धारा 370 को हटाने के पीछे का रहस्य

धारा 370 और डॉक्टर भीमराव अंबेडकर 


जब डॉ० भीमराव अंबेडकर जी ने धारा 370 को संविधान में डालने से इनकार किया था ; डॉ० भीमराव अंबेडकर तब भी सही थे और आज भी सही साबित हुए । 

जब पं० जवाहरलाल नेहरू जी ने कश्मीर के प्रमुख नेता शेख अब्दुल्ला को कश्मीर को भारत के अन्य राज्यों की जगह एक विशेष राज्य या एक अलग देश की तरह मान्यता प्रदान करते हए विवादित धारा 370 को संविधान में डलवाने के लिए डॉ० भीमराव अंबेडकर के पास भेजा तो डॉ० भीमराव अंबेडकर ने उस समय जो कहा था, वह आज भी पढ़ने योग्य है और आंखें खोल देने वाला है ।

डॉ० भीमराव अंबेडकर जी ने शेख अब्दुल्ला के मुंह पर कहा था -

" तो आप चाहते हैं कि कश्मीर को सारी सहायता भारत दे, कश्मीर को करोड़ों रुपए भारत भेंजे, कश्मीर के विकास कार्य के सारे खर्चे भारत उठाए, कोई भी हमला होने पर कश्मीर की रक्षा भारत करे और सारे भारत में कश्मीरियों को बराबरी का अधिकार मिले; लेकिन उसी कश्मीर में भारत और भारत-वासियों को बराबरी का कोई अधिकार ना हो ?

" मैं भारत का कानून मंत्री हूँ और इस भारत विरोधी धारा 370 को मंजूरी देकर कम से कम मैं तो अपने देश से गद्दारी नहीं कर सकता । नेहरू जी से जाकर कहिएगा कि एक देशद्रोही ही इस धारा को संविधान में डालने को मंजूरी दे सकता है, और मैं वह देशद्रोही नहीं हूँ । "

और यह कह करके उन्होंने शेख अब्दुल्ला को अपने ऑफिस से निकाल दिया । आग बबूला शेख अब्दुल्ला नेहरू जी के पास पहुंचा और उन्हें सारी बात बताई । तब नेहरू जी ने अलोकतांत्रिक तरीके से गोपालस्वामी आयंगर से इस भारत विरोधी धारा 370 को संविधान में डलवाया, जिसका खामियाजा हमारा भारत देश आज तक भुगत रहा था ।

भारत के पहले कानून मंत्री बाबा साहेब डॉ० भीमराव अंबेडकर जी ने धारा 370 को भारतीय संविधान में डालने से उस समय भी मना कर दिया था ।

मजे की बात तो यह है कि मोदी सरकार आर०एस०एस० के जिस अध्यक्ष डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी के गुणगान गा रही है और धारा 370 को हटाने के बाद यह कह रही है कि डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आत्मा को शांति मिली है, वही डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी उस समय धारा 370 का बिल्कुल विरोध नहीं किए थे ।

 धारा 370 में क्या है  ?

* धारा 370 के मुताबिक भारतीय संसद जम्मू - कश्मीर के मामले में केवल तीन क्षेत्रों रक्षा, विदेश मामले और संचार के लिए कानून बना सकती है ।  इसके अलावा किसी कानून को लागू करवाने के लिए केंद्र सरकार को राज्य सरकार की मंजूरी  चाहिए ।

अनुच्छेद 35A को सन् 1954 में राष्ट्रपति के आदेश के माध्यम से संविधान में जोड़ा गया था । अनुच्छेद 35A जम्मू - कश्मीर विधानसभा को राज्य के 'स्थायी निवासी' की परिभाषा तय करने का अधिकार देता है ।

*  इसके तहत जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को कुछ खास अधिकार दिये गये हैं । 'अस्थायी निवासी' को उन अधिकारों से वंचित किया गया है ।

* अस्थायी निवासी जम्मू - कश्मीर में ना तो स्थायी रूप से बस सकते हैं और ना ही वहां संपत्ति खरीद सकते हैं ।


धारा 370 को हटाने का मतलब ?

अचानक धारा 370 को हटाने का क्या मतलब है ? क्या मोदी सरकार का यह फैसला सिर्फ सामरिक फैसला है ? नहीं, मोदी सरकार का यह फैसला सिर्फ सामरिक ही नहीं है, बल्कि वैचारिक भी है ।

मोदी सरकार के इस फैसले को अच्छी तरह से समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि कश्मीर में सबसे बदतर हालात हुए थे सन् 1989 में, और ये बदतर हालात 1996 तक जारी रहे थे । ये वो दौर था जब बड़े पैमाने पर कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ । मानवाधिकार हिंसा हुए, आतंकवादी घटनाएं बढ़ीं ।

सन् 1999 से 2004 तक जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता में थे तब उन्होंने इंसानियत के दायरे में रहकर हीलिंग टच की बात की थी ।  हीलिंग टच का नतीजा था कि सन् 2003 से लेकर 2012-13 तक कश्मीर में हालात सामान्य रहे ।

भाजपा सरकार जब से केंद्र में आई है तब से जम्मू कश्मीर में सैनिकों की हत्याएं बढ़ती ही गई हैं ।

   वर्ष     मारे गए नागरिक 
2015             174  
2016              204 
2017              204 
2018              215 
2019               74

धारा 370 को हटाने के दौरान क्या हुआ ?

जम्मू - कश्मीर के गृह सचिव शालीन काबरा का यह आदेश है कि, " आतंकवादियों के संभावित हमलों और अमरनाथ यात्रा को निशाना बनाया जाने की संभावना के मद्देनजर, साथ ही कश्मीर घाटी में मौजूदा स्थिति को देखते हुए, यह नसीहत दी जाती है कि पर्यटक और श्रद्धालु अपनी कश्मीर यात्रा रोक दें और घाटी छोड़ने का इंतजाम करें । "

ध्यान देने योग्य बात यह है कि सन् 1996 में एक बहुत बड़ी त्रासदी हुई थी, जिसमें 243 श्रद्धालु मारे गए थे । वह एक प्राकृतिक आपदा थी । उस समय भी अमरनाथ यात्रा बंद नहीं हुई थी ।

सन् 2000, 2001, 2002, और 2006 में बड़े आतंकी हमले हुए थे लेकिन अमरनाथ यात्रा बंद नहीं हुई, क्यों ? सन् 2017 में जम्मू कश्मीर के पिलग्रिम में आतंकी हमले के दौरान बहुत सारे लोग मारे गए थे फिर भी अमरनाथ यात्रा बंद नहीं हुई थी । तो फिर धारा 370 को हटाने के दौरान अमरनाथ यात्रा बंद करने के पीछे क्या रहस्य है ?

धारा 370 को हटाने का दुष्परिणाम 

धारा 370 को हटाने के पश्चात वर्तमान में जम्मू कश्मीर की जो स्थिति है, वह बड़ी ही दयनीय है । इससे पहले भी कई बार इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं को बंद कर दिया गया था, किंतु यह पहली बार है कि लैंडलाइन तक की सेवाओं को भी बंद कर दिया गया है । इसका परिणाम यह है कि जम्मू - कश्मीर के निवासियों की ही नहीं बल्कि वहां पर प्रवास किए हुए अन्य प्रदेशों के लोगों को भी कई तरह की असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है । लोग अपने मित्रों - रिश्तेदारों का समाचार नहीं ले पा रहे हैं । सोचने की बात यह है कि जो लोग कश्मीर में कमाने के लिए गए हैं उनके घर वाले कितने परेशान होंगे और उनके लिए कितने चिंतित होंगे । यही नहीं इंटरनेट की सारी सुविधाएं बंद होने के कारण सामान्य जनजीवन पर इसका कितना बड़ा दुष्प्रभाव पड़ा है इसका अनुमान शायद मोदी सरकार को जरा भी नहीं, और यदि होगा भी तो उन्हें इसकी क्या परवाह है ? उनकी हालत तो अकबर के मंत्री बीरबल की तरह ही है कि हम मक्खन - मलाई खा रहे हैं तो सारा देश मक्खन - मलाई खा रहा है ।

क्या यह देशभक्ति या राष्ट्रवाद है  ? 

रविंद्र रैना
जो कि बीजेपी राज्य के अध्यक्ष हैं, उन्होंने बयान दिया है कि " भारतीय जनता पार्टी 15 अगस्त को हर पंचायत में तिरंगा फहराएगी । "

यह हम सब जानते हैं कि इसका मकसद देशभक्ति नहीं, ना ही राष्ट्रवाद है, बल्कि यह सिर्फ और सिर्फ सियासत है ।

मोदी सरकार कश्मीर का मुद्दा उठाकर और मीडिया का सहारा लेकर केवल अपनी देशभक्ति का ढोंग कर रही है ।



इन तथ्यों को भी जानें और समझें
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1. धारा 371 (A) के तहत नागालैंड में कोई भी दूसरे राज्य का व्यक्ति न तो वहां बस सकता है और न जमीन खरीद सकता है । वहाँ जाने के लिये भी परमिट जरूरी होता है ।
2. धारा 371 (B) के तहत असम के कुछ जिले जैसे कार्बी आंगलांग आदि में बाहरी लोग जमीन खरीद और बस नही सकते ।
3. धारा 371 (C) के तहत मणिपुर में जमीन खरीदना और बसना मना है ।
4. 371 (F) के तहत सिक्किम में जमीन खरीदना और बसना मना है ।
5. 371 (G) के तहत मिजोरम में  जमीन ख़रीदना और बसना मना है ।
6. 371 ( H) के तहत अरुणाचल प्रदेश में जाने के लिये परमिट जरूरी है तथा जमीन खरीदना और बसना मना है ।

इसके अलावा शेष भारत के लोग हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बहुत सारे इलाकों में बस नहीं सकते और जमीन नहीं खरीद सकते ।
अंडमान एवं लक्षद्वीप के बहुत सारे द्वीपों पर घूमने के लिए परमिट की आवश्यकता पड़ती है ।

कल्पना कीजिए यदि धारा 370 से 371 (H) तक खत्म कर दिया जाय तो देश के सुरक्षा, स्थिरता आदि पर क्या असर पड़ेगा ? देश में उथल - पुथल की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
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अब जरा केंद्र सरकार से राज्यों को मिलने वाले कर्ज और अनुदान पर नजर डालिए :--------
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भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों को केंद्र सरकार से 90% सहायता मिलती है । उसमें 10% अनुदान तथा 90% कर्ज होता है और शेष भारत में ( जिसमे कश्मीर भी शामिल है ) 30% अनुदान और 70% कर्ज होता है ।

सिक्किम को शेष भारतीयों की तरह आयकर ( incomtax ) नहीं देना पड़ता है ।
  
कल्पना कीजिये कि यदि इन सारे नियमों को संविधान के प्रावधानों को नजरअंदाज कर बिना कोई सार्थक बहस किये उलट दिया जाय तब देश मे क्या स्थिति होगी ?

आर्टिकल 370 के लिए नेहरू गुनहगार हैं तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी हीरो कैसे हैं ?

राज्यसभा में गुलाब नबी आजाद को जवाब देते हुए अमित शाह ने कहा, "आर्टिकल 370 कश्मीर को भारत में नहीं मिलाता, क्योंकि ये आर्टिकल 1949 में आया जबकि कश्मीर का भारत में विलय 1947 में हो चुका था ।"

क्या शाह को ये नहीं पता कि संविधान ही 1949 में स्वीकार किया गया ?

1947 में कश्मीर के भारत में विलय के बाद भी घाटी में अस्थिरता थी ।

अस्थिरता व भारत में कश्मीरियों के विश्वास को देख 1949 में संविधान सभा ने आर्टिकल 370 को अपनाया ।

शाह को इतना इतिहास तो साफ होना चाहिये ।
डॉ० अंबेडकर के मना करने के बाद आर्टिकल 370 को गोपालस्वामी अयंगर ने ड्राफ़्ट किया ।

अक्टूबर 1949 में जब आर्टिकल 370 का स्वरूप संविधान सभा में पेश हुआ, तो सबसे पहले विरोध करने वालों में एक भारतीय कवि व विचारक मौलाना हसरत मोहानी थे ।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी उस संविधान सभा के सदस्य थे, लेकिन उन्होंने आर्टिकल 370 का कोई विरोध नहीं किया।
ना इस मुद्दे पर मुखर्जी ने नेहरु सरकार से इस्तीफा ही दिया था ।
मुखर्जी ने नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा 1950 के "नेहरू-लियाकत पैक्ट" से असहमति के कारण दिया था ।

यह पैक्ट भारत और पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा की बात करता था ।
फिर आखिर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आर्टिकल 370 का 'विरोध कब शुरू' किया ?
दरअसल 1949 के सीजफायर के बाद कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला ने एक परिवर्तनकारी कानून बनाया।
यह कानून था The Big Landed Estate Abolition Act 1950.

भूमि सुधार का परिवर्तनकारी कानून कुछ कम्युनिस्ट राज्यों को छोड़, कहीं देखने को नहीं मिलता ।
इस कानून के द्वारा 186 kanals (22 एकड़) से ज्यादा ज़मीन रखने वालों की ज़मीनों को भूमिहीनों और खेतिहर मजदूरों में बांटा जा रहा था ।
इस कानून से 1756 से ही अफ़ग़ान, सिख व डोगरा शासकों द्वारा शोषित कमजोर वर्गों में काफी उत्साह था,
लेकिन वर्तमान के डोगरा शासकों, ज़मींदारों और भूस्वामियों ने शेख के इस क्रांतिकारी कदम का विरोध किया ।

राजा हरि सिंह से मिलकर राष्ट्रीय जनसंघ, हिन्दू महासभा की कश्मीर इकाई, प्रजा परिषद व मुस्लिम साम्प्रदायिक दलों ने भूसुधार के इस आंदोलन का विरोध किया ।
कश्मीर राज्य हिंदूसभा ने तो 1947 में मुस्लिम सांप्रदायिक दलों के साथ राजा हरि सिंह के उस प्रस्ताव का समर्थन भी किया, जिसमें कश्मीर को स्वतन्त्र रखने की बात थी ।

बाद में माहौल बदलता देख वो कश्मीर के भारत में विलय के समर्थन में आये ।
अपनी पार्टी के 1944 के "सोपोर अधिवेशन" के सिद्धांत अपनाते शेख अब्दुल्ला ने जो भूमिसुधार कानून बनाया-ज़मींदारों को बिना मुआवजा दिए उनकी ज़मीन कमजोरों में बांटा जा सकता था ।
ये (जमीन बांटना) इसलिए सम्भव था क्योंकि आर्टिकल 370 की वजह से सारे भारतीय प्रावधान कश्मीर में लागू नहीं होते थे ।
ऐसे में बड़े हिंदू ज़मींदारों का "साथ" दे रहे "श्यामा प्रसाद मुखर्जी" ने आर्टिकल 370 का विरोध शुरू किया,
जिसे वो एक राष्ट्रवादी जामा पहनाने में कामयाब रहे ।
आर्टिकल 370 का मूल उद्देश्य पीछे कर मुखर्जी इसे भारत की अस्मिता से जोड़ने में इसलिए भी कामयाब हुए क्योंकि वो भारतीयों के "इतिहास बोध" को अच्छे से समझते थे ।

बाद में ब्राह्मणवादी मीडिया ने भी इसी 'इतिहासबोध' का फायदा उठाकर मुखर्जी को आर्टिकल 370 के विरोध का हीरो बना दिया ।

कश्मीर ताले में बंद है

कश्मीर ताले में बंद है । कश्मीर की कोई ख़बर नहीं है । शेष भारत में कश्मीर को लेकर जश्न है। शेष भारत को कश्मीर की ख़बर से मतलब नहीं है । एक का दरवाज़ा बंद कर दिया गया है। एक ने दरवाज़ा बंद कर लिया है ।

जम्मू कश्मीर और लद्दाख का पुनर्गठन विधेयक पेश होता है। ज़ाहिर है यह महत्वपूर्ण है और ऐतिहासिक भी ।राज्यसभा में पेश होता है और विचार के लिए वक्त भी नहीं दिया जाता है । जैसे कश्मीर बंद है वैसे संसद भी बंद थी। पर कांग्रेस ने भी ऐसा किया था इसलिए सबने राहत की साँस ली । कांग्रेस ने बीजेपी पर बहुत अहसान किया है । 

सड़क पर ढोल नगाड़े बज रहे हैं । किसी को पता नहीं क्या हुआ है, कैसे हुआ है और क्यों हुआ है । बस एक लाइन पता है जो वर्षों से पता है । 

राष्ट्रपति राज्यपाल की सहमति बताते हैं । राज्यपाल दो दिन पहले तक कह रहे हैं कि मुझे कुछ नहीं पता । कल क्या होगा पता नहीं । राज्यपाल केंद्र का प्रतिनिधि होता है । राष्ट्रपति ने केंद्र की राय को राज्य की राय बता दिया । साइन कर दिया । 

जम्मू कश्मीर और लद्दाख अब राज्य नहीं हैं । दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया । राज्यपाल का पद समाप्त। मुख्यमंत्री का पद समाप्त । राजनीतिक अधिकार और पहचान की काट छाँट हो जाती है । इतिहास बन जाता है । 

शेष भारत ख़ासकर उत्तर भारत में धारा 370 की अपनी समझ है। क्या है और क्यों है इससे मतलब नहीं है। यह हटा है इसे लेकर जश्न है। इसके दो प्रावधान हटे हैं और एक बचा है। वो भी हट सकता है मगर अब उसका मतलब नहीं है। 

जश्न मनाने वालों में एक बात साफ है। उन्हें अब संसदीय प्रक्रियाओं की नियमावलियों में कोई आस्था नहीं। वे न न्यायपालिका की परवाह करते हैं और न कार्यपालिका की और न विधायिकाओं की। संस्थाओं की चिन्ता का सवाल मृत घोषित किया जा चुका है। लोग अमरत्व को प्राप्त कर चुके हैं। 

यह अंधेरा नहीं है। बहुत तेज़ उजाला है। सुनाई ज़्यादा देता है, दिखाई कम देता है। लोक ने लोकतंत्र को ख़ारिज कर दिया है। परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। लोगों को अपने बीच कोई शत्रु मिल गया है। कभी वो मुसलमान हो जाता है कभी कश्मीरी हो जाता है। नफ़रत के कई कोड से लोगों की प्रोग्रामिंग की जा चुकी है। उन्हें बस इससे संबंधित शब्द दिख जाना चाहिए उनकी प्रतिक्रिया समान रूप से छलक आती है। 

धारा 370 को लेकर सबने राजनीति की है। बीजेपी से पहले कांग्रेस ने दुरुपयोग किया। धारा 370 के रहते मर्ज़ी चलाई। उसे निष्प्रभावी किया। इस खेल में राज्य के राजनीतिक दल भी शामिल रहे। या फिर उनकी नाकामियों को धारा 370 की नाकामी बता दिया गया। कश्मीर की समस्या को काफी लपेटा गया और लटकाया गया। उसमें बहुत से घपले बीजेपी के आने से पहले हुए। 

बीजेपी ने भी राजनीति की मगर खुल कर कहा कि हटा देंगे और हटा दिया। 35-A तो हटा ही दिया। लेकिन कब कहा था कि धारा 370 हटाएँगे तो राज्य ही समाप्त कर देंगे? यह प्रश्न तो है लेकिन जिसके लिए है उसे इससे मतलब नहीं है। 

नोटबंदी के समय कहा गया था कि आतंक की कमर टूट जाएगी। नहीं टूटी। उम्मीद है इस बार कश्मीर के हालात सामान्य होंगे। अब वहाँ के लोगों से बातचीत का तो प्रश्न ही नहीं। सबके लिए एक नाप का स्वेटर बुना गया है। पहनना ही होगा। राज्य का फ़ैसला हो गया। राज्य को पता ही नहीं। 

कश्मीरी पंडितों की हत्या और विस्थापन का दंश आज भी चुभ रहा है। उनकी वापसी का इसमें क्या प्लान है किसी को नहीं पता। आप यह नहीं कह सकते कि कोई प्लान नहीं है क्योंकि किसी को कुछ नहीं पता। यह वो प्रश्न है जो सबको निरुत्तर करता है। कश्मीरी पंडित ख़ुश हैं। 

घाटी में आज भी हज़ारों कश्मीरी पंडित रहते हैं। बड़ी संख्या में सिख रहते हैं। ये कैसे रहते हैं और इतना क्या अनुभव है, कश्मीर के विमर्श में इनकी कोई कथा नहीं है। हमलोग नहीं जानते हैं। 

अमित शाह ने धारा 370 को कश्मीर की हर समस्या का कारण बता दिया। ग़रीबी से लेकर भ्रष्टाचार तक का कारण। आतंक का तो बताया ही। रोजगार मिलेगा। फ़ैक्ट्री आएगी। ऐसा लग रहा है 1990 का आर्थिक उदारीकरण लागू हो रहा है। इस लिहाज़ से यूपी में बहुत बेरोज़गारी है। अब उसे रोजगार और फ़ैक्ट्री के नाम पर पाँच केंद्र शासित प्रदेश में कोई न बाँट दे ! 

एक अस्थायी प्रावधान हटा कर दूसरा अस्थायी प्रावधान लाया गया है। अमित शाह ने कहा है कि हालात सामान्य होंगे तो फिर से राज्य बना देंगे। यानि हमेशा के लिए दोनों केंद्र शासित प्रदेश नहीं बने हैं। यह साफ नहीं है कि जब हालात सामान्य होंगे तो तीनों को वापस पहले की स्थिति में लाया जाएगा या सिर्फ जम्मू कश्मीर राज्य बनेगा। अभी हालात ही ऐसे क्या थे कि राज्य का दर्जा ही समाप्त कर दिया। 

उम्मीद है कश्मीर में कर्फ़्यू की मियाद लंबी न हो। हालात सामान्य हों। कश्मीर के लोगों का आपसी संपर्क टूट चुका है। जो कश्मीर से बाहर हैं वे अपने घरों से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं। इस स्थिति में जश्न मनाने वालों का कलेजा बता रहा है कि हम क्या हो चुके हैं।

एक भीड़ है जो माँग कर रही है कि आप स्वागत कर रहे हैं या नहीं। ख़ुद बीजेपी धारा 370 के विरोध करने वाले जनता दल युनाइटेड के साथ एडजस्ट कर रही है। विरोध के बाद भी उसके साथ सरकार में है। आप प्रक्रिया पर सवाल उठा दें तो गाली देने वालों का दस्ता टूट पड़ेगा। वहां बिहार में बीजेपी मंत्री पद का सुख भोगती रहेगी। 

कश्मीर में ज़मीन ख़रीदने की ख़ुशी है। दूसरे राज्यों से भी ऐसे प्रावधान हटाने की ख़ुशी मनाने की माँग करनी चाहिए। उन आदिवासी इलाक़ों में जहाँ पाँचवी अनुसूची के तहत ज़मीन ख़रीदने की बंदिश है वहाँ भी नारा लग सकता है कि जब तक यह नहीं हटेगा भारत एक नहीं होगा। तो क्या एक भारत की माँग करने वाले अपने इस नारे को लेकर पूर्वोत्तर के राज्यों में भी जाएँगे या फिर कश्मीर तक ही सीमित रहेंगे? 

तरीक़ा तो अच्छा नहीं था, दुआ कीजिए नतीजा अच्छा हो। लेकिन नीयत ठीक न हो तो नतीजा कैसे अच्छा हो सकता है। कश्मीर को इसकी काफी क़ीमत चुकानी पड़ रही थी। शायद कश्मीर को शेष भारत की आधी अधूरी जानकारी का कोपभाजन न बनना पड़े। क्या ऐसा होगा? किसी को कुछ पता नहीं है। कश्मीरी लोगों की चिन्ता की जानी चाहिए। उन्हें गले लगाने का समय है। आप जनता हैं। आपके बीच से कोई मेसेज भेज रहा है कि उनकी बहू बेटियों के साथ क्या करेंगे। अगर आप वाक़ई अपने जश्न के प्रति ईमानदार हैं तो बताइये इस मानसिकता के लोगों को लेकर आपका जश्न कैसे शानदार हो सकता है? 

जश्न मनाते हुए लोगों का दिल बहुत बड़ा है । उनके पास बहुत से झूठ और बहुत सी नाइंसाफियों से मुँह फेर लेने का साहस है । तर्क और तथ्य महत्वपूर्ण नहीं है । हाँ और ना ज़रूरी है । लोग जो सुनना चाहते हैं वही कहिए। कई लोगों ने यह नेक सलाह दी है । कश्मीर भीड़ की प्रोग्रामिंग को ट्रिगर कर सकता है इसलिए चुप रहने की सलाह दी गई । 

इतिहास ऐसे ही बनता है

इतिहास बन रहा है । एक कारख़ाना खुला है । उसमें कब कौन सा इतिहास बन कर बाहर आ जाए किसी को पता नहीं चलता है । जहाँ इतिहास बना है वहाँ ख़ामोशी है । जहाँ जश्न है वहाँ पहले के किसी इतिहास से मतलब नहीं है । जब मतलब होता है तो इतिहास को अपने हिसाब से बना लेते हैं । सदन में अमित शाह ने कहा कि नेहरू कश्मीर हैंडल कर रहे थे, सरदार पटेल नहीं । यह इतिहास नहीं है, मगर अब इतिहास हो जाएगा क्योंकि अमित शाह ने कहा है; उनसे बड़ा कोई इतिहासकार नहीं है ।

नोट - लतीफ़ा बनाने वालों को बताइये कि कश्मीर एक गंभीर मसला है, पेंशन का मसला नहीं है । इनमें और अश्लील मेसेज भेजने वालों में कोई फ़र्क़ नहीं । दोनों को कश्मीर के लोगों  से मतलब नहीं है ।

अगर नहेरूजी द्वारा बनाई गई धारा 370 हट सकती है, तो वाजपेयी जी द्वारा थोपी गई NPS क्यो नहीं ?

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