भारत अंग्रेजों का गुलाम कभी नहीं था


क्या यह सच है कि भारत अंग्रेजों का गुलाम था ? इस बात को जानने के लिए भारत के इतिहास का अध्ययन करना होगा । सबसे पहले तो यह जानना जरूरी है कि अंग्रेजी शासन कब से शुरू हुआ ? अंग्रेजी शासन से पहले किसका शासन था ? और सन् 1857 की क्रांति के कारण कौन - कौन से थे ?

1857 की क्रांति के प्रमुख कारण

1857 ईस्वी की क्रांति के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-

राजनीतिक कारण-


इस क्रांति के प्रमुख राजनीतिक कारण निम्नलिखित थे
1- ईस्ट इंडिया कंपनी की स्वार्थपूर्ण नीति-

भारत पर अपने शासन का प्रभुत्व जमाने वाली कंपनी स्वार्थ पर आधारित थी| अधिकांश अंग्रेज गवर्नर जनरल ने कंपनी की स्वार्थ लिप्सा को ही पूरा करने का प्रयत्न किया| कंपनी का दोषपूर्ण शासन और अमानवीय व्यवहार इस आंदोलन की नींव बना|

2- मुगल सम्राट की दयनीय स्थिति-


मुगल सम्राटों की स्थिति निरंतर खराब होती जा रही थी| पहले सिक्कों पर मुगल शासकों के नाम मुद्रित किए जाते थे और कंपनी के उच्च पदाधिकारी तक उनको झुककर सलाम करते थे, किंतु 1835 ईसवी के बाद से कंपनी ने उसे बहुत ही पंगु बना दिया| सिक्कों से उसका नाम भी हटा दिया गया और अंग्रेज पदाधिकारियों ने उसका सम्मान करना छोड़ दिया| बहादुर शाह जफर को ही प्रधान बना कर आंदोलनकारियों ने संघर्ष किया |
3- उच्च नौकरियों में भारतीयों की उपेक्षा

उच्च नौकरियों में भारतीयों को नियुक्त नहीं किया जाता था नहीं किया जाता था| लार्ड विलियम बेंटिंक के 1835 ईसवी में वापस जाने के बाद भारतीयों की पुनः उपेक्षा शुरू हो गई थी| इस स्थिति में, भारतीयों में स्वाभाविक रूप से असंतोष उत्पन्न हो गया|
4- लॉर्ड डलहौजी की राज्य अपहरण की नीति -

लॉर्ड डलहौजी ने साम्राज्यवादी नीति का पालन करते हुए सभी प्रकार की नैतिकता और आदर्शों को त्याग कर, उचित अनुचित का विवेक किए बिना साम्राज्य विस्तार की नीति को ही सर्वोपरि महत्व दिया| राज्य अपहरण नीति में “गोद निषेध नियम” बनाकर उसने अनेक राज्यों को अपने साम्राज्य में मिला लिया| यह राज्य अपहरण की नीति प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य कारण थी|
5- पेंशन तथा उपाधियों की समाप्ति-

लॉर्ड डलहौजी ने पेंशन तथा उपाधियों को भी बंद करवा दिया| नाना साहब की पेंशन के साथ- साथ जो सम्मान- सूचक उपाधि क्रमागत रूप से चली आ रही थी, समाप्त कर दी गई| इस कारण नाना साहब स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता बन गए|

आर्थिक कारण-


इस क्रांति के निम्नलिखित आर्थिक कारण थे-
1- भारतीय व्यापार को क्षति-

ब्रिटिश शासन के फलस्वरुप भारतीय व्यापार नष्ट हो गया| यहां के कच्चे माल को अंग्रेज सस्ते मूल्य पर खरीद कर ले जाते और उससे तैयार माल बनाकर बेचते थे| इस व्यापारिक क्षति में भारतीय व्यापारियों और बेरोजगार हुए कारीगरों में विद्रोह की भावना जगा दी|
2- हस्त- शिल्पियों की दुर्दशा-

भारत का आर्थिक जन- जीवन हस्त- शिल्पियों पर निर्भर था| कंपनी के व्यापार के बाद से इन हस्तशिल्पियों के दुर्दिन आ गए| इन हस्तशिल्पियों की दुर्दशा ने क्रांति की स्थिति में वृद्धि कर दी|
3- किसानों की दयनीय स्थिति-

कंपनी के राज्य में कृषि कार्य की दशा दयनीय थी| भारतीय पदाधिकारी, जमीदार के ठेकेदार, कंपनी के छोटे कर्मचारी, सभी ने किसानों का शोषण किया| किसानों की यह विवशता एक दिन उग्र क्रांति का रूप बनकर ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए तैयार हो गई|
4- भारतीय धन का ब्रिटेन चले जाना-

कंपनी के अधिकारी और कर्मचारी कुछ थोड़े समय के लिए भारत आया करते थे| अतः वह अपनी जेब धन से भरने के लिए लालायित रहते थे |कंपनी भी अपना कोर्स बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहती थी| इस दोहरी मार ने साधारण भारतीयों को अपार क्षति पहुंचाई| इसलिए भारतीय, ब्रिटिश शासन से मुक्त होने के लिए लालायित हो गई|
5- जमीदारी प्रथा के दोष-

अंग्रेजों ने जमीदारों को भूमि का स्थाई स्वामी बना दिया था, इससे जमीदार प्रथा के अनेक दोष प्रकट हुए| क्योंकि जमीदार किसानों से मनमाना लगान वसूल किया करते थे, इससे किसानों को अपार कष्ट मिलता था| जब स्वयं कुछ जमींदार लगान ना देने के कारण जमीदारी से हटा दिए गए, तो वह अंग्रेजों के शत्रु बन गए| इस तरह जमीदारी से हटाए गए जमींदार एवं शोषित कृषक संयुक्त होकर अंग्रेजो के विरुद्ध एक हो गए|

सामाजिक कारण-

1857 की क्रांति के प्रमुख सामाजिक कारण निम्नलिखित थे-
1- सामाजिक प्रथाओं पर प्रतिबंध-

सुधारों के नाम पर जिन गवर्नरों ने सामाजिक प्रथाओं [विधवा- विवाह, दहेज़ प्रथा, सती- प्रथा, बाल विवाह] पर रोक लगाई थी यथार्थ में तो उपयोगी थे, परंतु इससे तत्कालिक रुप से सरकार के विरुद्ध असंतोष पैदा हुआ था|
2- पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृत का प्रचलन-

अंग्रेजों ने भारत में पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृत का भी प्रचार किया| उन्होंने भारतीय साहित्य और प्रांतीय भाषाओं की उपेक्षा की| लार्ड मैकाले ने अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाया| भारतीय जनता ने इस भाषा का विरोध किया|
3- अंग्रेजी शिक्षा का विरोध-

गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक उसके कानून सदस्य लार्ड मैकाले के सहयोग से अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाने लगी| यह शिक्षा कालांतर में राष्ट्रीय उत्थान में सहायक सिद्ध हुई, परंतु शुरू में इसके विरुद्ध असंतोष पनपा|
4- श्रेष्ठता की मानसिक भावना-

भारत में उच्च प्रशासनिक पदों पर अंग्रेजी आसीन थे और उनके अधीन अंग्रेजी शिक्षित भारतीय कार्य करते थे| अंग्रेज अधिकारी तो भारतीयों को निम्न श्रेणी का समझते ही थे, अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीय भी उनका पक्ष लेते हुए भारतीयों को हेय दृष्टि से देखते थे| अतः लोगों में अंग्रेज अधिकारियों के दुर्व्यवहार के प्रति तीव्र रोष उत्पन्न होने लगा था|

धार्मिक कारण-


1857 ईसवी की क्रांति के प्रमुख धार्मिक कारण निम्नलिखित थे-
1- ईसाई धर्म का प्रचार-

भारत में ईसाई पादरियों द्वारा ईसाई मिशनरियों के माध्यम से भारतीयों को तरह-तरह के प्रलोभन देकर ईसाई बनाया जाता था| इससे भारतीय जनता में अंग्रेजों के विरुद्ध रोष उत्पन्न हुआ और क्रांति के बीज उत्पन्न हुए|
2- हिंदू और इस्लाम धर्म की अवहेलना-

अंग्रेजों ने भारत के दोनों मुख्य धर्म हिंदू धर्म और मुस्लिम धर्म की अवहेलना की| वे इन धर्मों का तनिक भी आदर नहीं करते थे| यह स्थिति जनता के प्रबल असंतोष का कारण बन गई थी|
3- गोद निषेध नियम-

भारतीय परंपरा अनुसार दो दंपति निसंतान होते थे, वह किसी दूसरे बालक को गोद ले लेते थे| लॉर्ड डलहौजी ने गोद निषेध नियम बनाकर इस परंपरा पर कुठाराघात किया तथा अनेक राज्यों का अपहरण कर लिया|
4- ईसाइयों को विशेष सुविधाएं-

ईसाई धर्म ग्रहण करने वाले को सामाजिक और धार्मिक स्तर पर अनेक सुविधाएं प्रदान की गई थी| नए बने इसाई भी अनेक प्रकार की सुविधाओं का उपभोग कर रहे थे| सरकार की इस पक्षपातपूर्ण नीति ने भारतीयों में संतोष की वृद्धि कर दी|
5- चर्बी लगे कारतूस का प्रयोग-

भारतीय सैनिकों को दिए गए नए कारतूसों को राइफलों में भरने के लिए मुंह से छीलना पड़ता था| सैनिकों में यह अफवाह फैल गई कि इन कारतूसों में गाय तथा सूअर की चर्बी मिली होती है| गाय हिंदुओं के लिए पवित्र थी, जबकि सूअर मुसलमानों के लिए अपवित्र थी| इसका परिणाम यह हुआ कि हिंदू और मुसलमान सैनिक भड़क उठे और उन्होंने इन कारतूसों का प्रयोग करने से इंकार कर दिया| भारतीय सैनिकों कि इस क्रांति को ही 1857 ईसवी के स्वतंत्रता संग्राम का तात्कालिक कारण माना जाता है|

सैनिक कारण-


1857 ईस्वी की क्रांति के प्रमुख सैनिक कारण निम्नलिखित थे -
1- सैनिकों में भेदभाव-

अंग्रेजी सेना में सेवारत भारतीय सैनिकों और अंग्रेज सैनिकों के बीच भेदभाव रखा गया था| भारतीयों को वेतन, भत्ते, पदोन्नति भी कम दी जाती थी तथा इन्हें उच्च पदों पर भी नियुक्त नहीं किया जाता था|
2- ब्राह्मण एवं क्षत्रीय सैनिकों की समस्या-

अंग्रेजी सेना में ब्राह्मण एवं क्षत्रिय सैनिकों की संख्या बहुत अधिक थी| इन वर्णों के लोगों का समाज में बहुत सम्मानित स्थान था, परंतु ब्रिटिश सेना में इनके साथ बहुत ही निम्न स्तर का व्यवहार किया जाता था| इस कारण भी सैनिकों के मन में असंतोष की भावना व्याप्त थी|
3-अफगान युद्ध का प्रभाव-

ब्रिटिश सैनिक 1838 से 1842 ईसवी के तक अफगान युद्ध में बुरी तरह से पराजित हो गए थे| इससे भारतीय सैनिक मे यह धारणा व्याप्त हुई कि यदि अफगान सैनिक ब्रिटिश सैनिकों को हरा सकते हैं, तो हम भी अपने देश को इन से मुक्त करा सकते हैं|
4- क्रीमिया का युद्ध-

यूरोप में 1854-1856 ईसवी में हुए क्रीमिया के युद्ध में अंग्रेजों की पर्याप्त सेना समाप्त हो गई थी| अतः भारतीयों ने उचित अवसर पाकर क्रांति करने का निश्चय कर लिया था|
5- विदेश जाने की समस्या-

1856 ईसवी में एक कानून यह बनाया गया कि आवश्यकता पढ़ने पर भारतीय सैनिकों को अंग्रेजों की ओर से युद्ध लड़ने के लिए विदेश में भी भेजा जा सकता है तथा भारतीय सैनिक वहां जाने से मना नहीं कर सकते|
6- रियासती सेना की समाप्ति-

1856 ईसवी में अवध को अंग्रेजी राज्य में मिला दिया गया और वहां की रियासती सेना को भंग कर दिया गया| इससे 60000 सैनिक बेघर हो गए| इसी प्रकार ग्वालियर, मालवा आदि राज्यों की सेनाएं भी समाप्त कर दी गई| बेघर भारतीय सैनिक भड़क उठे तथा क्रांति की योजनाएं बनाने लगे|

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की मुख्य घटनाएं-


1. मेरठ विद्रोह-

9 मई, 1857 को मेरठ से विद्रोह की शुरुआत की। मेरठ के भारतीय सिपाहियों ने अपने ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या कर दी और जेल को तोड़ दिया। 10 मई को उन्होंने दिल्ली पर चढ़ाई की|
2. दिल्ली पर कब्जा:

जब मेरठ के सिपाही दिल्ली पहुंचे तो दिल्ली के सिपाही भी उनके साथ हो गए और देखते ही देखते पूरी दिल्ली पर उनका कब्जा हो गया अगले दिन, 11 मई को, सिपाहियों ने बहादुर शाह जफर को हिंदुस्तान का सम्राट घोषित किया। लेकिन बहादुर शाह बूढ़ा था और वह सिपाही को सक्षम नेतृत्व नहीं दे सके। दिल्ली का कब्ज़ा अल्पकालिक था।
3. दिल्ली का पतन-

सितंबर के महीने में ब्रिटिश सेना ने दिल्ली पर आक्रमण किया, जहां पर 6 दिनों तक भयंकर युद्ध चला और अंत में ब्रिटिश सेना ने दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया| हजारों की संख्या में लोग मारे गए, और सैकड़ों की संख्या में लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई| राजा को गिरफ्तार कर लिया गया और उसे बाद में रंगून भेज दिया गया, जहां 1862 में उसकी मृत्यु हो गई| राजा के पुत्रों को मार दिया गया और इस प्रकार भारत में मुगल वंश का समापन भी हो गया|

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के केंद्र-


या विद्रोह पूरे क्षेत्र में फैल गया, यह क्रांति पटना के आसपास के इलाकों से लेकर राजस्थान की सीमा तक फैल गई थी| इस क्रांति के प्रमुख केंद्र थे बिहार में आरा, कानपुर, लखनऊ, बरेली, झांसी और ग्वालियर|
1. लखनऊ-

लखनऊ अवध की राजधानी थी। वहाँ विद्रोही सिपाहियों ने अवध सेना के सैनिकों को अपने साथ शामिल किया और अवध के पूर्व राजा की रानी बेगम हज़रत महल ने इस विद्रोह का नेतृत्व किया। अंत में ब्रिटिश सेना ने लखनऊ पर कब्जा कर लिया और रानी नेपाल चली गई थी|
2. कानपुर-

कानपुर में विद्रोह पेशवा बाजी राव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब ने किया था। इस विद्रोह में पूरी तरह से शामिल हो गए और इसका प्रमुख कारण यह था कि वह ब्रिटिश सरकार द्वारा अपनी पेंशन से वंचित थे। उन्होंने कानपुर पर कब्जा कर लिया और खुद को पेशवा घोषित किया। यह जीत बहुत ही कम समय के लिए थी और बाद में अंग्रेजों ने कानपुर पर पुनः कब्जा कर लिया। कानपुर में किए गए विद्रोह को काफी प्रतिशोध के साथ दबाया गया| विद्रोहियों को या तो फांसी पर लटकाया गया था या तो उन्हें तोप से उड़ा दिया गया| नाना साहब बच गए और उन्होंने इस विद्रोह से अपने को हटा लिया लेकिन उनके शानदार कमांडर तात्या टोपे ने संघर्ष जारी रखा। अंततः तात्या टोपे हार गए और उन्हें गिरफ्तार करके फांसी पर चढ़ा दिया गया|
3. झांसी-

झांसी में इस क्रांति का नेतृत्व 22 वर्षीय रानी लक्ष्मीबाई ने किया था| ब्रिटिश सरकार ने रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र को झांसी के सिंहासन का दावेदार मानने से इनकार कर दिया था| और इस वजह से ब्रिटिश शासन के खिलाफ रानी इस विद्रोह में शामिल हुई| रानी लक्ष्मीबाई भारतीय महिला स्वतंत्रता सेनानियों में अग्रणीय हैं और उन्होंनेब्रिटिश बलों के खिलाफ बड़ी ही वीरता से लड़ाई की लेकिन अंततः वह अंग्रेजी द्वारा पराजित हो गई थी। पराजय के बाद रानी लक्ष्मीबाई बच गई और वहां से भाग निकले| इसके बाद रानी लक्ष्मी बाई और तांत्या टोपे एक हो गए और उन्होंने मिलकर ग्वालियर को अपने कब्जे में ले लिया| सिंधिया परिवार ने ब्रिटिश हुकूमत का साथ दिया और रानी लक्ष्मीबाई तथा अंग्रेजो के बीच भयंकर युद्ध हुआ| इस युद्ध में रानी लक्ष्मीबाई बहुत ही वीरता और शुद्धता से लड़ी और अंत तक वह अंग्रेजों से लड़ाई करती रही, इस लड़ाई में उनकी मृत्यु हो गई और ब्रिटिश शासन ने ग्वालियर पर पुनः अपना अधिकार कर लिया|
4. बिहार-

बिहार में कुंवर सिंह ने इस विद्रोह का नेतृत्व किया था।

1857 ईस्वी की क्रांति की असफलता के कारण-


1857 ईस्वी की क्रांति या संग्राम की असफलता के कारण निम्नलिखित थे-
1- समय से पूर्व क्रांति का प्रारंभ-

क्रांति के प्रारंभ करने की तिथि 31 मई निश्चित की गई थी, परंतु कुछ भारतीय सैनिकों ने आवेश में आकर 10 मई को ही क्रांति का बिगुल बजा दिया| इस प्रकार निर्धारित समय से पूर्व क्रांति प्रारंभ हो जाने के कारण संगठित क्रांति का प्रयास असफल हो गया और क्रांतिकारियों को बहुत हानि उठानी पड़ी|
2- क्रांति का सीमित क्षेत्र-

इस क्रांति का क्षेत्र देशव्यापी न होकर सीमित था| यह क्रांति दिल्ली से लेकर कोलकाता तक ही सीमित रही| पंजाब, राजस्थान, सिंध तथा पूर्वी बंगाल में अंग्रेजी सत्ता का अंत करने के लिए तनिक भी प्रयत्न नहीं किया, पंजाब, राजपूताना, ग्वालियर, इंदौर आदि के नरेश ने अंग्रेजों की सहायता की|
3- संगठन का अभाव-

क्रांतिकारी नेताओं में संगठन का सर्वथा अभाव था| प्रत्येक की नीति अलग अलग थी और प्रत्येक के समर्थक अपने ही नेता के नेतृत्व में काम करना चाहते थे|
4- एक लक्ष्य का अभाव-

क्रांतिकारियों का कोई एक लक्ष्य न था| विभिन्न विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए लड़ रहे थे| नाना साहब पेंशन चाहते थे, लक्ष्मीबाई गोद लेने का अधिकार और बहादुर शाह जफर अपनी बादशाहत चाहते थे|
6- अंग्रेजों के पास पर्याप्त साधन-

अंग्रेजों को इंग्लैंड से सैनिक और युद्ध- सामग्री की आपूर्ति बराबर मिलती रहती थी तथा यातायात के साधनों, रेल, तार आदि पर भी उनका अधिकार था| अतः वह सरलतापूर्वक एक स्थान से दूसरे स्थान पर शीघ्रता से आ जा सकते थे तथा संदेश भेज सकते थे| परंतु क्रांतिकारियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में तथा संदेश भेजने में पर्याप्त समय लगता था|
7- नौसैनिक शक्ति का अभाव-

1857 ईसवी के विद्रोह को दबाने के लिए विश्व में फैली ब्रिटिश साम्राज्य के विभिन्न विभिन्न भागो से एक लाख से भी अधिक सैनिक भारत भेजे गए थे| क्रांतिकारियों के पास कोई नौसैनिक शक्ति नहीं थी, फलतः यह इंग्लैंड से आ रही युद्ध सामग्री और सेना को रोक न सके|


1857 की क्रांति के क्या परिणाम हुए ?-


1857 की क्रांति के परिणाम-

1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यद्यपि असफल रहा, तथापि इसके निम्नलिखित व्यापक प्रभाव पड़े-
1- इस संग्राम ने इंग्लैंड की सरकार का ध्यान भारत में प्रशासन की ओर दिलाया, जिससे भारत को कंपनी के शासन के स्थान पर सीधे ताज के अधीन कर दिया गया|
2- महारानी विक्टोरिया ने देशी रियासतों का अंग्रेजी साम्राज्य में विलय ना करने की घोषणा की तथा गोद-निषेध प्रथा को समाप्त कर दिया गया|
3- अंग्रेजी शिक्षा के और अधिक प्रचार और प्रसार का निर्णय लिया गया|
4- अंग्रेजों ने भारत में साम्राज्यवादी प्रादेशिक विस्तार के स्थान पर आर्थिक शोषण की नीति के युग का आविर्भाव किया|
5- अंग्रेजों ने अत्याचारों से भारतीयों के मन में उनके प्रति द्वेष और बढ़ा जिससे राष्ट्रीयता की भावनाएं प्रबल हुई, जिसके फलस्वरुप भारतीय नेता देश को उनके चंगुल से छुड़ाकर ही चैन से बैठे|
6- इस क्रांति ने अंग्रेजो को हिंदू- मुस्लिम एकता की शक्ति का अनुभव करा दिया; अतः अब ब्रिटिश शासकों ने “फूट डालो और शासन करो” की नीति अपनाई| इस नीति के कारण ही भारत के विभाजन का मार्ग प्रशस्त हुआ|
7- प्रथम स्वाधीनता संग्राम में भारत के राष्ट्रीय जागरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया| राष्ट्रीय जागरण के फलस्वरुप
भारतवासी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध अपना स्वाधीनता संघर्ष चलाने के लिए कटिबद्ध हो गए|
8- इस क्रांति के फलस्वरुप भारत में ब्रिटिश संसद में लोकतांत्रिक संस्थाओं के विकास को प्रोत्साहन दिया| कालांतर में भारत एक संप्रभुता संपन्न लोकतांत्रिक देश बन गया
9- इस क्रांति के परिणाम स्वरुप जनता के प्रति अंग्रेजों की सहानुभूति हो गई| उन्होंने जनता से अलग रहने की नीति अपना ली तथा प्रशासन में भी जातीय भेदभाव बढ़ गया|
10- आरसी मजूमदार का कथन है कि ”1857 की क्रांति से भड़की आग ने भारत में ब्रिटिश शासन को उससे अधिक क्षति पहुंचाई, जितनी कि स्वयं क्रांति ने पहुंचाई थी|”
11- अंग्रेजी सेना का पुनर्गठन किया गया और सेना में भारतीयों की संख्या को कम किया गया| तो खाने में केवल यूरोपीय सैनिकों को तैनात किया जाने लगा| इसके अतिरिक्त भारतीय सैनिकों की जाति, धर्म व प्रांत के आधार पर अलग-अलग टुकड़ियां बनाई गई, जिससे वे एक ना हो सके|
इस प्रकार प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के परिणाम बड़े व्यापक तथा दूरगामी सिद्ध हुए| इसके प्रभाव को स्पष्ट करते हुए ग्रिफिन ने कहा कि” प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास की एक सौभाग्यशाली घटना थी, जिसने भारतीय गगन मंडल को अनेक मेघो से मुक्त कर दिया था|”

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महारानी विक्टोरिया का घोषणा पत्र

1 नवम्बर, 1858 ई0 को ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया ने एक घोषणा की जिसे भारत के प्रत्येक शहर में पढ़कर सुनाया गयां इस घोषणा में ब्रिटिश सरकार ने उन मुख्य सिद्धान्तों का विवरण दिया जिसके आधार पर भारत का भविष्य का शासन निर्भर करता था। इस घोषणा का कोई कानूनी आधार न था क्योंकि इसे ब्रिटिश संसद ने स्वीकार किया था। परन्तु तब भी इनमें दिये गये सिद्धान्त, आश्वासन आदि कानून के समकक्ष स्थान रखते थे क्योंकि इसे ब्रिटेन के मंत्रीमण्डल की स्वीकृति प्राप्त थी। इसमें मुख्यत: निम्नलिखित बाते सम्मिलित थी :
  1. इसके द्वारा घोषित किया गया कि भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी द्वारा प्रशासित क्षेत्रों का शासन अब प्रत्यक्ष रूप से ब्रिटेन के क्राउन द्वारा किया जायेगा। 
  2. इसके द्वारा गवर्नर-जनरल लार्ड कैनिंग को वायसराय क्राउन का प्रतिनिधि का पद भी प्रदान किया गया। 
  3. इसके द्वारा कम्पनी के सभी असैनिक और सैनिक पदाधिकारियों को ब्रिटिश क्राउन की सेवा में ले लिया गया तथा उनके संबंध में बने हुए सभी नियमों को स्वीकार किया गया। 
  4. इसके द्वारा भारतीय नरेशों के साथ कम्पनी द्वारा की गई सभी संधियों और समझौतों को ब्रिटिश क्राउन के द्वारा यथावत स्वीकार कर लिया गया, भारतीय नरेशों को बच्चा गोद लेने का अधिकार दिया गया तथा उन्हें यह आश्वासन भी दिया गया कि ब्रिटिश क्राउन अब भारत में राज्य - विस्तार की आकांक्षा नहीं करता और भारतीय नरेशों के अधिकारो, गौरव एवं सम्मान का उतना ही आदर करेगा जितना कि वह स्वयं का करता है। 
  5. इसके द्वारा साम्राज्ञी ने अपनी भारतीय प्रजा को आश्वासन दिया कि उनके धार्मिक विश्वासों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जायेगा बल्कि उनके प्राचीन विश्वासो, आस्थाओं और परम्पराओं का सम्मान किया जायेगा। 
  6. इसके द्वारा भारतीयों को जाति या धर्म के भेदभाव के बिना उनकी योग्यता, शिक्षा, निष्ठा और क्षमता के आधार पर सरकारी पदों पर नियुक्त किये जाने का समान अवसर पद्र ान करने का आश्वासन दिया गया।
  7. इसके द्वारा यह आश्वासन दिया गया कि रानी की सरकार सार्वजनिक भलाई, लाभ और उन्नति के प्रयत्न करेगी तथा शासन इस प्रकार चलायेगी जिससे उसकी समस्त प्रजा का हितसाधन हो।
  8. 1857 ई0 के विद्रोह में भाग लेने वाले अपराधियों में से केवल उनको छोडकर जिन पर अंग्रेजों की हत्या का आरोप था, बाकी सभी को क्षमा प्रदान कर दी गयी।

1858 ई. के कानून की शर्तें 

  1. इसके द्वारा भारत का शासन ब्रिटेन की संसद को दे दिया गया। 
  2. डायरेक्टरों की सभा और अधिकार सभा को समाप्त कर दिया गया तथा उनके समस्त अधिकार भारत -सचिव को दे दिये गये। भारत-सचिव अनिवार्यत: ब्रिटिश संसद और ब्रिटिश मंत्रिमण्डल का सदस्य होता था।
  3. भारत-सचिव की सहायता के लिये 15 सदस्यों की एक सभा- भारत-परिषद की स्थापना की गयी। इसके 7 सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार ब्रिटेन के क्राउन को तथा शेष सदस्यों के चयन का अधिकार कम्पनी के डायरेक्टरों को दिया गया परन्तु प्रत्येक स्थिति में यह आवश्यक था कि इसके आधे सदस्य ऐसे हो जो कम से कम दस वर्ष तक भारत सेवा-कार्य कर चुके हो।
  4. अर्थव्यवस्था और अखिल भारतीय सेवाओं के विषय में भारत-सचिव, भारत-परिषद् की राय को मानने के लिये बाध्य था। अन्य सभी विषयों पर वह उसकी राय को ठुकरा सकता था। उसे अपने कार्यों की वार्षिक रिपोर्ट ब्रिटिश संसद के समक्ष प्रस्तुत करनी पड़ती है। 
  5. भारतीय गवर्नर-जनरल को भारत-सचिव की आज्ञानुसार कार्य करने के लिये बाध्य किया गया। गवर्नर-जनरल भारत में ब्रिटिश सम्राट के प्रतिनिधियों के रूप में कार्य करने लगा और इस कारण उसे वायसराय भी कहा गया ।

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