देशप्रेम (संभाषण संग्रह)


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                                  देशप्रेम

          राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याओं पर आधारित
                              संभाषण संग्रह 



                                   लेखक 
                         देवचन्द्र भारती 'प्रखर'  



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                               1. देशप्रेम

'देशप्रेम' शब्द हम लोगों के लिए अनजान नहीं है । हम सदैव अपने गुरुजनों से, मित्रों से अथवा सगे - संबंधियों से देशप्रेम शब्द को सुनते हैं और देशप्रेम के विषय में कविताएं-कहानियां भी सुनते हैं । किंतु देशप्रेम से भरी कविताएं और कहानियां हमारे मन में अनेक प्रश्न छोड़ जाते हैं । माता-पिता से प्रेम, भाई-बहन से प्रेम, मित्रों-रिश्तेदारों से प्रेम तो ठीक है, पर यह देश से प्रेम क्या है ? देश कोई आदमी या औरत नहीं । सुनते हैं, यह बहुत बड़ा है । इसमें अनेक प्रदेश हैं । अनेक नदियां, पहाड़ और जंगल हैं । इसे हम केवल नक्शे में देखे हैं । हमें समझ में नहीं आता, हम इसे कैसे प्रेम करें ? हमारे गुरुजन बताते हैं कि देश से प्रेम करने का मतलब, देश के लोगों, नदियों, पहाड़ों, जंगलों आदि सभी से प्रेम करना । लेकिन जब देश के लोग हमसे प्रेम ना करें, तो हम देश के लोगों से कैसे प्रेम करें ?

हम उनसे क्यों इजहार करें ?
हम उनसे क्यों इकरार करें ?
वे हमसे मिलते नहीं 'प्रखर',
तो हम उनसे क्यों प्यार करें ?

इस पर हमारे गुरुजन बताते हैं कि जब हम दूसरे को प्रेम करेंगे तभी दूसरा हमें प्रेम करेगा । जब हम दूसरे से प्यार से बोलेंगे तभी दूसरा हमसे प्यार से बोलेगा । किंतु कभी ऐसा भी होता है कि प्रेम के बदले प्रेम नहीं मिलता । तब हमारे गुरुजन बताते हैं कि इस संसार में सभी लोग एक जैसे नहीं हैं । हमें औरों के खट्टे व्यवहार से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए ।

अतः हम शपथ लेते हैं कि अपने गुरुजनों की आज्ञा का पालन करेंगे और अपने कर्तव्य से कभी भी किसी भी हाल में विचलित नहीं होंगे ।

देश की खातिर हमेशा काम करेंगे,
अपने देश का दुनिया में नाम करेंगे ।
आज से हम अपने आजाद भारत का, 
अपने आप को 'प्रखर' गुलाम करेंगे ।।

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                    2. राष्ट्रीय प्रतीकों का संदेश 

हम जानते हैं कि भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है । तिरंगे में तीन रंग है । सबसे ऊपर केसरिया है, जो वीरता और पराक्रम का प्रतीक है । सबसे नीचे हरा है, जो हमारी धरती की हरियाली का संकेत करता है । बीच में सफेद रंग हमें सच्चाई और सादगी का संदेश देता है और उसमें बना हुआ चक्र गतिशीलता का प्रतीक है । जबकि चक्र की 24 तीलियां हमें चौबीसों घंटे देश सेवा के लिए तैयार रहने का संकेत करती हैं ।

थामो तिरंगे को यह बलवान बना देगा, 
बूढ़े को भी दम देकर जवान बना देगा ।
'प्रखर' अगर इसके संदेशों को समझ ले,
तो जानवर को भी यह इंसान बना देगा ।।

भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ (चितकबरा) है, जो बहादुरी और फुर्ती का प्रतीक है । भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर है, जो मधुर भाषी है और मधुर बोलने का संदेश देता है ।

काबिले तारीफ होता जब कोई बलवान हो, 
काबिले शोहरत होता जब कोई धनवान हो ।
मीठे बोल हर किसी की ख्वाहिश होती है 'प्रखर'
काबिले इज्जत होता जब मीठी जुबान हो  ।।

भारत का राष्ट्रीय फूल कमल हार्दिक स्वच्छता का प्रतीक है और भारत का राष्ट्रीय फल आम मधुर स्वभाव का प्रतीक है । भारत का राष्ट्रीय चिन्ह अशोक स्तंभ चारों दिशाओं में भारत का नाम रोशन करने का संदेश देता है तथा राष्ट्रीय वृक्ष बरगद परोपकार और सेवा करने की शिक्षा देता है ।

हम भारतवासियों का कर्तव्य है कि हम अपने राष्ट्रीय प्रतीकों से सीख लेकर अपने व्यवहारिक जीवन में प्रयोग करें और एक सच्चा भारतवासी होने का गौरव प्राप्त करें ।

जीना छोड़ दो जानवर की तरह, 
मरना छोड़ दो जानवर की तरह ।
'प्रखर' इंसान हो इसलिए हरकतें, 
करना छोड़ दो जानवर की तरह ।।

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                       3. आजादी की कुर्बानी 

गुलाम भारत को आजाद करने में कितनी जिंदगियां कुर्बान हो गई, इसकी कोई गिनती नहीं । कितनों का घर कब्रिस्तान हो गया तो कितनों का घर श्मशान हो गया । कितनों की लाशों को कफ़न नहीं मिला तो कितनों की लाशों का दफन नहीं हुआ । कितनों की लाशों को चील, कौवे नोच कर खा गए तो कितनों की लाशें पड़ी-पड़ी सड़ती-गलती रही । जो आजादी की जंग में तड़प कर मर गए, वे तो अमर हो गए । मगर जो जंग में हाथ-पांव खो कर जिंदा रह गए, उनकी जिंदगी मौत से भी बदतर हो गई ।

मुल्क की खातिर जो जिंदा लाश बन गए,
मरते हुए मुल्क की वे सांस बन गए ।
जीते जी तो कुछ नहीं वे पा सके 'प्रखर',
मगर मरकर भारत का इतिहास बन गए ।।

आजादी की जंग में कितनों की मांग सुनी हो गई तो कितनों की गोद सूनी हो गई । कितने ही बच्चे अनाथ होकर सड़कों पर भीख मांगने के लिए मजबूर हो गए तो कितनी ही किशोरियों की आबरू खिलवाड़ बन गई । जबकि कितनों ने अपनी आबरू बचाने के लिए अपने को जिंदा जला दिया ।

आबरू की खातिर जल गईं जो आग से, 
जिस्म जलाकर बचाई जिस्म दाग से ।
उनकी याद से कितने चिराग जल गए,
'प्रखर' रोशन हो गया भारत चिराग से ।।

आखिर उनकी कुर्बानी बेकार नहीं गई और सारा भारत विदेशी शासकों के खिलाफ बगावत कर बैठा; जिसका परिणाम है आज का भारत यानि कि आजाद भारत

मिली है आजादी इसे खोने नहीं देना, 
अपनी जमीर को फिर कभी सोने नहीं देना ।
गुलामी का जहर बहुत ही कड़वा होता है 'प्रखर' 
भारत को गुलाम फिर होने नहीं देना ।।

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                          4. आजादी की खुशी

15 अगस्त 1947 को जब हमारा देश आजाद हुआ था तब लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं था । लोग ढोल बजा - बजाकर उछल उछल कर नाच रहे थे । कोई अपनी बहादुरी की डींगे हाँक रहा था, कोई भांग खाकर लगातार हंसे जा रहा था, तो कोई झूमते हुए मस्ती में गाता जा रहा था । लोगों के घर अच्छे-अच्छे पकवान बन रहे थे । लोग एक दूसरे से प्रेम पूर्वक खुशी से ऐसे मिल रहे थे जैसे होली या ईद का त्यौहार हो । वास्तव में वह तो होली और ईद से भी बड़ा त्यौहार था, जिसमें धर्म, संप्रदाय को कोई स्थान नहीं था । ऐसा त्यौहार जिसे राष्ट्रीय त्यौहार का नाम दिया गया ।

पा करके खुशी कितने तो सुधि - बुधि ही खो पड़े
खा कर के भांग कितने चौराहे पर सो पड़े ।
कितने तो दर्द गुलामी के सोचते रहे प्रखर 
कितने तो सरेआम हंसते - हंसते रो पड़े ।।

जिस समय देश में खुशी मनाई जा रही थी, उसी समय देश के कुछ क्षेत्रों में सन्नाटा पसरा हुआ था । ऐसा नहीं था कि वहां इंसान नहीं थे; इंसान तो थे मगर मरे हुए; शरीर से नहीं, मन से - हृदय से । ये सभी वे लोग थे, जिन्हें अछूत दलित शोषित के नाम से जाना जाता था । भूख से जिनके पेट और पीठ चिपक कर दोनों एक हो गए थे । जिनकी हड्डियों का ढांचा स्पष्ट झलक रहा था । जिन्हें देखकर कोई भी हड्डियों की गिनती कर सकता था । जिनके बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे और जिनके होठों पर केवल एक ही नाम था 'रोटी' । वह तो ना ही रो सकते थे, ना ही हँस सकते थे, क्योंकि हंसने या रोने के लिए भी ऊर्जा की आवश्यकता होती है और उर्जा भोजन से मिलती है देश भक्ति भाषण से नहीं ।

जो दर-दर की ठोकरें खाता फिरे सदा, 
उसके लिए दुनिया में भगवान कहां है ?
जो भूखे ही जागता और सोता है 'प्रखर' 
पेट को छोड़कर उसका ध्यान कहां है ?

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                      5. संविधान और गणतंत्र 

सन् 1947 में जब देश अंग्रेज शासकों के शासन से आजाद हो गया, तब देश के बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों को देश चलाने की चिंता सताने लगी । देश के सभी राजनेता और विज्ञजन एकत्रित हुए और उन्होंने विचार किया कि हमारे देश की शासन प्रणाली लिखित हो, जो राजतंत्र पर आधारित न होकर लोकतंत्र अर्थात गणतंत्र पर आधारित हो । ऐसे विधान की पुस्तक यानि संविधान की रचना करने के लिए विद्वानों की एक सभा का आयोजन हुआ, जिसके अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद थे । सभा में उपस्थित विद्वानों और राजनेताओं के अनुसार एक संविधान समिति का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर हुए । उस दिन से संविधान समिति के अध्यक्ष अंबेडकर के निर्देशों पर संविधान की पुस्तक लिखी जाने लगी, जिसके पूरा होने में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन का समय लगा । जिसे 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा में प्रस्तुत किया गया और 26 जनवरी सन 1950 को संविधान पूरे देश में लागू कर दिया गया ।

नया नियम चल उठा इस भारत देश में, 
हर कोई मचल उठा इस भारत देश में ।
लोकतंत्र लागू हुआ जिस समय 'प्रखर', 
घर - घर दीया जल उठा इस भारत देश में ।।

लोकतंत्र अर्थात् जनता शासन । लोकतंत्र के द्वारा भारतीय जनता को अपना शासक चुनने का अधिकार मिल गया । लेकिन कुछ समय बाद इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे । आज ग्राम प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री तक का चुनाव जाति धर्म और संप्रदाय के आधार पर हो रहा है । जिसके कारण देश में अनेकों अयोग्य व्यक्ति उच्च पदों पर आसीन हैं । आज देश में अनेकों शैक्षिक, सामाजिक, साहित्यिक, धार्मिक और राजनीतिक समस्याएं अपना प्रकोप दिखा रही हैं, किंतु जो संपन्न हैं, वे अपनी मस्ती में जीए जा रहे हैं और जो विपन्न हैं, वे जहर के घूंट पीए जा रहे हैं; क्योंकि हमारा भारत विकासशील है ।

देखिए कब रूप बदलता है वतन का ?
कब तलक स्वरूप बदलता है वतन का ?
जीते रहेंगे तो देखेंगे 'प्रखर' कि समय 
किसकी फल स्वरूप बदलता है वतन का ?



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             6. मातृभूमि और देशभूमि 

जिस भूमि पर हमारा जन्म हुआ हो उसे हम जन्मभूमि कहते हैं । जहां हमारा पालन-पोषण हुआ हो उसे हम मातृभूमि कहते हैं और जिस देश के हम नागरिक हों उस देश की भूमि को देशभूमि कहते हैं । कभी ऐसा होता है कि किसी व्यक्ति का जन्म कहीं और होता है, पालन कहीं और होता है तथा मृत्यु कहीं और होती है । इसलिए उसकी जन्म भूमि, मातृभूमि और मृत्यु भूमि अलग-अलग होती है । किंतु यदि वह अपने देश के भीतर ही हो तो उसकी देेशभूमि एक ही होती है । जैसे - कबीर दास की जन्म भूमि और मातृभूमि काशी है जबकि उनकी मृत्यु भूमि मगहर है, किंतु उनका जन्म - मरण भारत देश में ही हुआ, इसलिए उनकी देशभूमि भारत है ।

जो व्यक्ति अपनी जन्मभूमि या मातृभूमि को बेचकर कहीं और बस जाता है, उसके हृदय में अपनी जन्मभूमि या मातृभूमि के प्रति प्रेम नहीं होता । परिस्थितियां चाहे जैसी भी हो किंतु अपनी जन्मभूमि से सच्चा प्रेम करने वाला उसे बेच नहीं सकता । क्योंकि जन्मभूमि मां समान होती है और एक सपूत अपनी मां को नहीं बेच सकता; ऐसा करने वाला कपूत ही होगा ।

मातृभूमि का आदर करना है पहचान सपूतों की ।
'प्रखर' बेच दे मातृभूमि को ऐसी सोच कपूतों की ।।

भूमि के लिए जितने रक्त बहे हैं उतने रक्त अन्य किसी भी चीज के लिए नहीं बहे हैं । भारत में राजाओं - महाराजाओं का एक दूसरे पर आक्रमण तथा चीन और पाकिस्तान द्वारा भारत पर किए गए आक्रमण, इसके प्रमाण हैं । फिर भी कुछ घमंडी धनवान सोने - चांदी के आगे धरती की कीमत नहीं समझते । जरा सी माटी लगने पर बवाल खड़ा कर देते हैं । भूल जाते हैं कि उनकी चमकती हुई शरीर भी माटी की ही है ।

माटी के ही दम से है सोने सा ये बदन
माटी अगर ना होती कैसे पाते भोजन ?
माटी से ही ईंट बनी ईंट से मकान
'प्रखर' माटी के ऊपर ही करते हैं शयन ।।



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                        7. तिरंगे की मर्यादा 

जिस समय भारतवर्ष पराधीन था, उस समय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को खुलेआम फहराने का अधिकार नहीं था । तिरंगे की मर्यादा को बनाए रखने के लिए कितने ही वीर शहीद हो गए । जब किसी ने तिरंगे पर थूका, उसका मुंह फोड़ दिए । जब किसी ने तिरंगे को पैरों से रौंदा, उसका पैर तोड़ दिए । यहां तक कि तिरंगे को जमीन पर गिरने से बचाने के लिए कितने ही वीर हंसते-हंसते बारूद में जल गए । गोलियों से सीना छलनी हो गया मगर तिरंगे को झुकने नहीं दिए ।

तिरंगा है निशान वीरों के जुनून का 
जिनको नसीब हो सका न पल सुकून का 
इस तिरंगे के रंगों पर अमल करो प्रखर 
तिरंगे में सबसे ऊपर है रंगून का 

जिस तिरंगे की मर्यादा के लिए भारत के सपूत शौक से अपने बदन की बोटी - बोटी विलायती कुत्तों से निकालिए । वही तिरंगा आज बाजारों में एक रुपए की कीमत पर बिक रहा है । छोटे-छोटे बच्चे 15 अगस्त, 26 जनवरी पर तिरंगा खरीदते हैं और उसकी प्लास्टिक की डण्डी पकड़कर झुमाते हुए, घुमाते हुए, मोड़ते हुए, मरोड़ते हुए विद्यालय जाते हैं, राष्ट्रीय पर्व मनाते हैं । लौटते समय तिरंगे से खेलते हुए फाड़ कर सड़क पर फेंक देते हैं । सड़क पर पड़ा हुआ तिरंगा कितने मनुष्य, कितने पशुओं, कितने पक्षियों, कितने कीड़ों के पांव से रौंदा जाता है, इस पर कोई अमल नहीं करता । यही नहीं, तिरंगे की टोपी बिक रही है, तिरंगे का स्टीकर बिक रहा है, तिरंगे का गुब्बारा बिक रहा है, तिरंगे का बिल्ला बिक रहा है और तिरंगे का बनियान भी बिक रहा है ।

शुक्र है कि तिरंगे का जूता नहीं बिक रहा है, नहीं तो, देशभक्ति का झूठा दिखावा करने वाले नकलची भारतवासी सरेआम तिरंगे को पैरों तले रौंदते नजर आते ।

अगर कोई चीज है खुदा के नाम की 
तो उससे बस यही है हमारी इल्तिजा ।
भारत वासियों को सही रास्ता दिखाएं 
'प्रखर' इन्हें सही रास्ता नहीं पता ।।


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                  8. असफलता और आत्महत्या 

यह जीवन एक सिक्के की तरह है जिस तरह सिक्के के दो पक्ष होते हैं और एक दूसरे को एक साथ नहीं देखा जा सकता, उसी तरह जीवन के दो पक्ष होते हैं । कभी दुख तो कभी सुख । कभी सफलता तो कभी असफलता; जीवन में मिलते रहते हैं । जिस प्रकार हम सुख को प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण करते हैं । उसी प्रकार हमें दुख को भी स्वीकार करना चाहिए । समयचक्र परिवर्तनशील है परिस्थितियों से हारना कायरों का काम है और कायरों के लिए जीवन हराम है । हमें अपने हृदय में कायरता को शरण नहीं देनी चाहिए । कायरता आशा और विश्वास की दुश्मन है तथा निराशा और संदेह जीवन के शत्रु हैं ।

जीता है हर आदमी उम्मीद के दम से,
मर जाता है आदमी बेकार वहम से ।
जीना मरना तो अपने ही हाथ है 'प्रखर',
जिंदगी और मौत हैं दुनिया के कदम से ।।

कुछ छात्र परीक्षा में असफल हो जाने पर आत्महत्या कर लेते हैं । ऐसे छात्रों को महमूद गजनवी से सीखना चाहिए जो 17 बार युद्ध में हारने पर भी हार नहीं माना था । खैर यह तो एक ऐतिहासिक उदाहरण है । हम अपने आसपास के एक छोटे से प्राणी अर्थात् चींटी पर ध्यान दें, तो पता चलेगा कि हम उन चीटियों की अपेक्षा क्या है ? हम आकार और बल के मायने में चीटियों को समझते हैं और वे इस मायने में तुच्छ हैं भी; किंतु जब श्रम और साहस की बात आती है, तो चीटियों के आगे हम चींटी हो जाते हैं ।

करता है बेकार ही गुमान ये इंसान,
काम करने में नहीं चींटी के भी समान ।
मेहनत करना सीख लो 'प्रखर' चींटी से,
पत्थर की लकीर जैसे हैं जिसके अरमान ।।

किसी कार्य या परीक्षा में असफल होने पर किसी व्यक्ति या छात्र के द्वारा आत्महत्या किए जाने का कारण मानसिक तनाव होता है । यह मानसिक तनाव उसका स्वयं की हीनता का अनुभव करना या पारिवारिक कलह होता है । कभी-कभी माता - पिता द्वारा बच्चों को बार - बार फटकारना भी ऐसी घटनाओं का कारण बन जाता है । अतः इन बातों पर हम सभी को ध्यान देना चाहिए ।


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                        9. राष्ट्रभाषा की गरिमा 

हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है । संविधान के अनुसार हमें अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान करना चाहिए । हम भले ही अन्य भाषाओं का ज्ञान अर्जन करें, किंतु दैनिक जीवन में अपनी राष्ट्रभाषा का प्रयोग करें, ताकि जीवंत रह सके । आज पूरा भारत हिंदी को पीछे छोड़कर, अंग्रेजी के पीछे पड़ा है । इससे अपनी राष्ट्रभाषा का सम्मान नहीं, अपमान होता है । भारत वासियों द्वारा अंग्रेजी को हिंदी से अधिक महत्व देना यह प्रमाणित करता है कि इन्हें राष्ट्रभाषा के प्रति प्रेम नहीं, अर्थात् इनमें देशप्रेम की भावना नहीं ।

हिंद की जनता हिंदी का तिरस्कार कर रही,
अंग्रेजों की भाषा का सत्कार कर रही ।
जनता तो एक भेड़ है इसको छोड़ो 'प्रखर'
यह हरकत तो भारत की सरकार कर रही ।।

सच तो यह है कि अंग्रेजी भाषा हिंदी से श्रेष्ठ तो दूर, हिंदी की बराबरी के भी योग्य नहीं है । हिंदी एक पूर्ण वैज्ञानिक भाषा है जबकि अंग्रेजी एक और अवैज्ञानिक भाषा है । अंग्रेजी के स्वर और व्यंजन का कोई एक उच्चारण निश्चित नहीं, जबकि हिंदी के प्रत्येक स्वर और व्यंजन का उच्चारण निश्चित है । उदाहरण स्वरुप हिंदी में 'आ' की मात्रा से केवल 'आ' ही होता है 'ए' या 'ऐ' नहीं, जबकि अंग्रेजी में 'जी-ए-टी-ई' 'गेट' होता है और 'सी-ए-टी' 'कैट' होता है । जिन लोगों को भाषाशास्त्र का ज्ञान नहीं, वे प्रश्न करते हैं कि यदि अंग्रेजी भाषा सर्वश्रेष्ठ नहीं तो  अंतर्राष्ट्रीय कैसे हो गई ? इसका उत्तर यही है कि अंग्रेज शासकों का पूरे विश्व पर साम्राज्य रहा है, जिसके कारण इनकी भाषा अंग्रेजी का प्रचार-प्रसार भी पूरे विश्व में है । क्षेत्र विस्तार के कारण ही अंग्रेजी को अंतर्राष्ट्रीय भाषा का पद दिया गया है ।

हिंदी सच्ची है और अच्छी भी अंदर से,
दुनिया में इसका असर है बाहर से कम सही ।
अंग्रेजी का असर भले ही दुनिया भर में है पर
सच यही है कि अंग्रेजी अंदर से कुछ नहीं ।।

हमारा कहना यह नहीं है कि भारतवासी अंग्रेजी का अध्ययन करना छोड़ दें । बल्कि यह कहना है कि हम अपने वार्तालाप में हिंदी का अधिकांश प्रयोग करें, जिससे आगामी पीढ़ी भी हिंदी सदा परिचित रहे । इस समय राष्ट्रभाषा को जीवित रखने के लिए अनेकों सरकारी कर्मचारी, समाजसेवी और साहित्यकार प्रयत्नशील हैं । समय-समय पर 'राजभाषा' पत्रिका का भी संपादन होता रहता है । अतः सभी भारतीयों से निवेदन है कि वे भी सहयोग प्रदान करें ।


10. भारत में जनसंख्या वृद्धि

इस विकासशील देश भारत में जनसंख्या वृद्धि एक प्रमुख समस्या है । बढ़ती हुई जनसंख्या के अनेक दुष्परिणाम सामने हैं । आज देश में जनसंख्या इतनी बढ़ गई है कि देश की फसलों, फलों और सब्जियों के उत्पादन से लोगों की आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो पा रही है । अनाजों की कमी के कारण महंगाई बढ़ रही है ।  हर खाने वाली चीज महंगी होती जा रही है । बाजारों में अनेक मौसमी फल दुकानों पर सजे होते हैं, किंतु खरीदारों की भीड़ नहीं दिखाई देती । अमीर लोग तो किस्म - किस्म के फलों का जायका ले लेते हैं, परंतु गरीबों को बस फलों के दर्शन से संतोष करना पड़ता है । जनसंख्या वृद्धि के कारण नगरों - महानगरों में जाम की समस्याएं बढ़ रही हैं । सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि हो रही है । गांव में जमीन के बंटवारे को लेकर भाई-भाई में जानलेवा युद्ध हो रहा है ।

तड़प रही देखो मानवता 'प्रखर' बढ़ी आबादी से ।
कौन बचाएगा भारत को अब ऐसी बर्बादी से ।

किसी भी समस्या का निवारण तभी हो सकता है, जब उसका कारण मालूम हो । जनसंख्या वृद्धि के कई कारण हैं कुछ लोग अशिक्षा को इसका मूल कारण मानते हैं जबकि जनसंख्या वृद्धि में शिक्षित लोगों ने भी भरपूर योगदान दिया है पहले नसबंदी की व्यवस्था नहीं होने के कारण जनसंख्या में वृद्धि होती रही, परंतु अब नसबंदी की व्यवस्था होने पर भी अधिकतर लोग महिलाओं की नसबंदी नहीं करा रहे हैं । धार्मिक अंधविश्वास के कारण मुस्लिम महिलाओं की नसबंदी नहीं कराई जाती और हिंदू लोग संतान को 'ईश्वर की देन' समझते हैं । कुछ देहाती लोग अपनी पारिवारिक ताकत बढ़ाने में ऐसी गलती कर बैठते हैं । कुछ लोग लड़कियां होने पर लड़के का इंतजार करने और कुछ लोग लड़के होने पर लड़की का इंतजार करने में भी अधिक संतानें पैदा करके देश की दुर्गति करने में हाथ बंटा रहे हैं ।

'प्रखर' लोग मनमाना ही कर्म कर रहे ।
धर्म के चक्कर में ही अधर्म कर रहे ।।

जनसंख्या वृद्धि के आधारभूत कारणों पर ध्यान न देकर भारत सरकार "छोटा परिवार सुखी परिवार" एवं "बीबी रखो टिप टॉप, दो के बाद फुलस्टॉप" के नारों से खानापूर्ति कर रही है । जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए लोगों की मानसिकता बदलनी होगी तथा मानसिकता बदलने के लिए धर्मों का परिष्कार करना होगा ।


































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