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बुधवार, 13 दिसंबर 2017

बौद्धिक छंद सुगंध



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                         बौद्धिक छंद सुगंध

      हिंदी के प्रसिद्ध व लोकप्रिय 20 छंदों में कविताएं 



                                 रचनाकार 
                           देवचंद्र भारती 'प्रखर'

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                                समर्पण

        बौद्धिक लौकिक वैज्ञानिक पथ के प्रदर्शक
        सम्यक सम्बुद्ध तथागत के पावन चरणों में        
                       श्रद्धापूर्वक समर्पित
                         
                                  तथा

                 श्रद्धेय पिताजी जयश्री प्रसाद
              एवं श्रद्धेया माताजी सुशीला देवी
                       के सम्मान में लोकार्पित


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                                आशीर्वचन 
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देवचंद्र भारती 'प्रखर' के काव्य सौष्ठव का आंकलन करने मात्र से ही ज्ञात हो जाता है कि इन्होंने हिंदी के सुप्रसिद्ध छंदों के साथ-साथ हिंदी साहित्य का भी गहन अध्ययन किया है । एक कवि होने के सााथ ही यह एक शिक्षक भी हैं, जो कि शिक्षा के क्षेत्र में विगत 8 वर्षों से कार्यरत हैं । यही कारण है कि इनकी कविताओं में उपदेशात्मक और प्रेरणात्मक भाावों की प्रधानता है ।

'प्रखर' जी की इस कृति के प्रकाशित होने के अवसर पर मैं इन्हें हार्दिक बधाईओं के साथ मंगल आशीष प्रदान करता हूं ।   

                                       ज्ञानेंद्र प्रसाद 

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एक रचनाकार के रूप में 'प्रखर' जी को मैं विगत 9 वर्षों से जानता हूं, जब यह इंटरमीडिएट के छात्र थे । उस समय, जब यह मेरे मार्गदर्शन में 'भोजपुरी बिरहा' लिखने के लिए उत्सुक थे, तब नमूने के तौर पर इनके द्वारा रचित कविताओं और गीतों को पढ़कर इनकी प्रखर प्रतिभा का मुझे बेहद आश्चर्य हुआ था । वर्ष 2013 से यह तथागत बुद्ध के उपदेशों और सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार का प्रचार - प्रसार भी पूरी लगन और निष्ठा से निरंतर करते आ रहे हैं ।

अब तक इनकी प्रकाशित कृतियां जिस प्रकार से लोकप्रिय हुई हैं, उनका प्रत्यक्ष प्रभाव देखकर मैं इनके उज्जवल भविष्य की हृदय से कामना करता हूं ।

                                       प्रबुद्ध नारायण बौद्ध 


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                                  अभिमत

दोहा, चौपाई, सोरठा तथा छोटी-छोटी तुकबंदियों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि थोड़ा सा भी ध्यान देकर सुना या पढ़ा जाए तो ये क्षण मात्र में बड़ी सरलता से कंठस्थ हो जाते हैं । मनोरंजक खेल अंत्याक्षरी में तो ये बड़े काम के होते हैं । साहित्य की यह विधा यत्र - तत्र बिखरी पड़ी है । प्राचीन काल, मध्यकाल, आधुनिक काल के कवियों और महापुरुषों की रचनाएँ, इस विधा में समाज को मिलती रही हैं । इसका अभाव वर्तमान में दिख रहा है । संत समाज में यह विधा वाणी के रूप में है और अध्यात्म जगत के लिए यह अमृत रस है । सामान्य जीवन में क्षण - प्रतिक्षण उद्घाटित होने वाले शब्द क्षणगेयता की छोटी-छोटी पंक्तियों में बंधकर रचना का रूप धारण कर लेते हैं ।

देवचंद्र भारती 'प्रखर' ने संसाधन विहीन ग्रामीण परिवेश में रहते हुए जो अनुभूति की उसे ही कलमबद्ध भी किया । स्थानीय बोली में शब्दों का प्रयोग बड़ी ही पटुता के साथ किया है, जिसका पुट इनके दोहों और छंदों में स्पष्ट परिलक्षित है । सरस प्रवाह के साथ छंदबद्ध हुए विचार मोतियों के समान हैं, जिनको कवि ने संकलित करके अपनी मनका में पिरो डाला है ।

मैं ईमानदारी से कह सकता हूं कि आने वाले दिनों में 'प्रखर' जी के रचित 'बोधि पुष्प' के पद लोगों की स्मृतियों में कंठस्थ होंगे ।

                                      दिनेशचंद्रा 
                               राजभाषा अधिकारी 
                   यूरोपियन कॉलोनी, मुग़लसराय, चंदौली


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                                 विषय सूची

क्र०सं०.          कविता                 पृष्ठ संख्या

  1.  दोहा              10
  2.  चौपाई            10
  3.  रोला              10
  4.  कुण्डलिया       4
  5.  बरवै              10
  6.  गीतिका           4
  7.  हरिगीतिका      2
  8.  आल्हा            6
  9.  त्रिभंगी            4
10.  इन्द्रवज्रा          6
11.  उपेन्द्रवज्रा        6
12.  भुजंगप्रयात      2
13.  सुन्दरी             2
14.  वंशस्थ             2
15.  वसन्ततिलका    2
16.  मालिनी            2
17.  मन्दाक्रान्ता       2
18.  शिखरिणी         4
19.  सवैया              4
20.  घनाक्षरी           4




💮💮💮💮💮💮

बोधि पुष्प ( दोहा छंद )

समझ सके जो सत्य को रखे सत्य का ध्यान ।
सज्जन है वही प्रखर जिसको सच्चा ज्ञान ।।

वेज बनाने से नहीं हो कोई गुणवान ।
पहलवान ना हो सके प्रखर थोड़ा के कान ।।

 ने लगे तो ना दिखे और गुड़ की बारात ।
प्रखर बंद मोह मेज पर काले पीले दांत ।।

बस 49 पद है प्रखर मुझे नहीं विचार ।
जो हाथी के पीठ पर बंदर है सवाल ।।

 दिखलाइए भ्रमण से हो ज्ञान तो ज्ञानी हो संसार ।
सबसे ज्ञानी प्रखर रोते भैसासुर ।।

 वर्तमान जब ठीक हो भूत नहीं हो याद ।
रखो भाई नदी बायना तालाब ।।

प्रखर देखता बस वही जिस पर रो पड़े प्रकाश ।
अंधेरे में ना कभी परछाई हो पास ।

प्रखर दूसरों को सभी देते रहते सीख ।
स्वयं शेखपुर जो चले वह शिक्षक है ठीक ।।

क्षमता सब में सामने ही रख विषम संसार ।
देवरी हल्की ज्योत देवल बड़ा झटका ।।

एक अकेला क्या करें प्रकृति आवास
एक जान संसार में क्रीम झाली रात ।

 को सम्मान करते सदाराम ।
लाखों तारे तारे का नाम ।

निश्चय करोड़ों रस्सी जल जाए पहेलियां बसंत

मुझे बहुत यशवंत
एक पहेली जिंदगी जो मुझे वसंत ।

उठेगा जब शोर हो तब सच्चा हो माउन ।
प्रकृति दोनों के बीच में लड़कों पर के कौन ।।

देखदे की दुर्दशा मुंह से निकला हाय ।
 शहर घूमने मूर्तियों पर खरीदे हैं बुलाए ।

शो मूर्खों के संग में रहकर रहे अमूर्त ।
ढाई अक्षर का घड़ा किए प्रखर रोमु ।।

लस का रसूख कर भक्त बने हैं लोग ।
धोखे में सबको रखे प्रखर भक्ति है धूम ।।

कोई बात हो रही नहीं रखो समय का ध्यान ।
कब कैसे हैं बोलना प्रकार रखो या ज्ञान ।।

पता नहीं जब हो पता चले कि वह अंत नहीं है राह का नहीं रहा कि था ।।

कौन कहा है मर्द को ना होता है दर्द ।
दर्द 'प्रखर' होता मगर, ना रोता है मर्द ।।

बिगड़ी बात बने 'प्रखर', लें जब दोष सुधार ।
काट विषैले अंग को, ज्यों करते उपचार ।।

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 कैसी आजादी  ?  ( रोला छंद )

भारत है आजाद, मगर कैसी आजादी ?
कौन हुआ आजाद, मिली किससे आजादी
आधे से भी अधिक, लोग करते मजदूरी
गुलाम जैसा हाल, बनाई है मजबूरी

मुट्ठी भर हैं लोग, बनाए यहाँ इमारत
फुटपाथों पर भीख, माँगने बैठा भारत
फटेहाल बेहाल, बना पागल सा घूमे
भारत का इंसान, पैर पत्थर का चूमे

जो शिक्षक विद्वान, आईना हैं समाज के
वही रसिक शौकीन, बने दुश्मन लिहाज के
शिक्षित होकर काम, अशिक्षित जैसा करते
भारत के विद्वान, प्रेत - बाधा से डरते

जो हैं ठेकेदार, धर्म जैसे धंधों के
बने हुए हैं नैन, वही धार्मिक अंधों के
ढोंग कराकर सभी, कराते हिंदू शादी
मुस्लिम का इस्लाम, बढ़ाता है आबादी

मत की कीमत बोल, बात मतदाता सुनते
अपना शासक नहीं, बल्कि शोषक ही चुनते
सच्चे नेता 'प्रखर', अभी संकट को झेलें
झूठे करते राज, भावनाओं से खेले

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चातक की तड़प  ( रोला छंद )

चातक चाहा चाँद, चाह में चोंच जलाया
उसको करके याद, सभी की याद भुलाया
उसका प्यारा चित्र, बसा करके आंखों में
खोया रहता रहा, सदा उसकी यादों में

जबसे जागी चाह, नहीं सोया रातों में
किया उसी की बात, सदा बातों-बातों में
वह थी मन की प्यास, बुझी ना वह पानी से
वह था बस आभास, गला सूखा बानी से

कहने से भी कभी, नहीं जो जाप किया था
वह प्रीतम का जाप, आप ही आप किया था
शीतल शरद स्वरूप, रूप प्रीतम प्यारे का
दरश रात में मिला, आँख के उस तारे का

रोज तड़पता रहा, प्रतीक्षा में वह दिन भर
ऐसा था वह रोग, झेलना था जीवन भर
उसकी छाया देख, काँच दर्पण का चूमा
पागल जैसा हाल, बना करके वह घूमा

दया किया ना चाँद, तरसते उस चातक पे
सच में उसे लगाव, नहीं था उस चातक से
दिखा एक दिन चाँद, गोद में जब बादल के
'प्रखर' विरह के गान, रचा तब उस चातक ने

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भारत के बहुजन  ( रोला छंद )

आदिकाल के बौद्ध, देश के मूल निवासी
आदि वंश के अंश, दलित भारत के वासी
संख्या में है अधिक, यही बहुजन कहलाते
नीचों जैसा हाल, बनाकर जीते जाते

ये इतने नादान, जानकर भी ना जाने
अपनों से अनजान, नहीं खुद को पहचाने
इसमें इनका दोष, नहीं है मेरे साथी
ये हृदय से धीर, वीर जंगल के हाथी

बरसों तक अपमान, सहे हैं ये बेचारे
शिक्षा के अधिकार, बिना छिन गए सहारे
अक्षर ज्ञान विहीन, हीन मस्तिष्क हो गया
बुद्धि विवेक विचार, तर्क संवाद सो गया

सोची-समझी चाल, चले थे अल्प शिकारी
होते रहे हलाल, सदा बहुजन नर - नारी
सदियों तक जो बात, रटे भजनों के जैसे
इतनी जल्दी उन्हें, भुलाएँ भी तो कैसे

समय लगेगा किंतु, समय निश्चित बदलेगा
बदलेगा माहौल, भरम का चाँद ढलेगा
चलते रहिए 'प्रखर', धम्म का दीप जलाकर
बहुजन होंगे एक, एक दिन ढोंग भुलाकर

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बालक चित्त किशोर हुआ जब,
शोर हुआ मन की वसुधा पर |
मीत मिला जब प्रीत हुई तब,
रीत नई समझे दुख पाकर |
यौवन की छवि आज बनी कवि,
शब्द सजे अब भाव जगाकर |
देव रहे तब हैं अब 'प्रखर'
प्रीतम सी छवि प्रीत लगाकर |
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धम्म चेतना
चित्त लगाकर ध्यान धरो तुम, गौतम का जब नाम भजो तुम |
शील जगाकर काम सुलाकर, मान रखो अभिमान तजो तुम |
क्रोध बुझाकर प्रेम जलाकर, हृदय दर्पण देख सजो तुम |
गायन वादन नर्तन हो सब, लेकिन 'प्रखर' नित्य मँजो तुम |
ब्राह्मणवाद किसे कहते सब, जान सको जब संस्कृति दर्शन |
मीत मुझे जय भीम कहो तब, जीत सको जब ब्राह्मण का मन |

वेद विरोध तभी करना तुम, जान सको जब भेद पुरातन |
दुर्जन को तब दूर करो तुम, 'प्रखर' हो उनसे जब सज्जन |
ऐ बिखरे युवकों सिमटो अब, बात मिले कुछ और मिलें हम |
देर करो मत दूर रहो मत, हाथ धरो सब साथ चलें हम |
एक बनें हम नेक बनें हम, मोम बनें कुछ तो पिघलें हम |
जाति भुलाकर भेद मिटाकर, प्रेम विवाह विजातिय हो अब |
निर्णय आज अभी कर लो यह, वीर युवा यदि हो तुम भी तब |

चित्त सुधार करें पहले हम, लोग तभी जग में सुधरें सब |
बौद्ध तभी असली हम 'प्रखर', बात कहें तब काम करें जब |
साफ करो पहले मन दर्पण, हृदय को करना तब अर्पण |
भाव करो पहले तुम कोमल, पूर्ण करो तब प्रेमसमर्पण |
संगम को जब जान सको तब, प्रीतम पे करना रस वर्षण |
संचित शक्ति तभी करना तुम, रोक सको जब 'प्रखर' घर्षण |

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