम का एक मुख्य आधार दर्शन है । पाठ्यक्रम का निर्माण शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है । शिक्षा के उद्देश्य हमें दर्शन से प्राप्त होते हैं ।

आदर्शवाद
यह विचारधारा शाश्वत मूल्यों तथा आदर्शों पर बल देती है । इसलिए यह पाठ्यक्रम का मुख्य आधार मानव के विचारों तथा आदर्शों को मानता है । इस कारण आदर्शवाद पाठ्यक्रम में साहित्य, कला, इतिहास, भाषा आदि को प्रमुख स्थान प्रदान करता है ।

प्रकृतिवाद
यह विचारधारा बालक की वैयक्तिगतता पर बल देती है । इसके अनुसार बालक की व्यक्तिगत आके स्वतंत्र विकास को शिक्षा का ध्येय माना गया है । प्रकृतिवादी पाठ्यक्रम में व्यायाम, खेलकूद, तैरना, भूगोल, प्राकृतिक विज्ञान आदि को स्थान प्रदान किया गया है ।

यथार्थवाद
इस विचारधारा के द्वारा जीवन की व्यावहारिकता पर बल दिया जाता है । इस दृष्टि से पाठ्यक्रम में भाषा, इतिहास, साहित्य, समाजशास्त्र, भूगोल, नीतिशास्त्र आदि को स्थान प्रदान किया जाता है ।

प्रयोजनवाद
यह विचारधारा बालक को शिक्षा का केंद्र बिंदु मानने के साथ-साथ उपयोगिता के सिद्धांत पर भी बल देती है, जिससे बालक अपने भावी जीवन में सफलता पूर्वक व्यवस्थित हो सके । इस कारण व पाठ्यक्रम में भाषा गणित कास्ट कढ़ाई बुनाई दुकानदारी सामाजिक क्रिया व्यवसाय स्थान प्रदान करते हैं ।

सामाजिक आधार
इस आधार के अनुसार पाठ्यक्रम में उन विषयों एवं क्रियाओं को स्थान प्रदान किया जाता है जो छात्र में सामाजिकता की भावना का विकास करने में सहायता प्रदान करती हैं । इस दृष्टि से पाठ्यक्रम में भाषा, इतिहास, साहित्य, समाजशास्त्र, भूगोल में स्थान प्रदान किया जाता है ।

मनोवैज्ञानिक आधार
इस आधार के अनुसार पाठ्यक्रम का निर्धारण बालक की सभा व्यक्तियों, आवश्यकताओं, क्षमताओं, योग्यताओं आदि के अनुसार होता है । दूसरे शब्दों में, यह बालक को केंद्र मानकर पाठ्यक्रम निर्धारित करता है ।

वैज्ञानिक आधार
इस आधार के अनुसार पाठ्यक्रम में वैज्ञानिक विषयों को अधिक महत्व प्रदान किया गया है । दूसरे शब्दों में, इस आधार ने शिक्षा को विज्ञान केंद्रित पाठ्यक्रम प्रदान किया है ।

*****

पाठ्यक्रम निर्माण के सिद्धांत 
पाठ्यक्रम निर्माण हेतु निम्नलिखित प्रमुख सिद्धांतों को ध्यान में रखना चाहिए ।

उपयोगिता का सिद्धांत 
पाठ्यक्रम में जिन विषयों को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाए वह बालक की भावी जीवन हेतु उपयोगी होने चाहिए ।

रचनात्मक कार्य का सिद्धांत 
पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो बालकों को रचनात्मक शक्ति के विकास हेतु प्रेरित करें ।

जीवन से संबंधित होने का सिद्धांत 
पाठ्यक्रम में नेट से पैसे होने चाहिए जो छात्रों को जीवन के समीप ले जाए उसमें उन सभी क्रियाओं को सम्मिलित किया जाना चाहिए जो प्रत्येक बालक के जीवन की विभिन्न पक्षों पर आधारित हो ।

खेल व कार्य की क्रियाओं के अंतर्संबंध का सिद्धांत
पाठ्यक्रम का निर्माण करते समय खेल की गतिविधियों को भी उस में सम्मिलित करना चाहिए, जिससे कि पाठ्यक्रम रुचिपूर्ण हो सके ।

अनुभवों की पूर्णता का सिद्धांत 
पाठ्यक्रम के अंतर्गत अनुभवों को सम्मिलित करना चाहिए जो बालक समाज में रहकर के माध्यम से प्राप्त करता है ।

क्रिया का सिद्धांत 
पाठ्यक्रम इस प्रकार का होना चाहिए जो बालक को करने हेतु प्रेरित करें । इसमें बालक के मस्तिष्क हृदय आदि को क्रियाशील बनाया जाना चाहिए, साथ ही साथ 'करके सीखने' पर बल दिया जाना चाहिए ।

श्रेष्ठ आचरण के आदर्शों की प्राप्ति का सिद्धांत 
पाठ्यक्रम में उन विषयों एवं क्रियाओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाना चाहिए जो बालकों को अच्छे चरित्र का प्रशिक्षण दे सकें । शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य छात्रों को चरित्रवान बनाना है और शिक्षा अपने इस उद्देश्य की पूर्ति पाठ्यक्रम के माध्यम से करती है ।

सह संबंध का सिद्धांत 
पाठ्यक्रम के विषयों का अध्ययन विभिन्न अध्यापकों के द्वारा उतनी क्षमता से कराया जाना चाहिए कि एक विषय से दूसरे विषय का संबंध किया जा सके ।

वैयक्तिक भिन्नता का सिद्धांत 
शिक्षा ग्रहण करने आने वाला बालक अपने निजी इच्छा की पूर्ति पाठ्यक्रम के द्वारा करता है । अतः बालक की 'स्व' संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति शिक्षा द्वारा होनी चाहिए ।

समय का सिद्धांत 
दौरान किसी भी विषय पर या स्तर के पाठ्यक्रम का निर्माण करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि इसे पढ़ाने हेतु कितना समय है ।

हिंदी भाषा शिक्षण में पाठ्य पुस्तक का महत्व 
Question.............. 2018

हिंदी भाषा शिक्षण में पाठ्य पुस्तकें महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं । पाठ्य पुस्तकों की आवश्यकता के विषय में निम्नलिखित बातें कही जा सकती हैं -
1. पाठ्य पुस्तकों में अनेक प्रकार की सूचनाएं एक ही स्थान पर मिल जाती है । अतः सूचनाओं के संग्रह के लिए इनकी आवश्यकता है ।
2. इनके प्रयोग से पाठ को पढ़ने और पढ़ाने में सहायता मिलती है ।
3. पठित पाठ को पुनः स्मरण करने कराने में यह सफल साधन है ।
4. इनसे ज्ञानोपार्जन में सहायता प्राप्त होती है ।
5. अध्यापक अपनी सुविधानुसार बालकों की योग्यता का ध्यान रखते हुए शिक्षा दे सके, इसके लिए पाठ पुस्तकों की आवश्यकता है ।
6. छात्रों को गृह कार्य देने में इनसे सुविधा होती है ।
7. उत्तम पाठ्य पुस्तकों से पाठ्यक्रम निर्धारण में भी सहायता मिलती है ।
8. यह वह साधन हैं, जो भाषा शिक्षण के विशिष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक बनता है ।
9. पाठ्य पुस्तकों से छात्रों के हृदय में पढ़ने की प्रेरणा जागृत की जाती है ।
10. भाषा पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करने के लिए पाठ्य पुस्तकों का होना अति आवश्यक है । इनकी आवश्यकता अध्यापक और छात्र दोनों को है ।
11. संपूर्ण कक्षा को एक साथ पढ़ाने में पाठ्य पुस्तकें बड़ी उपयोगी होती है । इससे समय और शक्ति का अपव्यय नहीं होता है ।
12. पाठ्य पुस्तकें साधन है साध्य नहीं ।

हिंदी भाषा के शिक्षण में सहायक सामग्री की आवश्यकता
Question.............. 2018

भाषा शिक्षण में प्रयुक्त सहायक सामग्री अध्यापक के लिए अधिगम और बालकों के लिए अद्यतन सामग्री बन जाती है । अतः सहायक सामग्री की आवश्यकता का उल्लेख निम्न बिंदुओं के माध्यम से किया जा सकता है -
1. इन सामग्री से बालक की ज्ञान इंद्रियों को क्रियाशील रखने में सहायता मिलती है क्रियाशील ज्ञानेंद्रियां बालक की सीखने की क्षमता में वृद्धि करती है ।
2. इन सामग्रियों के प्रयोग से बालक निष्क्रिय होने से बच जाता है । यदि इंद्रियों की क्रियाशील रखा जाए तो बालक को अपना दृष्टिकोण विकसित करने में सहायता मिलती है और उसमें परिपक्वता का विकास होता है ।
3. सहायक सामग्री बालकों का ध्यान आकर्षित करके ज्ञान को के रूप में प्रस्तुत करते हैं । इससे बालक सीखने के लिए प्रेरित होता है । सीखने के लिए उत्सुकता बढ़ती है । बालक पाठ को ध्यानपूर्वक सुनते हैं और आनंद लेते हैं ।
4. सहायक सामग्री के प्रयोग से बालकों की बोधात्मक था और अवधान केंद्र में सकारात्मक वृद्धि होती है, जिससे अधिगम में सहायता मिलती है ।
5. दुरूह प्रयोजनों को सहायक सामग्री के माध्यम से आसानी से समझाया जा सकता है क्योंकि बालक जो सुनते हैं उसे अपनी आंखों से देखते भी हैं ।
6. सहायक सामग्री के प्रयोग से बालकों की रटने की क्रिया को कम किया जा सकता है ।
7. मानसमंद बालकों के लिए सहायक सामग्री वरदान है । सामान्य बालक जिन प्रकरणों को आसानी से समझ लेते हैं, मानसमंद बच्चे नहीं समझ पाते, परंतु यदि सहायक सामग्री के प्रयोग से उन्हें समझाया जाता है, तो उन्हें लाभ मिलता है ।
8. अध्यापक प्रभावकारी ढंग से शिक्षण करने में सफलता प्राप्त करने के लिए सहायक सामग्री का प्रयोग करता है । सहायक सामग्री के प्रयोग से अध्यापक अपने शिक्षण कौशलों का परिचालन सफलतापूर्वक कर लेता है । जैसे प्रश्न पूछना पाठ्यवस्तु को प्रस्तुत करना उत्तर देना प्रतिकार करना प्रतिपुष्टि और मूल्यांकन करना आदि ।
9. सहायक सामग्री पुनर्बलन और प्रतिपुष्टि प्रदान कर शिक्षण अधिगम प्रक्रिया को अपने उद्देश्यों में सफल बनाते हैं ।
10. सहायक सामग्री बालकों की कल्पना शक्ति का विकास करते हैं ।
11. सहायक सामग्री के उपयोग से बालकों को जो सिखाया जाता है वह तुरंत अपने मस्तिष्क में धारण कर लेते हैं और आवश्यकतानुसार प्रत्यास्मरण भी कर लेते हैं ।

हिंदी शिक्षण में शिक्षक की भूमिका
Question.............. 2018

शिक्षा त्रिदेवी प्रक्रिया है एक ध्रुव में पाठ्यक्रम दूसरे ग्रुप में शिक्षार्थी होता है तथा तीसरे ध्रुव में शिक्षक शिक्षार्थी शिक्षक के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उसके आचरण आदर्श तथा व्यक्तित्व के विभिन्न गुणों का अनुकरण करता है इस प्रकार आदान-प्रदान क्रिया द्वारा शिक्षा का कार्य चलता रहता है शिक्षा में शिक्षक तथा शिक्षण थी दोनों का महत्वपूर्ण स्थान है प्राचीन काल में शिक्षक को शिक्षार्थी की अपेक्षा अधिक महत्व दिया जाता था प्राचीन भारत वर्ष की गुरुकुल प्रणाली का ही उदाहरण ले लीजिए उस समय गुरु का आदर किया जाता था तथा गुरु के आदर्शों को माना जाता था संभवत आज के समाज में शिक्षक का बहुत सम्मान नहीं है जो प्राचीन युग में था इस युग में शिक्षक का सम्मान इसलिए कम हो गया है क्योंकि शिक्षक अपने उत्तरदायित्व को भूल गए हैं उन में उन गुणों का अभाव होता जा रहा है जो कि एक शिक्षक में होने चाहिए यद्यपि वर्तमान युग में शिक्षार्थी को शिक्षा का केंद्र माना जाता है परंतु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि उसकी शिक्षा में शिक्षक का कोई महत्व ही नहीं है मनोवैज्ञानिकों तथा शिक्षा शास्त्रियों का मत है कि बालक की शिक्षा उचित उसकी रुचि योग्यता तथा अभी रुचि के अनुसार होनी चाहिए इसलिए शिक्षक का उत्तरदायित्व और भी बढ़ गया है शिक्षक को बालक की प्रकृति का ज्ञान होना चाहिए आवश्यक हो गया है उसे अपने व्यवसाय में भी दक्ष होने की आवश्यकता है ताकि वह बालकों को मनोवैज्ञानिक ढंग से शिक्षा दे सके कुछ लोगों को यह भ्रम है कि इस मनोवैज्ञानिक युग में बालक अपनी शिक्षा के लिए स्वतंत्र होता है इसलिए शिक्षक के ऊपर बालक की शिक्षा का विशेष उत्तरदायित्व नहीं रह जाता वास्तव में यह उन लोगों का गलत विचार है इस मनोवैज्ञानिक युग में शिक्षक को ना केवल शिक्षक ही होना होता है परंतु एक मनोवैज्ञानिक भी होना होता है उसे निष्क्रिय निरीक्षक ना होकर एक ऐसे सक्रिय निरीक्षक की भांति कार्य करना आवश्यक है जो बालक के कार्य में अनावश्यक हस्तक्षेप ना करें, परंतु आवश्यकता पड़ने पर उसकी आवश्यक सहायता के लिए तत्पर रहे । उसे अपने व्यक्तित्व को इतना प्रभावशाली बनाने की आवश्यकता है, ताकि बालक उससे प्रभावित होकर उसका अनुकरण करने लगे और निर्देशित हो सके संक्षेप में हम यही कहेंगे कि वर्तमान युग में शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षा का महत्व कम नहीं हुआ है । हाँ उसका उत्तरदायित्व बढ़ गया है । युग की पुकार के अनुसार शिक्षक के अनेक गुणों का होना आवश्यक हो गया है ।

कविता शिक्षण की विधियाँ

निश्चित उद्देश्यों के आधार पर कविता शिक्षण की निम्नलिखित प्रणालियां द्रष्टव्य है -
1. गीत तथा अभिनय प्रणाली :- यह प्रणाली प्रारंभिक कक्षाओं में बाल गीतों के लिए प्रयोग में लाई जाती है कुछ गीतों के अर्थ का कोई महत्व नहीं होता है केवल बालकों को ससुर बनाना ताल में लाना और संगीत से परिचय कराना है इनका उद्देश्य है ।
अभिनय प्रधान पदों में बालक उचित अंग संचालन के द्वारा भाव व्यक्त करना भी सीख जाता है ।
2. अर्थबोध प्रणाली :- इस प्रणाली में शिक्षक स्वयं कविता का अर्थ बताता चलता है बालक की रूचि तथा रस अनुभूति का कोई ध्यान नहीं रखा जाता अतः यह प्रणाली दूषित और त्याग जी है ।
3. व्याख्या प्रणाली :- इस प्रणाली में अध्यापक एक-एक पद लेकर उसका अर्थ करता हुआ कवि का दार्शनिक मत प्रवृत्ति उसकी रचना शैली परिस्थिति कविता की भाषा अलंकार भाव रस आदि की व्याख्या करके पद का अर्थ स्पष्ट करता चलता है । यदि उसमें कोई अंतर कथा होती है तो उसका भी ज्ञान करा देता है । इस प्रणाली का प्रयोग केवल माध्यमिक तथा उच्च कक्षाओं में ही होना चाहिए ।
4. खंडा प्रणाली इसको प्रश्नोत्तर प्रणाली भी कहते हैं यह प्रणाली उन पदों की पढ़ाने के काम आती है जिनमें विशेषण ओं की भरमार हो भाव की भीड़ हो घटनाओं की घटा हो और 11 बात का अर्थ स्पष्ट किए बिना अस्पष्टता नहीं आती हो । इस प्रणाली का प्रयोग केवल वर्णनात्मक तथा ऐतिहासिक गधों के पढ़ाने में ही किया जाता है ।
5. व्यास प्रणाली :- यह मुख्यतः उच्च श्रेणी की भाव प्रधान कविताओं के पढ़ाने के लिए प्रयोग की जाती है । इस प्रणाली के पद में पद को भाषा और भाव दोनों की दृष्टि से परखा जाता है । भाव के स्पष्टीकरण के लिए अनेक वर्णों दृष्टांत व्यक्तियों तथा कथाओं का प्रयोग कर अध्यापक व्याख्या करता है । भाषा की दृष्टि से विचार करते समय अध्यापक एक-एक शब्द उसकी उपादेयता शब्द बलदोस तथा वाक्य विन्यास का स्पष्टीकरण करता चलता है । अध्यापक को विषय का महान ज्ञान अपेक्षित है । बालकों की रूचि उत्साह तथा उल्लास को बनाए रखने के लिए अध्यापक को कुशल अभिनेता भी होना चाहिए । भावात्मक कविताओं में इसी प्रणाली का प्रयोग उत्तम माना जाता है ।
6. तुलनात्मक प्रणाली :- इस प्रणाली में सब भाषा कवि भिंड भाषा कवि की तुलना तथा भाव तुलना द्वारा शाम में और असद दे दोनों का विवेचन किया जाता है । साथ ही एक ही कभी अपने बनाए हुए विभिन्न कवियों में एक ही बात कई भाव या उद्देश्यों से कहता है । ऐसे भाव या वर्णों को तुलनात्मक दृष्टि से पढ़ना चाहिए । इससे विद्यार्थियों में विवेचन तथा तर्क शक्ति का विकास होता है । ज्ञान का विस्तार होता है कवि के उद्देश्यों कविता के विभिन्न स्वरूपों तथा कभी शैली का भी परिज्ञान हो जाता है ।
7. समीक्षा प्रणाली :- इस प्रणाली द्वारा अध्यापक प्रश्नोत्तर विधि का आश्रय लेकर कवि की समीक्षा करता है तथा विद्यार्थियों को आलोचना के सिद्धांत बताकर सहायक पुस्तकों की सहायता से समस्त रूप से एक कवि की रचनाएं तथा अथवा कविताओं की समीक्षा करने को कहता है । अतः यह प्रणाली उच्च कक्षाओं के लिए उपयोगी हो सकती है

हिंदी भाषा के शिक्षण में शुद्ध उच्चारण के प्रशिक्षण हेतु किन युक्तियों का प्रयोग होता है ? विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिए ।

उच्चारण सुधार के उपाय 
यदि अध्यापक निम्नलिखित उपाय कर लें तो छात्रों के उच्चारण सुधार कर सकते हैं -
(1) छात्रों में उच्चारण करने की आकांक्षा जागृत की जाए उन्हें परिनिष्ठित उच्चारण करने के लिए प्रेरित किया जाए ।
(2) अध्यापक अपने उच्चारण भी सुधार लें । उच्च शिक्षा में अनुकरण का विशेष महत्व है ।
(3) साधारणतया अशुद्ध उच्चारण की जाने वाली ध्वनियों की सूची बनाकर प्रत्येक वर्ष के आरंभ में उच्चारण अभ्यास कराया लिया जाया करें और बाद में वाचन तथा भाषण के समय ध्यानाकर्षण तथा अभ्यास चलता रहे
(4) उच्चारण प्रतियोगिताओं का आयोजन करके पुरस्कार की व्यवस्था की जाए । इससे छात्र उच्चारण सुधारने का प्रयास करेंगे ।
(5) आवश्यकता हो तो चिकित्सकों की सहायता ली जाए । शारीरिक विकृतियों की दशा में तो चिकित्सकों का परामर्श अनिवार्य है ।
(6) उच्चारण के कतिपय नियमों का छात्रों को ज्ञान करा देना चाहिए ।

उच्चारण के नियम
1. हिंदी वर्णमाला की जानकारी होनी चाहिए हिंदी वर्णमाला में स्वर हैं । और और बाद की विकसित ध्वनियां है । और हिंदी में दिल की दुनिया स्वरों का उच्चारण किसी अन्य वर्ड की सहायता के बिना होता है । स्वरों के अतिरिक्त व्यंजन भी हैं व्यंजनों का उच्चारण स्वर की सहायता से होता है ।
2. ध्वनियों के उच्चारण स्थान का ज्ञान उच्चारण सीखने के में सहायक होता है । स्थान का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है उच्चारण स्थान स्वर व्यंजन कंठ को खो गो घो तालु यश मुर्दा ड ड ड ड ड दंत ऊपर के दांतो के मसूड़े नारा
3. उच्चारण की दृष्टि से 500 वर्गों के अंतिम अक्षर अनुनासिक हैं । अनुनासिक वर्णों के उच्चारण में नासिका का भी प्रयोग किया जाता है ।
(4) य र ल व आदेश्वर और आधी व्यंजन के रूप में उच्चरित होते हैं इन्हें अंतस्थ वर्ण कहते हैं ।
(5) ष को हिंदी में श के रूप में पढ़ा जाता है, न कि ख के रूप में । जैसे - वर्षा विशेष सस्ता दी ।
(6) ज्ञ को ग्यँ के रूप में पढ़ा जाता है । जैसे ज्ञान, मनोविज्ञान आदि ।
(7) क्ष को क्छ के रूप में पढ़ते हैं ना कि छ के रूप में । जैसे लक्षण छतरी रक्षा आदि ।
(8) ऋ को रि के रूप में बोला जाता है । जैसे ऋषि, ऋतु आदि ।
(9) ञ तत्सम शब्दों के बीच में आता है, किंतु इसका उच्चारण अब न् के समान होता है । जैसे - चंचल, अंजलि, मंजन आदि ।
 (10) ड़ भी तत्सम शब्दों के बीच में आता है और इसका उच्चारण प्रायः अनुस्वार के समान होता है । जैसे - गंगा, रंगा, आदि । वांग में प्रमुख पौधे से कुछ शब्द तत्सम शब्दों में आना ध्वनि सुनाई भी देती है ।
(11) दीर्घ स्वरों के साथ अनुस्वार का उच्चारण प्रायः चंद्रबिंदु या अर्ध अनुस्वार के समान होता है । हैं, मैं, नहीं आदि ।
(12) हिंदी अकारात्मक शब्दों के अंतिम व्यंजन का उच्चारण राजा हलंत करते हैं, यद्यपि लिखते स्वर हैं । जैसे - प्यार, राम, दिन, रात, कल आदि ।
(13)  अकारांत चार अक्षर के शब्द का तीसरा अकारांत वर्ड भी हलंत के समान प्रायः उचित होता है । जैसे - निर्बलता सरसता निकलना आदि ।
(14) अकारांत तीन अक्षर के शब्दों में बीच का अकारांत वर्णन भी हलंत के समान पर आया बोला जाता है । जैसे - जनता, करना, डरना आदि ।
(15) एक अक्षर शब्दों में बलाघात उसी शब्द पर होता है जैसे जहां आदि ।


हिंदी शिक्षण के पुराने प्रश्न पत्र
Question.............. 2018

लघु उत्तरीय प्रश्न
1.शिक्षा में मातृभाषा का महत्व ।
2. हिंदी भाषा शिक्षण की विधियों पर प्रकाश डालिए ।
3. हिंदी भाषा शिक्षण में पाठ्य पुस्तक का महत्व ।
4. हिंदी भाषा के शिक्षण में पाठ योजना का महत्व ।
5. हिंदी शिक्षण में शिक्षक की भूमिका ।
6. हिंदी भाषा में गद्य और पद्य शिक्षण का अंतर को स्पष्ट कीजिए ।
7. हिंदी उच्चारण के शिक्षण में कंप्यूटर की उपयोगिता ।
8. हिंदी शिक्षण में कौशलपरक उद्देश्य का संक्षिप्त उल्लेख कीजिए ।
9. आदर्श वाचन व सस्वर वाचन के महत्व को स्पष्ट कीजिए
10. हिंदी भाषा के शिक्षण में सहायक सामग्री की आवश्यकता

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न 
2. हिंदी भाषा के शिक्षण में शुद्ध उच्चारण के प्रशिक्षण हेतु किन युक्तियों का प्रयोग होता है ? विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिए ।
3. हिंदी भाषा के शिक्षण में विशिष्ट उद्देश्य से आप क्या समझते हैं ? समान उद्देश्यों से यह किस प्रकार भिन्न है ? उदाहरण द्वारा स्पष्ट कीजिए ।
4. राष्ट्रीय एकता के विकास में हिंदी की भूमिका पर प्रकाश डालिए ।
5. भाषा विज्ञान से आप क्या समझते हैं ? इसके अंतर्गत आने वाले विज्ञान क्या है ? प्रत्येक का संक्षिप्त वर्णन कीजिए ।
6. हिंदी गद्य शिक्षण के सोपानों को ध्यान में रखते हुए आठवीं कक्षा हेतु (35 मिनट शिक्षण हेतु) एक पाठ योजना प्रस्तुत कीजिए ।

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 सूक्ष्म शिक्षण 

सूक्ष्म शिक्षण का सर्वप्रथम विकास बीसवीं शताब्दी की अमूल्य देन है । इसका सर्वप्रथम उद्गम ऐलन स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमेरिका से 1961 में प्रारंभ हुआ । सूक्ष्म शिक्षण शिक्षक प्रशिक्षण में शिक्षण अभ्यास की एक नूतन प्रविधि है, जिसके माध्यम से छात्र अध्यापकों का छात्र अध्यापकों को शिक्षण अभ्यास के लिए कैसे खरीदें प्रस्तुत की जाती है, जो कि कक्षाओं की सामान्य कठिनाइयों को कम करती है । जिससे कि छात्र अध्यापक और छात्र अध्यापिका अपने शिक्षण व्यवहार कार्य में परिवर्तन लाने की पुष्टि करता है ।

भारतवर्ष में सर्वप्रथम सूक्ष्म शिक्षण का प्रयोग सन 1967 में डीडी तिवारी ने किया । तथा क्षेत्र में प्रथम प्रथम वैज्ञानिक जानकारी दी मद्रास भट्टाचार्य कोलकाता गुप्ता ।

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