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रविवार, 11 अगस्त 2019

हिंदी सामान्य अध्ययन NET/JRF/TGT/PGT/



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                 👉    खंड [क]    👈

हिंदी साहित्य का इतिहास 

(अ) आदिकाल 

अपभ्रंश रचनाएं 
विजयपाल रासो : नल्ल सिंह
हम्मीर रासो : शारंगधर
कीर्ति लता : विद्यापति
कीर्ति पताका : विद्यापति

हिंदी रचनाएं 
खुमान रासो : नरपति नाल्ह
पृथ्वीराज रासो : चंदबरदाई
जयचंद प्रकाश : भट्ट केदार
जयमयंक जसचंद्रिका : मधुकर
परमाल रासो : जगनिक
खुसरो की पहेलियां : अमीर खुसरो
विद्यापति पदावली : विद्यापति

(ब) मध्यकाल 

(i)  पूर्व मध्यकाल (भक्ति काल)

निर्गुण ज्ञानाश्रयी शाखा के कवि  
कबीरदास, रैदास, दादू दयाल, सुंदर दास, रज्जब, शेख फरीद, मलूक दास, नानक
निर्गुण प्रेमाश्रयी शाखा के कवि  
मलिक मोहम्मद जायसी, कुतुबन, मंझन, उस्मान, मुल्ला दाउद ।
सगुण रामाश्रयी शाखा के कवि 
तुलसीदास, अग्रदास, नाभादास, प्राणचंद चौहान और हृदय राम ।
सगुण कृष्णाश्रयी शाखा के कवि
सूरदास, कुंभन दास, नंददास, रसखान और मीराबाई ।

(ii) उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) 

रितिकालीन हिंदी साहित्य की धारा को 4 धाराओं में विभाजित किया गया है - रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त, रीतियुक्त ।

रीतिबद्ध : चिंतामणि, केशवदास, भूषण, मतिराम, देव, जसवंत सिंह, मंडन, सुरति मिश्र, श्रीपति, भिखारीदास, पद्माकर, ग्वाल कवि, प्रतापसाहि ।

रीतिसिद्ध कवि : बिहारी, सेनापति, बेनी, कृष्णकवि, रसनिधि, नेवाज, पजनेस, नृपशंभु, प्रीतम, रामसहायदास, हठी ।

रीतिमुक्त : घनानंद, रसखान, आलम, ठाकुर, बोधा, द्विजदेव ।
रीतियुक्त : भूषण, लाल कवि, सूदन, चंद्रशेखर वाजपेयी, रहीम, जमाल, वृंद, बैताल, गिरिधर कविराय, दीनदयाल गिरि, कुंदन शाह, अली मुहम्मद खाँ, बेनी कवि, विश्वनाथ सिंह, आनंद रघुनंदन, रघुराज सिंह ।

(स) आधुनिक काल

(i)  भारतेंदु युग 
भारतेंदु हरिश्चंद्र श्रीधर पाठक प्रेम धन जगमोहन सिंह

(ii)  द्विवेदी युग 
महावीर प्रसाद द्विवेदी श्यामसुंदर दास गुलाब राय जयशंकर प्रसाद सरदारपुर सिंह चंद्रधर शर्मा गुलेरी मिश्र बंधु बालमुकुंद गुप्त ।

(iii) छायावाद 
आचार्य रामचंद्र शुक्ल, राय कृष्णदास, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, गुलाब राय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, नंददुलारे वाजपेयी, हरि कृष्ण प्रेमी, सुमित्रानंदन पंत, माखनलाल चतुर्वेदी, पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', महादेवी वर्मा ।

(iv) प्रगतिवाद (v)  प्रयोगवाद 
हजारी प्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, अमृतलाल नागर, वृंदावनलाल वर्मा, सेठ गोविंद दास, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय', इलाचंद्र जोशी, जैनेंद्र कुमार, रांगेय राघव, यशपाल, फणीश्वर नाथ रेणु, लक्ष्मीनारायण मिश्र, रामवृक्ष बेनीपुरी ।

(vi) नई कविता नवलेखन 


अज्ञेय, धर्मवीर भारती, भारत भूषण अग्रवाल, गिरिजाकुमार माथुर, भवानी प्रसाद मिश्र, उपेंद्र नाथ 'अश्क', डॉ नगेंद्र, विद्यानिवास मिश्र, भगवती चरण वर्मा, विष्णु प्रभाकर, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, शिवानी, ऊषा देवी ।

हिंदी साहित्य के आदिकालीन रचनाकार

रचनाकार                        जन्म         मृत्यु
*चंदबरदाई                       1168      1192 
*अमीर खुसरो                  1282      1324 
*विद्यापति                       1350      1440 

हिंदी साहित्य के मध्ययुगीन रचनाकार

रचनाकार                        जन्म         मृत्यु
*कबीर दास                     1398      1518 
*गुरु नानक                      1469      1539 
*सूरदास                          1478      1583 
*रसखान                         1533      1618 
*दादू दयाल                      1544      1603 
*मलिक मोहम्मद जायसी   1549       1598 
*केशवदास                     1555       1617 
*मलूक दास                     1574       1682  
*रसलीन                         1689       1750 
*बिहारीलाल                     1595      1663 
*चिंतामणि                      1600       1680 
*भूषण                            1613       1648 
*घनानंद                          1689       1761 
*पद्माकर                          1753      1833 

हिंदी साहित्य के आधुनिक रचनाकार

रचनाकार                            जन्म         मृत्यु
*सदल मिश्र                           1767     1848
*बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय           1838    1894
*बालकृष्ण भट्ट                      1844     1914
*अंबिकादत्त व्यास                  1848    1900
*भारतेंदु हरिश्चंद्र                     1850    1885
*कार्तिक प्रसाद खत्री              1851    1904
*बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन'  1855    1923
*प्रताप नारायण मिश्र             1856     1894
*राधाचरण गोस्वामी               1858    1925
*श्रीधर पाठक                       1858    1928
*नवनीत चौबे                        1858    1932
*नाथूराम शंकर शर्मा              1859    1932
*दुर्गा प्रसाद मिश्र                   1860    1910
*रवींद्रनाथ टैगोर                    1861    1941
*महावीर प्रसाद द्विवेदी            1864   1938
*राधाकृष्ण दास                    1865    1902





हिन्दी साहित्य के मुख्य इतिहासकार और उनके ग्रन्थ 
1. गार्सा द तासी : इस्तवार द ला लितेरात्यूर ऐंदुई ऐंदुस्तानी (फ्रेंच भाषा में; फ्रेंच विद्वान, हिन्दी साहित्य के पहले इतिहासकार),(1839)
2.  मौलवी करीमुद्दीन : तजकिरा-ऐ-शुअराई, (1848)
3. शिव सिंह सिंगर: शिव सिंह सरोज,(1883)
4.  जॉर्ज ग्रियर्सन: द मॉडर्न वर्नेक्यूलर लिट्रैचर ऑफ हिंदोस्तान, (1888)
5. मिश्र बंधु : मिश्र बंधु विनोद (चार भागों में) भाग 1,2 और 3-(1913 में) भाग 4 (1934 में)
6.  एडविन ग्रीव्स : ए स्कैच ऑफ हिंदी लिटरेचर,(1917)
7. एफ ई के महोदय : ए हिस्ट्री ऑफ हिंदी लिटरेचर (1920)
8.  रामचंद्र शुक्ल : हिंदी साहित्य का इतिहास का(1929)
9.  हिंदी साहित्य की भूमिका: हिन्दी साहित्य की भूमिका(1940); हिन्दी साहित्य का आदिकाल(1952); हिन्दी साहित्य :उद्भव और विकास(1955)
10.  रामकुमार वर्मा : हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास(1938)
11.  डॉ धीरेंद्र वर्मा : हिन्दी साहित्य (तीन खण्डों में)
12. हिंदी साहित्य का वृहत इतिहास (सोलह खण्डों में) - 1957 से 1984 ई० तक।
13.  डॉ नगेंद्र : हिन्दी साहित्य का इतिहास (1973); हिन्दी वाङ्मय 20वीं शती
14.  रामस्वरूप चतुर्वेदी : हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1986
15.  डॉक्टर बच्चन सिंह : हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास, राधाकृष्ण प्रकाशन,  नई दिल्ली(1996)
16.  डॉ मोहन अवस्थी : हिन्दी साहित्य का अद्यतन इतिहास
17.  बाबू गुलाब राय: हिंदी साहित्य का सुबोध इतिहास

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  • ७५० ईसा पूर्व -  संस्कृत का  वैदिक संस्कृत के बाद का क्रमबद्ध विकास।
  • ५०० ईसा पूर्व -  बौद्ध तथा  जैन की भाषा प्राकृत का विकास (पूर्वी भारत)।
  • ४०० ईसा पूर्व - पाणिनि ने  संस्कृत व्याकरण लिखा (पश्चिमी भारत)। वैदिक संस्कृत से पाणिनि की काव्य संस्कृत का मानकीकरण।


  • पाँचवीं सदी ईसा पूर्व से पहले - भारत में ब्राह्मी लिपि का विकास।
  • पाँचवीं सदी ई०पू० से ३५०ई० - ब्राह्मी लिपि का ज्ञात प्रयोग काल।
  • ३२० ई० (के आसपास) - ब्राह्मी लिपि से गुप्त लिपि का विकास।
  • छठी सदी ईस्वी - सिद्धमात्रिका लिपि गुप्त लिपि की पश्चिमी शाखा की पूर्वी उपशाखा से विकास। इसेन्यूनकोणीय लिपि भी कहा गया है।
  • प्रथम सदी ई०पू०/५वीं सदी ई० -  कालिदास ने  विक्रमोरवासियम अपभ्रंश का प्रयोग किया।
  • ५५०ई० - वल्लभी के दर्शन में  अपभ्रंश का प्रयोग।
  • ७६९ -  सिद्ध  सरहपा  कई लोग हिन्दी का पहला कवि मानते हैं) ने 'दोहाकोश' लिखा।
  • ७७९ -  उद्यो तन सूरी की 'कुवलयमाला' में अपभ्रंश का प्रयोग।
  • ८०० - संस्कृत में बहुत सी रचनाएँ लिखी गयीं।
  • ९३३ -  देव सेन की 'सावयधम्म दोहा' (श्रावकधर्म दोहा या श्रावकाचार) {कुछ लोग इसे भी हिन्दी की पहली पुस्तक मानते हैं} ।
  • ११०० - आधुनिक  देवनागरी लिपि का प्रथम स्वरूप।
  • ११४५-१२२९ - हेमचंद्र ने सिद्ध हेमसिदा शब्दा अनुशासन नामक अपभ्रंश-व्याकरण की रचना की।

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• रामचंद्र शुक्ल ने आदिकाल को वीरगाथा काल नाम दिया ।
• डॉ० रामकुमार वर्मा ने रीतिकाल में कलात्मक गौरव को रेखांकित करते हुए कलाकाल की संज्ञा दी ।
• डॉ० रमाशंकर शुक्ल 'रसाल' ने रीतिकाल को 'काव्य कला काल' कहना उचित माना है ।
• विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने रीतिकाल को 'श्रृंगार काल' नाम से संबोधित किया है ।
• सन् 1850 से 1900 ईसवी तक के कालखंड को आचार्य शुक्ल ने हिंदी गद्य साहित्य का प्रवर्तन काल कहा है ।
• सन् 1916 ईस्वी में निराला की 'जूही की कली' रचना प्रकाशित हुई थी ।
• जयशंकर प्रसाद की कृति झरना का प्रकाशन काल 1928 भी है ।
• सुमित्रानंदन पंत के 'पल्लव' की कुछ कविताएं 1920 में प्रकाशित हुई ।
• सन 1936 ईस्वी में प्रसाद की 'कामायनी', निराला की 'राम की शक्तिपूजा' तथा प्रेमचंद का 'गोदान' रचा गया था ।
• 'प्रगतिशील लेखक संघ' की स्थापना सन् 1936 में हुई थी ।
• आरंभ में संस्कृत शब्दरूप के लिए भर्तृहरि, पतंजलि आदि वालों ने अपभ्रंश का प्रयोग किया ।
• महान स्वयंभू और पुष्पदंत ने अपनी भाषा को ग्रामीण भाषा अथवा देसी भाषा कहा है ।
• सन 1206 ईस्वी में तुर्की गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक भारत में मोहम्मद गोरी का उत्तराधिकारी बना ।
• सन 1281 सदी में बलबन की मृत्यु हुई थी ।
• तुगलक वंश का शासन 1320 से 14 से 12 ईसवी तक रहा ।
• सन 1398 ईसवी में मजदूर द्वारा दिल्ली पर आक्रमण से तुगलक वंश का अंत हुआ ।
• सन 1451 ईस्वी में अफगान सरदार बहलोल लोदी का शासन स्थापित हुआ ।
• सन 1506 में सिकंदर लोदी ने आगरा शहर की नींव डाली ।
• सन 1530 ईस्वी में हुमायूं, बाबर का उत्तराधिकारी बना ।
• शेरशाह का शासन 1555 ईसवी तक रहा ।
• 1555 ईसवी में हुमायूं दिल्ली पर फिर से अधिकार करने में सफल हुआ ।
• 1556 ईस्वी में 13 वर्ष की अवस्था में अकबर को गद्दी मिली ।
• वैष्णव आचार्य रामानुजाचार्य के मत को विशिष्ट-अद्वैतवाद के नाम से जाना गया ।
• रामानुजाचार्य के शिष्य राघवानंद तथा राघवानंद के शिष्य रामानंद हुए ।
• वल्लभाचार्य की भक्ति को पुष्टिमार्ग भक्ति के नाम से जाना जाता है । अष्टछाप कवियों का संबंध इसी पुष्टिमार्गी भक्ति से है ।
• भारत में सूफी साधकों के कई संप्रदाय हैं । इनमें चिश्ती संप्रदाय, कादिरा संप्रदाय, सुहरावर्दी संप्रदाय, नक्शाबन्दी संप्रदाय और शत्तारी संप्रदाय प्रमुख हैं ।

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1. काल 12वीं शताब्दी संस्थापक रामानुजाचार्य मत विशिष्ट अद्वैतवाद संप्रदाय श्री संप्रदाय  
2. काल 13वीं शताब्दी संस्थापक  माधवाचार्य मत द्वैतवाद ब्रह्म संप्रदाय 
3. काल 13वीं शताब्दी संस्थापक विष्णु स्वामी मत शुद्ध  अद्वैतवाद संप्रदाय रुद्र संप्रदाय 
4. काल 13वीं शताब्दी संस्थापक निंबार्काचार्य मत द्वैत अद्वैतवाद संप्रदाय सनकादि संप्रदाय

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अष्टछाप के कवियों में कृष्ण दास कुंभन दास और चतुर्भुज दास शुद्र थे मुसलमान भक्त कवि रसखान विट्ठलनाथ की प्रिय शिष्य थे रामानुजाचार्य मध्य आचार्य निंबार्क आचार्य रामानंद वल्लभाचार्य आदि ब्राह्मण थे संतो की निर्गुण निराकार की उपासना पद्धति को अवैध शक्ति का नाम दिया जाता है विद्वानों का मत है कि 1000 ईस्वी के बाद ही सूफी मत भारत में आया कुछ विद्वान भारत में सूफी मत का प्रवेश ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती से मानते हैं चिश्ती संप्रदाय 12वीं शताब्दी यह भारत में सर्वाधिक प्रसिद्ध संप्रदाय है ख्वाजा अबू इस्साक सामी चिश्ती या उनके शिष्य अबू अख्तर चिश्ती का नाम इस संप्रदाय के प्रवर्तक के रूप में लिया जाता है ।
• सुवर दिया सूअर वर्दी या सुहरावर्दी संप्रदाय 12वीं शताब्दी भारत में इस सूफी संप्रदाय के प्रवर्तक बहाउद्दीन जकारिया कहे गए हैं ।
• कादरिया का दरिया संप्रदाय 15वीं शताब्दी इस संप्रदाय के प्रवर्तक अब्दुल कादिर जिलानी थे भारत में इसके प्रचारक सैयद मोहम्मद गौस वाला पीर थे ।
• नक्शा बंदी या नक्शा बंदी या संप्रदाय 15वीं शताब्दी इस संप्रदाय को ख्वाजा बहाउद्दीन नक्शबंद ने आरंभ किया था भारत में इसका प्रचार करने वाले ख्वाजा बाकी बिल्ला बेरंग रहे ।
• चिश्ती संप्रदाय के माध्यम से सूफी मत का प्रचार भारतवर्ष में करने का श्रेय ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी को जाता है ।

• सूफियों ने मनुष्य के चार विभाग स्वीकार किए हैं अर्थात विषय भोग बेतिया इंद्रिय या जड़त्व मनुष्य के शरीर में समाहित यह तत्व उसका जड़ अंश बनाते हैं अतः साधक का प्रथम लक्ष्य के साथ युद्ध होना चाहिए दूसरा अर्थात आत्मा और कल का अर्थ है हृदय कल्लू द्वारा ही साधन अपनी साधना करता है तीसरा या बुद्धि यह मनुष्य का चौथा विभाग है ।

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पहला तार सप्तक 1983 
रचनाकार : आगे मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, प्रभाकर मच्वे, गिरिजाकुमार माथुर, रामविलास शर्मा ।

दूसरा तार सप्तक 1951 
रचनाकार : भवानी प्रसाद मिश्र, शकुंत माथुर, हरिनारायण व्यास, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, रघुवीर सहाय धर्मवीर भारती ।

तीसरा तार सप्तक 1959 
रचनाकार : प्रयाग नारायण त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, विजयदेव नारायण साही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मदन वात्सायन, कीर्ति चौधरी ।

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आदिकालीन कवियों की प्रमुख कृतियों का विवरण 
1. अब्दुर्रहमान : संदेश रासक 2. नरपति नाल्ह : बीसलदेव रासो (अपभ्रंश हिंदी) 3. चंदबरदायी : पृथ्वीराज रासो (डिंगल-पिंगल हिंदी) 4. दलपति विजय : खुमान रासो (राजस्थानी हिंदी) 5. जगनिक : परमाल रासो 6. शार्गंधर : हम्मीर रासो 7. नल्ह सिंह : विजयपाल रासो 8. जल्ह कवि : बुद्धि रासो 9. माधवदास चारण : राम रासो 10. देल्हण : गद्य सुकुमाल रासो 11. श्रीधर : रणमल छंद , पीरीछत रायसा 12. जिनधर्मसूरि : स्थूलिभद्र रास 13. गुलाब कवि : करहिया कौ रायसो 14. शालिभद्रसूरि : भरतेश्वर बाहुअलिरास 15. जोइन्दु : परमात्म प्रकाश 16. केदार : जयचंद प्रकाश 17. मधुकर कवि : जसमयंक चंद्रिका 18. स्वयंभू : पउम चरिउ 19. योगसार :सानयधम्म दोहा 20. हरप्रसाद शास्त्री : बौद्धगान और दोहा 21. धनपाल : भवियत्त कहा 22. लक्ष्मीधर : प्राकृत पैंगलम 23. अमीर खुसरो : किस्सा चाहा दरवेश, खालिक बारी 24. विद्यापति : कीर्तिलता, कीर्तिपताका, विद्यापति पदावली (मैथिली)

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  • ११८४ ई० - शालिभद्र सूरि रचित भरतेश्वर बाहुबलि रास २०५ छंदों का आकार में छोटा परंतु शब्द-चयन एवं भाव सभी दृष्टियों से अत्यंत उत्तम काव्य है। पुष्ट तर्कों से यही हिंदी की पहली रचना सिद्ध होती है।
  • १२५३-१३२५ - अमीर ख़ुसरो की पहेलियों तथा मुकरियों में "हिन्दवी" शब्द का सर्वप्रथम उपयोग।
  • १३७० - "हंसाउली" (हंसावली) के कवि असाइत ने प्रेम कथाओं की शुरुआत की।
  • १३९९-१५१२ - कबीर की रचनाओं ने निर्गुण भक्ति की नींव रखी।
  • १४००-१४७९ - अपभ्रंश के आखिरी महान् कवि रइधू
  • १४५० - रामानन्द के साथ "सगुण भक्ति" की शुरुआत।
  • १५८० - शुरुआती दक्खिनी का कार्य "कालमितुल हकायत"—बुरहानुद्दीन जानम द्वारा।
  • १५८५ - नाभादास ने "भक्तमाल" लिखी।
  • १६०१ - बनारसीदास ने हिन्दी की पहली आत्मकथा "अर्ध कथानक" लिखी।
  • १६०४ - गुरु अर्जुन देव ने कई कवियों की रचनाओं का संकलन "आदि ग्रन्थ" निकाला।
  • १५३२-१६२३ - गोस्वामी तुलसीदास ने "रामचरित मानस" की रचना की।
  • १६२३ - जटमल ने "गोरा बादल री बात" (कुछ लोगों के विचार से खड़ी बोली की पहली रचना) लिखी।
  • १६४३ - आचार्य केशव दास ने "रीति" के द्वारा काव्य की शुरुआत की।
  • १६४५ - उर्दू का आरंभ





भारतेंदु युग के प्रमुख कवि 

भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850-1885) 

भारतेंदु हरिश्चंद्र काशी के प्रसिद्ध सेठ अमीचंद के धनी परिवार में पैदा हुए थे । इनके पिता श्री गोपालचंद्र 'गिरधरदास' अपने समय के प्रसिद्ध कवि थे । भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लगभग 70 कृतियों की रचना की, जिनमें प्रेममालिका, प्रेमसरोवर, प्रेम विलाप, प्रेम फुलवारी, भक्ति सर्वस्व आदि प्रमुख हैं ।

बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन (1855-1923)
बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन ने साप्ताहिक पत्रिका 'नागरी नीरद' तथा मासिक पत्रिका 'आनंद कादंबिनी का संपादन किया । इनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियों में जीर्ण जनपद, आनंद अरुणोदय, हार्दिक-हर्षादर्श, मयंक महिमा आदि उल्लेखनीय हैं । इनके काव्य का मुख्य स्वर जातीय गौरव, समाज सुधार तथा देश प्रेम है । इन्होंने मुख्य रूप से ब्रज भाषा में ही रचना की, किंतु खड़ी बोली के प्रति भी इनका अनुराग था । छंदोबद्ध रचनाओं के अतिरिक्त इन्होंने लोक संगीत की कजली और लावणी शैलियों में भी सरस कविताएं लिखी है ।

प्रताप नारायण मिश्र (1856-1894)

मिश्र जी का जन्म उन्नाव जिले के गांव नामक स्थान में हुआ था । इन्होंने ब्राह्मण नामक पत्र का सफल संपादन किया प्रेम पुष्पा वली मन की लहर लोकोक्ति शतक तथा श्रृंगार विलास की प्रसिद्ध साहित्य है ।

द्विवेदी युग के प्रमुख कवि 

श्रीधर पाठक 1865-1928 

आगरा जनपद के गांव में हुआ था । इनको हिंदी संस्कृत अंग्रेजी भाषा का बहुत अच्छा ज्ञान था । इन्होंने ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों में श्रेष्ठ रचनाएं की हैं । इन्होंने खड़ी बोली पद के लिए भी निकालें लावणी जैसे एकांतवास योगी लिखा वैसे संतो के शब्द कड़ी पद्धति पर जगत सच्चाई सार लिखा । उनकी मौलिक कृतियों में आज तक कश्मीर सुषमा देहरादून और भारत गीत विशेष उल्लेखनीय है ।

महावीर प्रसाद द्विवेदी 1864-1938 

महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म उत्तर प्रदेश के रायबरेली जनपद के अंतर्गत दौलतपुर नामक ग्राम में हुआ था 1930 ईस्वी में सरस्वती पत्रिका के संपादक बने और सन उन्नीस सौ बीस तक संपादन कार्य करते रहें यह कवि आलोचक निबंधकार अनुवादक कथा संपादक आचार्य थे इनके लिखे हुए मौलिक और अनूदित ग्रंथ की संख्या लगभग 80 है काव्य मंजूषा सुमन कान्यकुब्ज विलाप गंगा लहरी कुमारसंभव सार आदि द्विवेदी जी की रचनाएं 

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध 1847 

आजमगढ़ जनपद के निजामाबाद नामक स्थान में हुआ था । उन्होंने 1923 में सरकारी नौकरी से अवकाश ग्रहण किया और साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया । इनके काव्य ग्रंथों में प्रिय-प्रवास, पद्य प्रसून, चुभते-चौपदे, चोखे-चौपदे, बोलचाल, रस-कलस तथा वैदेही वनवास प्रसिद्ध हैं । इनमें से प्रिय-प्रवास खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य है । रस-कलस एक काव्य शास्त्रीय रचना है, जिसमें रस का स्वरूप तथा नायक-नायिका भेद आदि वर्णित हैं । 

मैथिलीशरण गुप्त 1886-1964 

मैथिलीशरण गुप्त का जन्म चिरगांव जनपद झांसी में हुआ था । इनकी आरंभिक रचनाएं कोलकाता से निकलने वाले वैश्योपकारक पत्र में प्रकाशित होती थी । कालांतर में इनका परिचय आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी से हुआ और उनकी कविताएं सरस्वती में प्रकाशित होने लगी । उनकी प्रथम पुस्तक रंग में भंग का प्रकाशन 1909 में हुआ, किंतु इनकी ख्याति भारत भारती 1912 ईस्वी से हुई, जिसमें भारत के अतीत का गौरव गान तथा तत्कालीन वर्तमान का चित्रण हुआ है । उन्होंने दो महाकाव्य और खंडकाव्य अनेकों और तिलोत्तमा चंद्रहास नामक तीन नाटकों की रचना की । गुप्त जी के प्रमुख काव्य ग्रंथ जयद्रथ वध, भारत भारती, पंचवटी, झंकार, साकेत, यशोधरा, द्वापर, जयभारत, विष्णुप्रिया आदि ।
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मैथिलीशरण गुप्त 1886 - 1965 
जयशंकर प्रसाद 1889 - 1937 
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला 1896 - 1962 
सुमित्रानंदन पंत 1900 - 1977 
महादेवी वर्मा 1907 - 1987 
रामधारी सिंह 'दिनकर' 1908 - 1974 
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' 1911 - 1987 
वैद्यनाथ मिश्र 'नागार्जुन' 1911 - 1998 
सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' 1936 - 1975 

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मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएं 
रंग में भंग 1909 जयद्रथ वध 1911 भारत भारती 1912 शकुंतला 1914 तिलोत्तमा 1915 चंद्रहास 1916 पंचवटी 1925 झंकार 1929 साकेत 1931 यशोधरा 1932 द्वापर 1936 नहुष 1940 कुणाल गीत 1941 काबा कर्बला 1942 अंजलि और अर्घ्य 1950 जय भारत 1952 राजा प्रजा 1956 विष्णु प्रिया 1957 रत्नावली 1959 उच्छ्वास 1960


जयशंकर प्रसाद की रचनाएं 
उर्वशी 1909 वन मिलन 1909 प्रेम राज्य 1909 अयोध्या का उद्धार 1910 शो को श्वास 1910 वभ्रुवाहन 1911 कानन कुसुम 1913 प्रेम पथिक 1913 करुणालय 1913 महाराणा का महत्व 1914 झरना 1911 आंसू 1925 लहर 1933 कामायनी 1935

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचनाएं 
जूही की कली 1916 अनामिका 1922 परिमल 1930 गीतिका 1936 अनामिका 1938 तुलसीदास 1938 कुकुरमुत्ता 1942 अणिमा 1945 बेला 1946 नए पत्ते 1946 अर्चना 1950 अपरा 1950 आराधना 1955 गीत गूंज 1954

सुमित्रानंदन पंत की रचनाएं 
वीणा 1918 ग्रंथि 1920 पल्लव 1926 गुंजन 1932 युगांत 1936 युगवाणी 1939 ग्राम्या 1940 स्वर्णकिरण 1947 स्वर्णधूलि 1947 युगांतर 1948 उत्तरा 1949 रजत शिखर 1951 शिल्पी 1952 अतिमा 1955 सौवर्ण्य 1957 वाणी 1958

महादेवी वर्मा की रचनाएं 
निहार 1930 रश्मि 1932 नीरजा 1935 सांध्यगीत 1936 यामा 1940

रामधारी सिंह दिनकर की रचनाएँ
रेणुका 1935 हुँकार 1939 रसवन्ती 1940 द्वंदगीत 1940 शाम देनी 1945 कुरुक्षेत्र 1946 रश्मिरथी 1952 दिल्ली 1954 नील कुसुम 1954 उर्वशी 1961 परशुराम की प्रतीक्षा 1963

अज्ञेय की रचनाएँ
भग्नदूत 1933 चिंता 1942 इत्यलम 1946 हरी घास पर क्षण भर 1949 बावरा अहेरी 1954 इंद्रधनुष रौंदे हुए 1957 अरी ओ करुणा प्रभामय 1959 आँगन के पार द्वार 1961 सुनहरे शैवाल 1965 कितनी नावों में कितनी बार 1967 क्योंकि मैं उसे जानता हूँ 1969 सागर मुद्रा 1970

नागार्जुन की रचनाएँ
युगधारा 1956 सतरंगे पंखों वाली 1959 प्यासी पथराई आँखें 1962

धूमिल की रचनाएँ 
संसद से सड़क तक 1972 कल सुनना मुझे 1977

[12/3, 12:39 PM] Devchandra Bharti Prakhar: उपन्यासः 'परख' (१९२९), 'सुनीता' (१९३५), 'त्यागपत्र' (१९३७), 'कल्याणी' (१९३९), 'विवर्त' (१९५३), 'सुखदा' (१९५३), 'व्यतीत' (१९५३) तथा 'जयवर्धन' (१९५६)।

कहानी संग्रहः 'फाँसी' (१९२९), 'वातायन' (१९३०), 'नीलम देश की राजकन्या' (१९३३), 'एक रात' (१९३४), 'दो चिड़ियाँ' (१९३५), 'पाजेब' (१९४२), 'जयसंधि' (१९४९) तथा 'जैनेंद्र की कहानियाँ' (सात भाग)।

निबंध संग्रहः 'प्रस्तुत प्रश्न' (१९३६), 'जड़ की बात' (१९४५), 'पूर्वोदय' (१९५१), 'साहित्य का श्रेय और प्रेय' (१९५३), 'मंथन' (१९५३), 'सोच विचार' (१९५३), 'काम, प्रेम और परिवार' (१९५३), तथा 'ये और वे' (१९५४)।
[12/3, 12:40 PM] Devchandra Bharti Prakhar: जैनेंद्रकुमार (२ जनवरी, १९०५- २४ दिसंबर, १९८८)
[12/3, 12:49 PM] Devchandra Bharti Prakhar: मोहन राकेश (8 जनवरी 1925 - 3 जनवरी, 1972

 मोहन राकेश की रचनाएँ
 आखिरी चट्टान तक 1953
आषाढ़ का एक दिन 1958, अंधेरे बंद कमरे 1961, लहरों के राजहंस 1963, न आने वाला कल 1968
आधे अधूरे 1969 अण्डे के छिलके
[12/3, 12:52 PM] Devchandra Bharti Prakhar: प्रेमचंद द्वारा लिखे गए उपन्यासों की सूची।

सेवासदन (१९१८)
प्रेमाश्रम १९२२
रंगभूमि १९२५
निर्मला (१९२५)
कायाकल्प १९२७
गबन (१९२८)
कर्मभूमि (१९३२)
गोदान (१९३६)
मंगलसूत्र (अपूर्ण)

नाटक
संग्राम (1923)
कर्बला (1924)
प्रेम की वेदी (1933)
[12/3, 12:57 PM] Devchandra Bharti Prakhar: यशपाल (३ दिसम्बर १९०३ - २६ दिसम्बर १९७६) 

दिव्या 1945
देशद्रोही
झूठा सच 1958
दादा कामरेड 1941
अमिता
मनुष्य के रूप

तेरी मेरी उसकी बात 1974

भीष्म साहनी (८ अगस्त १९१५- ११ जुलाई २००३) 

नाटक - हानूश (१९७७), माधवी (१९८४), कबिरा खड़ा बजार में (१९८५), मुआवज़े (१९९३)


झरोखे1988, तमस1988, बसन्ती1982, मय्यादास की माडी़2000, कुन्तो1993, रंग दे बसंती चोला 1996 नीलू निलिमा नीलोफर 2000 हानूश 2002

मृदुला गर्ग (जन्म:25 अक्टूबर, 1938)

अनित्य (उपन्यास -1980)
उर्फ सैम (कथासंग्रह -1986)
उसके हिस्से की धूप (उपन्यास -1975)
एक और अजनबी (नाटक -1978)
कठगुलाब (उपन्यास -1996)
खेद नहीं है (व्यंग्य -2009)
ग्लेशियर से (कथासंग्रह -1980
चित्तकोबरा (उपन्यास -1979)
चुकते नहीं सवाल (ललित लेखसंग्रह -१९९९)
छत पर दस्तक (कथासंग्रह -२००६)
जादू का कालीन (नाटक -१९९३)
टुकड़ा टुकड़ा आदमी (कथासंग्रह -१९७६)
डैफ़ोडिल जल रहे हैं (कथासंग्रह -१९७८)
मंज़ूर नामंज़ूर (प्रेमकथा -२००७)
मिलजुल मन (उपन्यास -2007)
मैं और मैं (उपन्यास -1984)
वंशज (उपन्यास -1976)


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भारतीय व पाश्चात्य काव्यशास्त्र तथा हिंदी आलोचना 

शब्दार्थै सहितौ काव्यम् गद्यम पद्यम तत द्विधा ।भामह  

काव्य शब्दोंयं गुणालंकार संस्कृतियोः शब्दार्थयोवर्ततते । वामन 

तत् दोषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकतीः पुनः क्वापि ।
मम्मट 

वाक्यम रसात्मकम् काव्यम । विश्वनाथ 

रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्द काव्यम् । पंडितराज जगन्नाथ 

काव्यम ग्राहम अलंकार आता मन 

सौंदर्य अलंकारः । वामन 

रीतिरात्मा काव्यस्य । वामन 

विशिष्ट पदरचना रीति । वामन

भरत नाट्यशास्त्र 
भामह काव्यालंकार 
दंडी काव्या दर्श 
वामन काव्यालंकार सूत्र 
रूद्र काव्यालंकार 
आनंद वर्धन ध्वन्यालोक 
भटकल उलट 
सनकोक 
पटनायक 
अभिनव गुप्त 975 1025 ध्वन्यालोक लोचन 
कुंतक 10 वीं सदी वक्रोक्ति जीवितम 
भोजराज 1010 1050 सरस्वती कंठ आवरण
 1180 काव्यप्रकाश 6 
महेंद्र 1025 1066 और शिव चर्चा आठवीं सदी काव्यालंकार संग्रह 
कविराज विश्वनाथ साहित्य दर्पण 
पंडित रघुनाथ 1617 रसगंगाधर

*हिंदी साहित्य में काव्य के स्वरूप को लेकर मध्यकाल में कोई मौलिक विवेचन नहीं हो सका । चैतन्य महाप्रभु के शिष्य रूप गोस्वामी ने भक्ति रस अमृत सिंधु 15 से 41 ईसवी में भक्ति को ही प्रकृत रस सिद्ध किया और अन्य राशियों का विवेचन उसकी वेदों के रूप में किया । 
*रीतिकाल के आचार्य केशव चिंतामणि कुल पतिदेव श्रीपति सोमनाथ विकारी दास आदि ने कोई नवीन या मौलिक उद भावना नहीं की यह आचार्य संस्कृत के आचार्यों कीमतों में ही थोड़ा हेरफेर करके उसे प्रस्तुत करते रहे ।


काव्य हेतु 
आचार्य मम्मट ने शक्ति निपुणता और अभ्यास इन तीनों को सम्मिलित रूप से काव्य काहे तू माना है सत्य निपुणता लोग शास्त्र काव्या देवेश रात का वैद्य शिक्षा अभियान स्थिति है कुछ तो दो बुलावे काव्यप्रकाश अर्थात कभी में संस्कार रूप में विद्यमान शक्ति लोग व्यवहार स्वास्थ्य तथा काव्य के आदि के पर्याय लोचन से उत्पन्न निपुणता और काव्य मार्ग को जानने वाले गुरु की शिक्षा के अनुसार काव्य निर्माण का अभ्यास यह तीनों ही समस्त रूप से काव्य के हेतु हैं उनसे पहले भामा ने केवल प्रतिभा को दंडी और औरत ने प्रतिभा शास्त्र ज्ञान तथा अभ्यास तीनों को वामन ने लोक व्यवहार विद्या और प्रक्रिया भी परिचय को तथा राजशेखर ने समाधि और अभ्यास से उत्पन्न शक्ति को काव्य हेतु माना था आनंद वर्धन ने विपत्ति और प्रतिभा दोनों को काव्य हेतु मानते हुए भी प्रतिभा को विशेष महत्व दिया था पंडितराज जगन्नाथ में प्रतिभा को ही काव्य काहे तू माना है

 हिंदी के आलोचक

#डॉ०_नामवर_सिंह 
हिंदी के मार्क्सवादी समीक्षकों में डॉ० नामवर सिंह का विशिष्ट स्थान है । रचना विशेष के ऐतिहासिक संदर्भ, उसमें अंतर्निहित विचारधारा तथा उसके रूपबंध और कला-चेतना को परखने की इनकी क्षमता निर्विवाद है । इनकी प्रथम कृति #हिंदी_के_विकास_में_अपभ्रंश_का_योग #1952 ईस्वी में प्रकाशित हुई थी । शोध कृति होने पर भी इसमें तथ्यान्वेषण की तुलना में इनकी प्रगतिशील समीक्षा दृष्टि ही उभर कर सामने आई थी ।
सन् #1955 में इनकी #छायावाद पुस्तक प्रकाशित हुई । इसमें छायावाद के काव्य सौंदर्य का विवेचन करते हुए इन्होंने प्रतिपादित किया है- "यह सारा सौंदर्य व्यक्ति की स्वाधीनता की भावना से उत्पन्न हुआ है और वह स्वाधीनता भी व्यक्ति के माध्यम से संपूर्ण समाज की स्वाधीनता की अभिव्यक्ति है ।
सन् #1957 ईस्वी में इनकी #इतिहास_और_आलोचना पुस्तक प्रकाशित हुई इसमें सन् 1952 का लिखा हुआ एक निबंध है- "इतिहास का नया दृष्टिकोण । इतिहास का नया दृष्टिकोण अर्थात् ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण । इस दृष्टिकोण की विशेषता है- इतिहास के अध्ययन के लिए द्वंद्वात्मक प्रणाली का प्रयोग ।
#सन् 1962 ईस्वी के आस-पास नामवर सिंह की #आधुनिक_साहित्य_की_प्रवृत्तियां पुस्तक प्रकाशित हुई । इसमें आधुनिक हिंदी साहित्य की चार प्रमुख प्रवृत्तियों #छायावाद #रहस्यवाद #प्रगतिवाद और #प्रयोगवाद का विवेचन किया गया है ।

नामवर सिंह #नई_कहानी के भी मर्मी समीक्षक थे । उनकी "कहानी : नई कहानी" पुस्तक में 1958 से 1965 ईस्वी के बीच लिखे गए कहानी-समीक्षा संबंधी निबंध संग्रहीत हैं ।
सितंबर सन् #1964 ईस्वी में नामवर सिंह ने मुक्तिबोध की महत्वपूर्ण कृति "एक साहित्यिक की डायरी" की । समीक्षा की इस समीक्षा में उन्होंने यह स्थापित किया कि डायरी की सबसे बड़ी उपलब्धि एक विलक्षण व्यक्तित्व है, जो अंततः पूरी डायरी से उभर कर सामने आता है ।
#1968 में नामवर सिंह की प्रसिद्ध कृति #कविता_के_नए_प्रतिमान प्रकाशित हुई । इसकी भूमिका में नामवर सिंह ने लिखा- "यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि 'कविता के नए प्रतिमान' के केंद्र में मुक्तिबोध हैं । इसी क्रम में उन्होंने यह भी कहा कि - "नई कविता में मुक्तिबोध की स्थिति वही है जो छायावाद में निराला की थी ।"
सन् #1982 ईस्वी में नामवर सिंह की पुस्तक #दूसरी_परंपरा_की_खोज प्रकाशित हुई । यह पुस्तक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को केंद्र में रखकर लिखी गई है । इसमेंं आचार्य द्विवेदी द्वारा संकेतिक उस मौलिक इतिहास दृष्टि को प्रतिष्ठित करने की चेष्टा की गई है जिसके आधार पर आचार्य द्विवेदी ने भारतीय संस्कृति और साहित्य की लो कौन मुखी क्रांतिकारी परंपरा को जीवित करने का प्रयत्न किया था । उनके अनुसार - " नई कविता के बाहर जो पर दूसरी परंपरा है, उसके वाहक नागार्जुन और त्रिलोचन हैं । नामवर सिंह की पुस्तक 'वाद विवाद संवाद' 1989 ईसवी में प्रकाशित हुई । इसमें समकालीन भाषा साहित्य और आलोचना कर्म की बुनियादी चिंताओं से संबंधित विषयों जनतंत्र और समालोचना, आलोचना की स्वायत्तता, आलोचना की संस्कृति और संस्कृति की आलोचना, कविता की राजनीति, आलोचना और संस्था, आलोचना की भाषा, प्रगतिशील साहित्य धारा में अंंध-लोकवादी रुझान पर विचार किया गया है ।

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भाषा विज्ञान एवं हिंदी भाषा

भाषा विज्ञान का नामकरण 
भाषा विज्ञान को पश्चात देशों में कई नाम दिए गए हैं । सर्वप्रथम इसे कंपैरेटिव ग्रामर नाम दिया गया । इस नाम को अधिक शुद्ध ना मानकर कंपैरेटिव फिलालाजी नाम दिया गया । इसके लिए ग्लासोलाॅजी का प्रयोग डेविस ने 1817 में प्रस्तुत किया । इसी प्रकार 1841 ईसवी में प्रिचर्ड द्वारा ग्लाटोलाॅजी नाम भी प्रस्तुत किया गया । फिलोलॉजी शब्द आज तक प्रचलित है । अंग्रेजी में इसे साइंस ऑफ लैंग्वेज कहा जाता है । फिलोलॉजी शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों को मिलाकर बना है । फिलो-ग्रीक, फिलोस (प्रेमी या प्रिय) लॉजी-ग्रीक लोगिया एवं लैटिन भाषा की लोगिया (ज्ञान की शाखा या विज्ञान) शब्दों के मेल से बना है । फिलोलॉजी शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1386 भी मिलता है, परंतु भाषा विज्ञान अर्थ में इसका प्रयोग 18वीं शताब्दी के दूसरे दशक से ही मिलता है ।


भाषा विज्ञान की परिभाषा 
भाषा विज्ञान और विज्ञान है जिसमें भाषा का सर्वांगीण विवेचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है ।

भाषा विज्ञान का क्षेत्र 
भाषा विज्ञान का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है । भाषा विज्ञान का संबंध किसी एक भाषा से नहीं है, इसका संबंध मानव मात्र की भाषा से । विश्व की समस्त भाषाएं भाषा विज्ञान के क्षेत्र में आती है । समस्त भाषाओं का विवेचनात्मक अध्ययन, विश्लेषण, उनकी उत्पत्ति और विकास तथा उनकी परस्पर तुलना आदि भाषा विज्ञान के अंतर्गत आते हैं । भाषा विज्ञान के क्षेत्र में केवल साहित्यिक भाषाओं का ही नहीं अध्ययन होता, अपितु असभ्य, अर्धसभ्य एवं ग्रामीण लोगों की बोलियों का भी विशेष सावधानी के साथ अध्ययन किया जाता है ।

भाषा विज्ञान के अंग 
भाषा विज्ञान के चार प्रमुख अंग विकसित हुए हैं :
1.ध्वनि विज्ञान -  इसमें भाषा के मूल तत्व ध्वनि का व्यापक अध्ययन किया जाता है ।
2.पद विज्ञान -  अनेक ध्वनियों के समन्वय से पद या शब्द बनता है । पद विज्ञान को रूप विज्ञान, रूप विचार और पद विचार भी कहा जाता है ।
3.वाक्य विज्ञान - पदों के समन्वय से वाक्य बनता है । वाक्य विज्ञान को वाक्य विचार, वाक्य रचना शास्त्र भी कहा जाता है । वाक्य विज्ञान को तीन भागों में विभक्त किया गया है :
(अ) वर्णनात्मक वाक्य विज्ञान (ब) ऐतिहासिक वाक्य विज्ञान (स) तुलनात्मक वाक्य विज्ञान
4.अर्थ विज्ञान - अर्थ विज्ञान को अर्थ विचार भी कहते हैं । इसमें पर्यायवाची शब्द, नानार्थक शब्द, विलोम शब्द आदि का विवेचन किया जाता है ।

भाषा विज्ञान की शाखाएं 
भाषा विज्ञान की तीन शाखाएं हैं :
1.वर्णनात्मक भाषाविज्ञान - इसमें किसी एक भाषा का किसी काल विशेष से संबंध शुरू प्रस्तुत किया जाता है । जैसे- संस्कृत, ग्रीक, लाइटिंग और अंग्रेजी आदि का प्राचीन साहित्य उपलब्ध है । वर्णनात्मक विवेचन में उसका ध्वनि विज्ञान, रूप विज्ञान, वाक्य विज्ञान और अर्थ विज्ञान की दृष्टि से विवेचन किया जाता है ।
2.ऐतिहासिक भाषा विज्ञान -  इसमें भाषा के क्रमिक विकास का इतिहास प्रस्तुत किया जाता है इसमें कम से कम 2 कारों का क्रमिक विकास दिखाना आवश्यक है । उदाहरणार्थ- वैदिक संस्कृत से लेकर पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि के रूप में परिवर्तित होते हुए वर्तमान हिंदी आदि भाषाओं का क्रमिक विकास इस ऐतिहासिक भाषा विज्ञान का विषय होगा ।
3.तुलनात्मक भाषा विज्ञान -  इसमें दो या अधिक भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है । यह तुलना किसी एक काल विशेष या अनेक कालों के आधार पर की जाती है । इसमें भाषा की ध्वनियाँ, पद और वाक्य सभी दृष्टि से तुलना की जाती है । इसमें वर्णनात्मक और ऐतिहासिक प्रणालियों का भी अंतर्भाव होता है । संस्कृत, लैटिन और ग्रीक की तुलना ने ही इस तुलनात्मक भाषा विज्ञान को जन्म दिया है ।

भाषा विज्ञान की अध्ययन पद्धतियाँ 
1.वर्णनात्मक पद्धति - वर्णनात्मक पद्धति भाषा विज्ञान को समकालीन या एक कालिख भी कहते हैं । इसके अंतर्गत किसी भाषा के रूप का बिना तुलना या ऐतिहासिक विकास दिखाए, किसी एक समय का विश्लेषण किया जाता है। 2.संरचनात्मक पद्धति - संरचनात्मक पद्धति में भाषा के विभिन्न तत्वों के पारस्परिक संबंधों का अध्ययन किया जाता है ।
3.प्रायोगिक पद्धति - इस पद्धति में यांत्रिक प्रयोगों के द्वारा उच्चारण आत्मक सोन विज्ञान भौतिक विज्ञान व श्रवण आत्मक सोन विज्ञान का अध्ययन किया जाता है । इसे प्रायोगिक स्वर्ण विज्ञान भी कहा जाता है ।
4.ऐतिहासिक पद्धति - इस पद्धति में विभिन्न कालों में भाषा की प्रकृति में आए परिवर्तनों पर विचार या उनके संबंध में सिद्धांतों का निर्माण किया जाता है ।
5.तुलनात्मक पद्धति - इस पद्धति में किसी एक भाषा के काल को निश्चित करके उसके साथ दूसरी भाषाओं की तुलना की जाती है । इसमें कम से कम दो भाषाओं का होना आवश्यक होता है ।

भाषा की परिभाषा 
"भाषा यादृच्छिक वाचिक ध्वनि संकेतों की वह पद्धति है, जिसके द्वारा मानव परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करता है ।"
1.भाषा एक पद्धति है 
2.भाषा संकेतात्मक है 
3.भाषा वाचिक ध्वनि संकेत है 
4.भाषा यादृच्छिक संकेत है 

भाषा के विभिन्न रूप 
1.मूल भाषा - मूल भाषा काल्पनिक है । जैसे-  इंडोयूरोपियन या भारोपीय मूल-भाषा की कल्पना ।
2.परिष्कृत भाषा -  इसे स्तरीय भाषा स्टैंडर्ड भाषा आदर्श भाषा या टकसाली भाषा भी कहते हैं यह भाषा का आदर्श रूप होता है साहित्यिक रचनाएं इसी में होती हैं । शासन, शिक्षा या शिक्षित वर्ग में इसका ही प्रयोग होता है । भाषा का व्याकरण इसी को आधार मानकर बनाया जाता है ।
3.विभाषा -  आदर्श भाषा के अंतर्गत अनेक विभाषाएँ होती हैं ।  भौगोलिक आधार पर एक भाषा की अनेक विभाषाएँ होती है । प्रांतीय आधार पर स्वीकृत भाषाओं को विभाषा की श्रेणी में रखा जाता है । जैसे- पंजाबी, गुजराती, मराठी, बंगला, उड़िया, असमी आदि ।
4.बोली -  जो भाषाएँ प्रांतीय स्तर पर स्वीकृत न होकर मंडलीय स्तर पर स्वीकृत रहती हैं तथा जिनमें साहित्यिक रचनाएँ भी विद्यमान रहती हैं, उन भाषाओं को बोली की श्रेणी में लिया जाता है । जैसे हिंदी की बोलियाँ ब्रज, अवधी, कुमाऊनी, बुंदेली, भोजपुरी आदि ।
5.व्यक्तिगत बोली -  यह भाषा की सबसे छोटी इकाई है । एक व्यक्ति की भाषा को व्यक्तिगत बोली कहते हैं ।
6.अपभाषा -  अशिष्ट, असभ्य और अपरिष्कृत भाषा को अपभाषा नाम दिया जाता है ।
7. विशिष्ट भाषा -  विभिन्न व्यवसायों के आधार पर भाषा के अनेक रूप समाज में दृष्टिगोचर होते हैं । जैसे- किसान, मजदूर, लोहार, दर्जी, शिक्षक, वकील, डॉक्टर, पुरोहित, मुल्ला, पादरी आदि की अपने व्यवसाय के अनुसार अलग-अलग शब्दावली होती है । इसी प्रकार विभिन्न विषयों राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, वाणिज्य, मनोविज्ञान और विभिन्न विज्ञानों की अपनी विशिष्ट शब्दावली होती है ।
8.कूट भाषा -  कूट भाषा का उपयोग मनोरंजन के लिए किया जाता है । इसमें कुछ विशिष्ट शब्दों का विशेष अर्थ में प्रयोग होता है जो उन संकेतों को जानता है वही उसका अर्थ समझ सकता है । इस प्रकार की भाषा का प्रयोग राजनीतिज्ञों, विद्रोहियों, क्रांतिकारियों, चोरों और डाकूओं आदि में प्रचलित होता है ।
9.कृत्रिम भाषा -  कृत्रिम भाषा परंपरागत नहीं है । यह भाषा की शुद्धता और सुगमता को लक्ष्य में रखकर बनाई जाती है । इस दृष्टि से डॉक्टर जमेनहाफ की बनाई इस पर इन तो भाषा विश्व में सबसे अधिक प्रसिद्ध है ।


भाषा का द्विविध आश्रय 

भाषा विज्ञान की दृष्टि से भाषा के दो आश्रय होते हैं -
1.वक्ता 2.श्रोता 
1. वक्ता - किसी वस्तु को देखकर मानव के हृदय में कुछ भाव जागृत होते हैं । उनको वह शाब्दिक रूप से प्रकट करना चाहता है । इसके लिए भाषा का आश्यर लेता है । सर्वप्रथम उसके मन में विचार आता है, जिसे हम प्रत्यय कहते हैं । उसको सात्विक बिम्ब में परिवर्तित किया जाता है । पुनः उसे वाग्यंत्र द्वारा ध्वनित किया जाता है । यह भाषा का अभिव्यक्ति पक्ष है । 

2.श्रोता - प्रत्यय के आधार पर जो शब्दबिंब ध्वनि-प्रक्रिया के द्वारा उच्चरित हुआ है, वह ध्वनि-तरंगों के माध्यम से श्रोता तक पहुंचता है । श्रोता की कर्णेंद्रिय उसको ग्रहण करके ध्वनि के रूप में परिवर्तित करती है और वह श्रोता के मन में प्रत्यय या संकेत उत्पन्न करता है । इससे ही श्रोता को बोध होता है ।

 भाषा के 3 पक्ष भाषा विज्ञान के प्रसिद्ध फ्रेंच विद्वान प्रोफेसर सोसुर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक पूर्व लिंग स्टिक जनरल भाषा के तीन पक्षों का उल्लेख किया है : व्यक्तिगत पक्ष, सामाजिक पक्ष और सार्वभौम पक्ष 
1. वैयक्तिक पक्ष - इसको उन्होंने 'पारोल' कहा है । अंग्रेजी में इसके लिए 'स्पीच' शब्द का प्रयोग होता है । इसको 'व्यक्तिवाक्' कहा जाता है ।
2.सामाजिक पक्ष - भाषा का सामाजिक पक्ष ही प्रमुख है ।सामाजिक परिवेश में आकर ही भाषा का स्वरूप निखरता है ।भाषा के सामाजिक रूप को द सोस्यूर ने 'लॉन्ग' नाम दिया है । इसके लिए अंग्रेजी में 'टंग' शब्द प्रचलित है । इसको 'समष्टि वाक्' कहा जाता है ।

3.सार्वभौम पक्ष - द सोस्यूर ने भाषा के सार्वभौम पक्ष की भी स्थापना की है । उन्होंने इसको लांगाज नाम दिया है । इसे विश्ववाक् नाम दिया जाता है । यह भाषा का सामान्य एवं सार्वभौम पक्ष है ।

 भाषा और वाक् में अन्तर

1.भाषा सूक्ष्म एवं भावात्मक वस्तु है, वाक स्थूल और भौतिक वस्तु है । 
2.भाषा स्थायी है वाक् अस्थायी है । 
3.भाषा कूटस्थ है, भावात्मक है, सूक्ष्म और अनिर्वचनीय है, वाक् भाषा के प्रकाशन का माध्यम है । 
4.भाषा को स्फोट और वाक् को नाद कहते हैं ।
5.भाषा साध्य है वाक् साधन ।
6.भाषा के बोध पक्ष को 'भाषा' कहते हैं और उच्चारण एवं श्रवण पक्ष को वाक् ।
7.भाषा अनुभूति भाव और विचार के रूप में स्थायी है और वाक् उच्चारण के साथ नष्ट होती रहती है ।
8.भाषा ज्ञान की समष्टि है और वाक् उसकी अभिव्यक्ति ।

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उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग 
राजकीय इंटर कॉलेज प्रवक्ता परीक्षा 2009 

*काल की अक्रूर वृकुटी विलास तुम्हारा ही परिहास नमक पंक्ति पंत की परिवर्तन कविता का आंसर 
*अब पहुंची चपला बीच धार छिप गया चांदनी का का घर सुमित्रानंदन पंत की कविता नौका विहार से 
*निराला के राम तुलसीदास के राम 7 और भभूति के राम के निकट है या कथन डॉक्टर रामस्वरूप चतुर्वेदी का है 
*राम की शक्ति पूजा में निराला की दो कविताओं तुलसीदास और सरोज स्मृति का सार तत्व समाहित है 
*सूर्यकांत त्रिपाठी निराला नए संवाद शैली का सर्वाधिक प्रयोग किया है 
*व्यवस्था प्रियता और विद्रोह का विलक्षण संयोग मुक्तिबोध में सबसे अधिक मिलता है 
*ज्यामितीय संगति गणित की दृष्टि से कृत भव्य नैतिक मान आत्म चेतस सच में नैतिक मान अतिरिक्त वादी पुणे ताकि तृप्ति करना कब राह आसान नामक पंक्तियां मुक्तिबोध की ब्रह्मराक्षस कविता से ली गई है 
*वह उस महत्ता का हम शरीफों के लिए उपयोग उस आंतरिक ताका बताता मैं महत्व पंक्तियां मुक्तिबोध की ब्रह्मराक्षस कविता से ली गई है 
*ऋतु बसंत का सुप्रभात था मंद मंद था अनिल बहरा बाला रुड़की मृदु कीड़े थी अगल-बगल स्वर्ण शिखर थे यह पंक्तियां नागार्जुन की बादल को घिरते देखा है कविता की हैं
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