कबीर की साखी



 कबीर की साखी 

महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी द्वारा निर्धारित स्नातक प्रथम वर्ष के छात्रों हेतु हिंदी विषय के प्रथम प्रश्न पत्र के रूप में मध्ययुगीन काव्य नामक पुस्तक में प्रथम अध्याय  के अंतर्गत संत कबीरदास की 22 साखियां हैं, जिनका अर्थ सहित विवरण निम्नलिखित है -

{1}

सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार ।
लोचन अनंत उघारिया, अनंत दिखावनहार  ।।

अर्थ -
कबीरदास जी कहते हैं कि सतगुरु की महिमा अनंत है । उन्होंने मुझ पर अनंत उपकार किया है । क्योंकि उन्होंने मेरी अनंत आंखें खोल दी । जिससे मुझे अनंत स्वरूप परमात्मा का दर्शन हुआ ।

{2}

सतगुरु सांचा सूरिवां, शब्द जो बाह्या एक  ।
लागत ही भै मिल गया, पंड्या कलेजे छेक ।।

अर्थ -
कबीरदास जी कहते हैं कि सद्गुरु सच्चा शूरवीर है, जिसने केवल एक ही शब्द का प्रहार किया; जो मेरे हृदय में लग गया और कलेजे में छेद हो गया । कहने का तात्पर्य है कि गुरु के एक ही शब्द से हृदय परिवर्तन हो गया ।

{3}

पीछे लागा जाइ था , लोक वेद के साथ ।

आगै थे सतगुरु मिल्या, दीपक दिया हाथ ।।

अर्थ  -
कबीर दास जी कहते हैं कि अब तक तो मैं लोक वेद के साथ पीछे लगा हुआ जा रहा था । किंतु रास्ते में ही मुझे सदगुरु मिल गए, जिन्होंने ज्ञान का दीपक मेरे हाथ में थमा दिया और मुझे सही रास्ते की पहचान हुई ।

{4}

चौंसठ दीवा जोरी  कर, चौदह चंदा माहि ।  

तौ घर किसको चंदना, जिहि घर गोविंद नाहिं ।।

अर्थ -
कबीरदास जी कहते हैं चौसठ दीपक और चौदह चंद्रमा  को जोड़कर भी भले ही प्रकाश कर लिया जाए, लेकिन  उस व्यक्ति के घर में प्रकाश नहीं हो सकता जिसके घर में गोविंद (परमात्मा) का वास न हो । अर्थात्  चौसठ कलाओं और चौदह विद्याओं से पूर्ण होकर भी व्यक्ति तब तक अधूरा ही रहता है जब तक उसके हृदय में भक्तिभाव (विनम्रता का भाव) ना हो ।

{5}

भगति भजन हरि नाम है, दूजा दुख अपार ।

मनसा वाचा कर्मणा, कबीर सुमिरन सार ।।

अर्थ -
कबीरदास जी कहते हैं कि भक्ति और भजन हरि (परमात्मा) के पास पहुंचाने वाले नाव (साधन) हैं । शेष सभी अपार दुःख देने वाले हैं । इसलिए मन, वचन और कर्म से उसका सुमिरन करना ही भक्ति का सार (निचोड़) है ।

{6}

तू तू करता तू भया, मुझ में रही न हूं ।

वारी फेरी बलि गई, जित देखूं तित तू ।।

{7}

जिहि हरि जैसा जानिया, तिन को तैसा लाभ ।

ओसो प्यास न भाजई, जब लगि धसे न आभ ।।

{8}

 लंबा मारग दूरि घर, विकट पंथ बहु मार ।

कहो संतो क्यों पाइए, दुर्लभ हरि दीदार ।।

{9}

चकई बिछुरी रैन की,आई मिली परभाति ।

जे जन बिछुरे राम सो, ते दिन मिले न राति ।।

{10}

बहुत दिनन की  जोवती, बाट तुम्हारी राम ।

जिव तरसे तुझ मिलन को, मन नाही बिसराम ।।

{11}

 विरहिन उठे भी पडै़, दर्शन कारन राम ।

मूआ पीछे देहुगे , सो दर्शन किहि काम ।।

{12}

यह तन जारों मसि करो, लिखो राम का नाउँ ।

लेखनि करो करंक की, लिखि -लिखि राम पठाउँ ।।

{13}

दीपक पावक आनिया, तेल भी आना संग । 

तीनों मिल करि जोइया, उड़ि -उड़ि पड़े पतंग ।। 


{14}

आग जू लागी नीर महि, कांदौ जरिया झारि ।। 
उतर दखिन के पंडिता, मुए बिचारि- बिचारि ।।

{15}

अंतर कंवल प्रकासिया, ब्रह्म वास तहं होइ ।

मन भँवरा तहं लुबधिया, जानेगा जन कोइ ।।

{16}

सायर नाही सीप नहिं, स्वाति बूंद भी नाहिं ।

कबीर मोती नीपजे, शून्य शिखर गढ़ माहि ।। 

{17}

पानी ही तै हिम भया, हिम ह्वै गया बिलाइ । 

जो कुछ था सोई भया, अब कछु कहा न जाइ ।। 

{18}

मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहि । 

मुक्ताहल मुक्ता चुगे, अब उड़ी अनंत न जाहि ।।

{19}

हेरत-हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराइ । 

बूंद समानी समुद में, सो कत हेरी जाइ ।।

{20}

नैना अंतरि आव तू, नैन झाँपि तोहिं लेउ । 

ना हौं देखो और कूँ, ना तुझ देखन देउ ।।

{21}

ऐसा यह संसार है, जैसा सेंबल फूल । 

दिन दस के व्यवहार में, झूठे रंग न भूल ।।

{22}

निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी बधाय ।

बिन साबुन पानी बिना, निरमल करे सुभाय ।।



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